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गोरों की धरती पर ही क्यों जाता है काला धन

गोरों की धरती पर ही क्यों जाता है काला धन
एक जमाना था जब भारत में काला तो क्या सफेद पैसा भी रखना जुर्म था।
अगर सारा काला पैसा जहाजों में भर कर भारत आ जाए, तो भारतीय नोट ही बिछाएंगे, नोट ही ओढ़ेंगे।

सुना है विदेशी बैंकों में खाते रखने वाले कुछ लोगों के नाम सरकार को पता चल गए हैं और बाकी लोगों की भी अब खैर नहीं है। अगर इनमें से कोई मुझे मिल गया, तो उससे एक ही सवाल पूछूंगा, ‘भाई, भारत में ऐसी क्या कमी थी, जो तूने पैसे विदेशों में रखे? यूं भी तूने इतना पैसा कमाया है, तो यह भी जानता ही होगा कि पैसा सजाकर रखने के लिए नहीं होता, वह दिन दोगुना और रात चौगुना बढ़ाने के लिए होता है, फिर तूने विदेशी बैंकों में पैसा क्यों रखा, भारत में ही क्यों नहीं रहने दिया?’

बाबा रामदेव और लालकृष्ण आडवाणी कह ही रहे हैं कि भारत का 25 लाख या 50 लाख करोड़ या इतना ही कुछ पैसा विदेशी खातों में जमा है। यह भी सोचना अच्छा लगता है कि अगर यह सारा पैसा जहाजों में भर कर भारत आ जाए, तो भारतीय नोट ही बिछाएंगे, नोट ही ओढ़ेंगे। पता चलेगा कि पान वाला सौ रुपये के नोट में पान बांध कर दे रहा है और चने-मूंगफली वाला हजार के नोट की पुड़िया में चने-मूंगफली दे रहा है।

भिखारी तब कटोरा लेकर भीख नहीं मांगेंगे, वे क्रेडिट कार्ड की स्वैपिंग मशीन लेकर खड़े होंगे, दस-पांच हजार से कम भीख तो क्या कोई देगा। कूड़ा बीनने वालों का काम पान वालों और चना-मूंगफली वालों के आसपास बिखरे नोटों से चल जाएगा।

मुद्दा यह है कि विदेशी बैंक कोई खास ब्याज तो देते नहीं हैं, दो-तीन प्रतिशत देते होंगे, बल्कि सुना है कि कई देशों में बैंक ब्याज नहीं देते, उलटे आपका पैसा रखने का शुल्क ले लेते हैं। भारत में काला पैसा रखना ही नहीं, निवेश करना भी सुरक्षित है। कई क्षेत्र ऐसे हैं, जिनमें अथाह काला पैसा जज्ब करने और मुनाफा देने की कुव्वत है, जैसे जमीन खरीदना-बेचना, निर्माण क्षेत्र, ठेकेदारी, राजनीति, बल्कि ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जिसमें काला पैसा चलता हो और अच्छा खासा मुनाफा न होता हो।

थोड़ी बहुत समझदारी हो, तो भारतीय बैंकों में भी पैसा रखा जा सकता है, जो अच्छा खासा ब्याज दे देते हैं। एक जमाना था, जब भारत में काला तो क्या सफेद पैसा भी रखना जुर्म था, तब स्विस बैंकों में पैसा रखना समझ में आता था, अब तो ऐसी कोई दिक्कत नहीं है।
राजेन्द्र धोड़पकर

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