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अब ईरान भुगते

मंगलवार को ईरान की राजधानी तेहरान में प्रदर्शनकारियों के ब्रिटिश दूतावास में घुसकर तोड़-फोड़ मचाने के अगले दिन लंदन में ईरानी दूतावास के बाहर महज एक पुलिसकर्मी तैनात था। सुरक्षा व्यवस्था बस इतनी ही थी। वह भी उस देश के प्रतिनिधियों के लिए, जहां ब्रिटेन के कूटनयिकों को धमकाया व अपमानित किया गया। पर यहां न तो ईरानी दूतावास में तोड़-फोड़ हुई और न ही कूटनयिकों को किसी ने धमकाया। इससे दोनों देशों की व्यवस्था में अंतर का पता चलता है।

ऐसे में ब्रिटेन के विदेश मंत्री विलियम हेग ने उचित कदम उठाए हैं। उन्होंने ईरानी दूतावास को बंद करने के आदेश दिए और ईरान के सभी कूटनयिकों को निष्कासित कर दिया। विदेश मंत्री ने वियेना समझौते के उल्लंघन का जवाब दिया है। उस समझौते के मुताबिक विदेशी कूटनयिकों व उनके दूतावासों की हरसंभव सुरक्षा होनी चाहिए।

विदेश मंत्री का मानना है कि इस तरह की घटनाएं हुकूमत की अनुमति के बिना मुमकिन नहीं। अगर ऐसा ही है, तो चिंता की एक और बात है, जो कि तेहरान सरकार की बदलती नीतियों को लेकर है। इस साल की शुरुआत में ही ईरान पर वाशिंग्टन में सऊदी अरब के राजदूत की हत्या की साजिश रचने व अपने परमाणु कार्यक्रम को तेजी से बढ़ाने का आरोप लगा था।

पिछले हफ्ते ही ईरानी संसद ने हमारे साथ रिश्तों को कम करने पर जोर दिया। ‘डेथ टू इंग्लैंड’ के नारे लगे। फिर वहां की हुकूमत के इशारे पर भीड़ ने हमारे दूतावास पर धावा बोल दिया। क्या इससे यह संकेत नहीं मिलते कि ईरान की नीतियां अप्रत्याशित हो गई हैं और अब यह मुल्क विश्व शांति के खिलाफ जा रहा है? अगर इसमें तनिक भी सच्चई है, तो हमारी सरकार को मुस्तैदी दिखानी होगी। खासतौर पर वैसी ही, जैसी उसने पिछले हफ्ते दिखाई थी।

दरअसल, पिछले हफ्ते ही ब्रिटेन ने ईरान पर सख्त आर्थिक पाबंदियां लगाईं। खैर, अब हमारे यूरोपीय मित्रों को भी ठोस कदम उठाने होंगे। जर्मनी ने अपने राजदूत को विचार-विमर्श को लिए बुला लिया है। हमें उम्मीद है कि और यूरोपीय देश आगे आएंगे और ईरान पर और आर्थिक पाबंदियां लगाएंगे। तभी ईरान को अंतरराष्ट्रीय एकता की ताकत का अंदाजा होगा।
टेलीग्राफ, लंदन

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