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सिर्फ विधेयक से ही नहीं सुधरेगी उच्च शिक्षा

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उच्च शिक्षा संस्थान विधेयक-2011 को मंजूरी दे दी है। सरकार ने इसे पिछले साल संसद में दूसरे नाम से पेश किया था, तब इसे संसदीय समिति को सौंप दिया गया था। समिति ने इस विधेयक को लेकर 48 सुझाव दिए, जिसमें से केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 41 को ही स्वीकार किया है। इन संशोधनों का मकसद ऐसे उच्च शिक्षा संस्थानों की मुनाफाखोरी पर अंकुश लगाना है, जो फिलहाल किसी तरह के नियम-कायदों के दायरे से नहीं बंधे हैं। विधेयक के तहत इंजीनियरिंग, मेडिकल और मैनेजमेंट की शिक्षा देने वाले संस्थानों पर लगाम कसने के सख्त प्रावधान किए गए हैं।

इस विधेयक में अधिक फीस वसूलने, डोनेशन-कैपिटेशन फीस लेने, फीस लेकर रसीद न देने, अनुचित तरीके से कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के संचालन, कदाचार युक्त प्रवेश प्रक्रिया, झूठे दावे और गुमराह करने की स्थिति में संचालकों को न सिर्फ दंडित किया जा सकेगा, बल्कि एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना किया जा सकेगा। अब उच्च शिक्षा संस्थानों को अपने यहां शिकायत निवारण केंद्र बनाने होंगे।

मंत्रालय के दावे पर गौर करें, तो लगता ऐसा है कि इस विधेयक के पारित होने के बाद उच्च शिक्षा व्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। लेकिन क्या हकीकत में हालात बदलेंगे?

निश्चित रूप से विधेयक के कुछ प्रावधान आश्वस्त करते हैं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हमारे यहां भारी अराजकता है। दशकों तक इसे रामभरोसे छोड़ा गया है। पर इसी के साथ जुड़ा मसला खुद सरकार की गंभीरता का भी है। विश्वविद्यालयों का स्तर सुधारने, गणित-विज्ञान आदि के क्षेत्र में आबंटन बढ़ाने और नए  शोध प्रोत्साहित करने जैसी बड़ी जरूरतों पर इस विधेयक का फोकस नहीं है। शिक्षा पर होने वाल खर्च पिछले 20 साल में जीडीपी का चार फीसदी ही था, इसे बढ़ाना तो दूर इसमें आधे फीसदी की कटौती कर दी गई है।

इस समय देश में तकरीबन 18 हजार कॉलेज और 500 विश्वविद्यालय हैं, इन्हें सुधारने का कोई एजेंडा हमारे सामने नहीं आ सका है। दो साल पहले सरकार ने ‘ज्ञान आयोग’ बनाया था। इसकी रिपोर्ट के अनुसार अगर भारत में सही शिक्षा प्रबंधन करना और वैश्विक दौड़ में रहना है, तो अगले 10 वर्ष में 500 विश्वविद्यालयों को बढ़ाकर 1000 करना होगा, उन्हें अंतरराष्ट्रीय मानकों पर भी खरा उतरना होगा। जबकि सिर्फ 20 नए आईआईटी व आईआईएम खोलने में सरकार के पसीने छूट रहे हैं।

साफ है कि बाकी चुनौतियों से आप निजी क्षेत्र के भरोसे ही निपट सकते हैं। निजी क्षेत्र की मनमानी व मुनाफाखोरी पर लगाम लगाने में यह विधेयक काम का हो सकता है। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि निजी क्षेत्र सिर्फ मुनाफे वाले काम में ही हाथ लगाएगा। बाकी क्षेत्रों की सुध सरकार को लेनी ही होगी। यह विधेयक जरूरी था, पर साथ ही जरूरी है कि सरकार भी उच्च शिक्षा में निवेश करे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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