DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

शहर बढ़ेंगे तो देश आगे बढ़ेगा

पिछले दिनों भारतीय नगर सम्मेलन-2011 में नगरीकरण के रुझान और उनसे उभरी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हुई। सम्मेलन के परिचय दस्तावेज- ‘शहरी भारत 2011: प्रमाण’ में भारत के शहरीकरण के बारे में मिथकों का खंडन किया गया था। इसमें शहरी क्षेत्र के बारे में वे आंकड़े भी थे, जिन पर अभी तक ध्यान नहीं दिया गया।

शहरीकरण के बारे में एक मिथक यह है कि यह मूल रूप से गांवों से शहरों की ओर पलायन का परिणाम है। जबकि सच यह है कि शहरों के विस्तार में इस पलायन की भूमिका 20 फीसदी ही है। 60 फीसदी शहरीकरण शहरी आबादी की बढ़ोतरी के चलते हो रहा है। इसका अर्थ यह हुआ कि अक्सर जब यह कहा जाता है कि शहरों की असली समस्या यह पलायन है, तो दरअसल यह बात एक तरह की अतिश्योक्ति ही होती है। वास्तव में, यह शहरी प्रशासन की असफलता का एक बहाना होता है।

शहरी क्षेत्रों के भौगोलिक विभाजन पर नजर डालें, तो दस ऐसे बड़े शहर हैं, जहां देश की आठ फीसदी आबादी रहती है। इन शहरों में देश का 15 फीसदी उत्पादन होता है, जबकि वे देश की 0.1 फीसदी जगह ही घेरते हैं। इसी तरह एक और मिथक शहरी गरीबी को लेकर है। हालांकि शहर और गांव दोनों ही जगह गरीबों का अनुपात घट रहा है, लेकिन अगर कुल जमा संख्या के हिसाब से देखें, तो शहरों में गरीबों की संख्या बढ़ रही है।

रोजगार के हिसाब से देखें, तो शहरों में 70 फीसदी लोगों को अनियमित क्षेत्र में काम मिला हुआ है, जबकि 60 फीसदी शहरी लोग वेतन पर काम करते हैं। यह बताता है कि हमारे शहरों में जीवन-यापन का तरीका बदल रहा है, इसलिए एक व्यापक सामाजिक सुरक्षा तंत्र की जरूरत है।

शहरीकरण आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। आज देश की तकरीबन 38 करोड़ या 31 फीसदी आबादी शहरों में रहती है। यानी देश की एक-तिहाई आबादी की देश के सकल घरेलू उत्पाद में दो-तिहाई हिस्सेदारी है और सरकारी राजस्व का 90 फीसदी भाग यहीं से हासिल होता है। इन तथ्यों की पुष्टि इस आंकड़े से भी होती है कि शहरी इलाकों की प्रति व्यक्ति आमदनी ग्रामीण इलाकों की प्रति व्यक्ति आमदनी से 3.85 गुना ज्यादा है। यानी शहरीकरण लोगों को उत्पादकता की प्रक्रिया में ऊपर की ओर ले जाता है। साथ ही शहरीकरण के दबावों का हमें प्रोएक्टिव होकर प्रबंधन करना चाहिए।

भारत का शहरीकरण काफी तेजी से हो रहा है, लेकिन बहुत सारी भारतीय शहरों में जन सेवाओं का हाल बुरा है, इसलिए वहां जीवन स्तर लगातार गिर रहा है। भारतीय शहरों के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। लेकिन मैं यहां उन सात चुनौतियों का जिक्र करूंगा, जो सबसे बड़ी हैं।

पहली, संस्थागत ढांचे का न होना। अगर हम भारत की विकास प्रक्रिया को अगले दौर में ले जाना चाहते हैं, तो हमें शहरी संस्थागत ढांचे को पूरी तरह से बदलना होगा। मौजदा संस्थागत ढांचा राजनीतिक रूप से कमजोर है और प्रशासनिक रूप से बोझिल। इसलिए यहां जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए संस्थागत सुधारों का कोई विकल्प नहीं है। हमें ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जो टिकाऊ हो और विकास की ओर ले जाती हो।

