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वास्तविक कर्म

कर्म के सबंध में कहा जाता है कि मनुष्य अपनी जितनी सेवा करे, दूसरों की उससे अधिक सेवा करे। तब कहेंगे कि वह कर्म साधना कर रहा है। जब मनुष्य अपनी कुछ भी सेवा नहीं करे और दूसरों की अधिक से अधिक सेवा करे, तब कहेंगे कि उसने कर्म साधना में सिद्धि प्राप्त की है। जब अपने लिए कुछ भी नहीं करें, अपनी भावना हट गई है, अपनी सेवा नहीं की, केवल दूसरों की ही सेवा की, तब तुम कर्म साधना में सिद्ध हो गए। तो यह कर्म क्या है? वस्तु का जो स्थान परिवर्तन है, उसी का नाम है कर्म। यह वस्तु वहां थी, यहां आ गई, स्थान परिवर्तन हुआ, यह एक कर्म हुआ। मैंने कर्म किया, जिसके द्वारा वस्तु का स्थान परिवर्तन सिद्ध होता है, उसे कर्म कहेंगे। तुम जो कुछ भी करते हो, उसे कर्म कहेंगे।

श्वास परिचालन भी क्या है, वह भी कर्म है, क्योंकि उसमें हृदय, फेफड़े और छाती में परिवर्तन होता है। तो सही कर्म क्या है? जिसके द्वारा स्थान परिवर्तन स्थायी हो। तुम यहां से जयपुर गए, उसके बाद तुम नहीं कह सकते हो कि नहीं, मैं जयपुर से नहीं जाऊंगा। यही कह सकते हो कि जाना नहीं चाहता। हो सकता है, लोग तुम्हारे मृत शरीर को लेकर दिल्ली निगम बोध घाट पर ले आएं। जैसे एक लोहा है, उसे अधिक गर्म करने पर यह तरल हो जाएगा और अधिक गर्म करने से यही लोहा गैस हो जाएगा। उसी प्रकार तुम्हारा जो मन है, उसे अगर अधिक ताप दिया जाए, तो देखोगे, वह सूक्ष्म हो जाएगा। तुम्हारे जो मन की अवस्था है, इस पर अधिक ताप देने से वह आत्मा में रूपांतरित हो जाएगा, क्योंकि आत्मा से ही मन बनता है, यही कर्म हुआ। मन का आत्मा में जो रूपांतरण हुआ, यह स्थायी ढंग का हुआ, क्योंकि यह दोबारा मन में नहीं आएगा। यह स्थायी कर्म हुआ। इसलिए ईश्वर की उपासना ही सही कर्म है और कर्म कर्म नहीं है।
श्री आनन्दमूर्ति

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