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लाल बत्ती की प्रतिष्ठा

लोकसभा की विशेषाधिकार समिति ने लगभग एकमत से यह माना है कि सांसदों के विशेषाधिकार बढ़ाए जाने चाहिए। कुछ दिनों पहले तमाम पार्टियों के कई सांसदों ने मिलकर मांग की थी कि सांसदों को अपनी गाड़ियों पर लाल बत्ती लगाने का अधिकार होना चाहिए, विशेषाधिकार समिति ने इस मांग का समर्थन किया है।

इस बात पर कुछ हैरानी हो सकती है कि जब तमाम पार्टियों के बीच मतभेदों की वजह से संसद के एक के बाद एक सत्र में कामकाज नहीं हो रहा है, वहां सांसद सिर्फ अपनी सुविधाओं के लिए ही क्यों एकमत होते हैं, लेकिन यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि इन विशेषाधिकारों का अर्थ क्या है और क्या यह हमारी लोकतांत्रिक परंपराओं के उपयुक्त है।

सांसद जन प्रतिनिधि हैं और एक लोकतंत्र में उनका महत्व बहुत बड़ा है। उन्हें अपना कामकाज ठीक से करने के लिए जरूरी सुविधाएं मिलनी ही चाहिए, लेकिन जो सुविधाएं वे मांग रहे हैं, वे प्रतिष्ठा और शान से जुड़ी हैं, न कि सांसद के कामकाज से। लाल बत्ती की मांग जब उठाई जाती है, तो इसका अर्थ यह है कि उन्हें अतिविशिष्ट व्यक्ति का आधिकारिक दर्जा दिया जाए।

जब सांसदों ने लाल बत्ती की मांग की थी, तो उनकी शिकायत यह थी कि पुलिस वाले उन्हें रोकते हैं या उन्हें सड़क का टोल देना पड़ता है। पुलिसवाले आम नागरिकों के वाहनों को भी कुछ एक अपवादों को छोड़कर ट्रैफिक के नियमों का उल्लंघन करने पर ही रोकते हैं और टोल आम आदमी देता ही है।

इन सामान्य नियमों से सांसद छुट्टी क्यों चाहते हैं, ट्रैफिक नियमों का पालन करने या टोल देने से जन प्रतिनिधि के बतौर उनके कामकाज में कोई समस्या नहीं होती, बल्कि वे अपने आचरण से यह उदाहरण पेश कर सकते हैं कि आम नागरिकों को इन नियमों का पालन करना चाहिए। इसी तरह प्रोटोकॉल में उनका दर्जा ऊपर करने के प्रस्ताव के बारे में भी कहा जा सकता है। लेकिन मामला इतना आसान नहीं है।

भारतीय संविधान में विधायिका और कार्यपालिका के कामों में साफ-साफ विभाजन किया गया है और हमारे संविधान के निर्माता इन संस्थाओं की भूमिकाओं को लेकर बहुत सजग थे। हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एक पत्र में यह लिखा है कि सांसदों का कार्यपालिका के कामों में हस्तक्षेप करना गलत है, क्योंकि इससे कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जा सकेगी।

नेहरूजी तबादलों वगैरह में सांसदों के हस्तक्षेप के संदर्भ में लिख रहे थे। लेकिन हुआ यह कि धीरे-धीरे सांसदों का मुख्य काम ही कार्यपालिका से ‘काम करवाना’ रह गया। नीति निर्माताओं की तरह उनका काम निहायत अमहत्वपूर्ण रह गया, जैसा कि संसद में लगातार काम न होने से स्पष्ट होता है। इसमें कार्यपालिका का ज्यादा बड़ा दोष है, क्योंकि सरकारी अमला आम आदमी के काम मुस्तैदी से नहीं करता, इसलिए जन प्रतिनिधि का उसमें हस्तक्षेप करना जरूरी हो जाता है।

अब किसी सांसद की योग्यता या प्रभाव को इस बात से नहीं आंका जाता कि संसद में उसका कामकाज कैसा है, बल्कि इस बात से आंका जाता है कि अपने क्षेत्र में उसने क्या-क्या काम करवाए। इस तरह सच्चे अर्थों में सांसद और उनके असली काम की प्रतिष्ठा कम हुई है, कार्यपालिका की बढ़ी है, जो कि लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है।

सांसद जो विशेषाधिकार मांग रहे हैं, वे भी विधायी कामकाज से संबंधित नहीं, कार्यपालिका से संबंधित हैं। सांसदों को चाहिए कि प्रतिष्ठा या सुविधाएं पाने की कोशिश की बजाय यह कोशिश करें कि विधायी कामकाज को सर्वोच्च महत्व प्राप्त हो, यह तब होगा, जब वे खुद अपने संसदीय कामकाज को गंभीरता से लेंगे। लोकतंत्र में जन प्रतिनिधि सबसे ऊपर हैं, बशर्ते वे खुद अपने कामकाज से अपनी हैसियत बनाएं।

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