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हम भी तो सुधरें

ईयरफोन लगाने वालों के साथ दुर्घटना न तो पहली बार हुई है और न ही ऐसा होना आश्चर्य की बात है। आश्चर्य है कि इतना जानते-समझते भी लोग मानने को तैयार नहीं हैं। कई देशों में तो इस पर कानून की तैयारी चल रही है। यहां ऐसा कुछ नहीं है।

सवाल है कि क्या हम तभी मानेंगे जब कानून का डंडा चलेगा। दावा तो हम सभ्य, संस्कृत और लोकतांत्रिक देश के प्रगतिशील नागरिक होने का करते हैं, लेकिन इस तरह की आदतें हमारी सारी पोल-पट्टी खोल देती हैं। बच्चों की करतूत कहकर मुक्ति नहीं पा सकते। क्योंकि बच्चों पर पर नजर रखना भी बड़ों की ही जिम्मेदारी है।

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