दूसरी, पलायन का प्रबंधन। भारत में गांवों से शहरों की ओर पलायन का एक बड़ा कारण यह है कि ग्रामीण क्षेत्र में ठहराव आ गया है। पलायन करने वाले ज्यादातर लोग उस जगह जाते हैं, जहां रोजगार और काम के अवसर ज्यादा हों। इससे क्षेत्रीय असंतुलन और गरीबी पैदा होती है, गंदी बस्तियां बढ़ती हैं और शहरों में सामाजिक रूप से वंचित लोगों के इलाके बन जाते हैं।

हम जानते हैं कि तेजी से होना वाला शहरीकरण भारत में अभी होना बाकी है। अगर हम उत्पादन क्षेत्र की गति को बढ़ाएंगे, तो ऐसे मजदूर शहरों में आएंगे ही, जो अभी तक कृषि कार्यों में लगे थे। शहरों में जीवन स्तर को सुधारने के लिए जरूरी है कि इस पलायन और शहरीकरण का प्रबंधन सही ढंग से किया जाए।

तीसरा, शहरी योजना को मजबूत बनाना। हमारे पास ऐसी कोई समेकित योजना नहीं है कि मौजूदा शहरों के ढांचे का समय के साथ विकास कैसे किया जाएगा। जैसे कि विभिन्न सेवाएं, सफाई, आवास, सड़क, परिवहन, पर्यावरण वगैरह का बढ़ती आबादी के दबाव में विकास कैसे होगा। एक साथ कई सारे प्राधिकरण काम करते हैं, इससे शहरी योजना में बाधा ही बनती है। संस्थाओं और इनमें काम करने वाले लोगों की क्षमता को मजबूत बनाना शहरी योजना के लिए जरूरी है।

चौथा, पर्याप्त धन का अभाव। भारत के शहरी निकायों के पास ज्यादा धन नहीं होता। अक्सर वे कर्ज से दबे होते हैं और नई पूंजी उन्हें ज्यादा मिलती नहीं। बढ़ती मांग के चलते सेवाओं को बेहतर बनाने की  उनकी जिम्मेदारी तेजी से बढ़ती जा रही है। जबकि इसकी तुलना में उनका राजस्व आधार जरा भी नहीं बढ़ा है। साथ ही संसाधनों को बनाने और खर्च करने में अकुशलता व भ्रष्टाचार भी बहुत है। टैक्स लगाने और शहरी सेवाओं के शुल्क लेने के बारे में कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश भी नहीं हैं। हमें शहरी जरूरतों के लिए नियामक बनाना ही होगा।

पांचवां, शहरी सेवाओं में अकुशलता। शहरों में सेवाएं देने के तरीके में बहुत किया जाना बाकी है। सबसे जरूरी है जवाबदेही और राजस्व की निरंतरता। शहरी सेवाओं के लिए नियामक बनाकर इस समस्या से निपटा जा सकता है- सेवाओं के शुल्क तय करने के मामले में भी और सेवाओं की कुशलता के मामले में भी।

छठी, आवास की कमी। शहरों में एक-चौथाई लोग गंदी बस्तियों में रहते हैं। देश भर में तीन करोड़ घरों की कमी है। यह कमी निम्न आय वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के  घरों की है। मास्टर प्लान, प्रतिबंधित जोन और फ्लोर स्पेस के कड़े नियमों ने भी इसमें बाधा खड़ी की है।

सातवां, जरूरी ढांचे की कमी। सड़क, परिवहन, जल व विद्युत आपूर्ति, सफाई वगैरह का ढांचा शहरों में बुरी तरह खराब है। ज्यादातर शहरी निकायों के पास इतना धन नहीं है कि वे इसे ठीक करा सकें। शहरों के इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करके ही इस समस्या को ठीक किया जा सकता है।

नगर प्रशासन में सुधार 74वें संविधान संशोधन का हिस्सा था। इसे कुशलता से लागू करने की जरूरत है। प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार बढ़ाकर स्थानीय निकायों के सशक्तीकरण से ही इसे किया जा सकता है। जब तक हम इन चुनौतियों का मुकाबला नहीं करेंगे, शहरीकरण इस देश में नहीं होगा, बल्कि हमारे लिए परेशानियां ही खड़ी होंगी। नीति निर्माताओं को इन चुनौतियों से दो-चार होना ही पड़ेगा।
( ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:शहर बढ़ेंगे तो देश आगे बढ़ेगा