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गुस्से की गूंज

शरद पवार पर हरविंदर सिंह ने थप्पड़ एक बार चलाया, टीवी चैनलों ने सैकड़ों बार दिखाया- हर बार यह बताते हुए कि यह बुरा हुआ, लोकतंत्र में ऐसा नहीं होना चाहिए। अन्ना हजारे मासूमियत से इसकी निंदा करते हुए भी यह खुशी छिपा नहीं पाए कि एक ही मारा! यानी यह अहसास सबको है कि जो हुआ, सो गलत हुआ। लेकिन फिर भी क्या कोई छिपी हुई संतृप्ति है कि हो गया, तो ठीक हुआ? वरना इतने अफसोस में होते, तो टीवी चैनल इसे इतनी बार दिखाते क्यों? अगर उन्हें डर होता कि लोग इसे नापसंद करेंगे, तो इसे बार-बार तरह-तरह के बहानों में फेंट व लपेटकर पेश क्यों करते रहते?

क्या हमारे नेता बहुत सारे लोगों की निगाह में इस लायक हैं कि उनके साथ ऐसा सलूक हो? निश्चय ही नहीं, और अगर वे हैं भी, तो उसके लिए जिम्मेदार हम हैं, क्योंकि हम ही तो उन्हें संसद व विधानसभाओं में भेजते हैं। पर जनता व नेता के बीच का रिश्ता वोट की जगह चोट से बनने लगे, तो मानना चाहिए कि गड़बड़ी कुछ ज्यादा है। एक सच्चाई तो यही है कि आम आदमी इन दिनों सार्वजनिक जीवन में असहाय हुआ है। उसके अभाव बड़े होते जा रहे हैं और दूसरों की संपन्नता उसका मुंह चिढ़ाती जा रही है।

इन सबके बीच हताशा व कुंठा की ऐसी घड़ियां संभव हैं, जिनमें इन सबके लिए जिम्मेदार लोगों को थप्पड़ लगाने की इच्छा पैदा हो। इस संकट का एक पहलू और है। हमारे समाज में हिंसा की स्वीकृति बढ़ी है। हमारी राजनीतिक व सार्वजनिक चर्या में हिंसा इतने सूक्ष्म व स्थूल रूपों में विद्यमान है कि उससे आंख चुराना संभव नहीं है।
तहलका वेब पोर्टल में प्रियदर्शन

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