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देश हित में विदेशी निवेश

दो-तीन दशक पहले हमारे आर्थिक विशेषज्ञ दुनिया भर के उद्योगपतियों से आग्रह करते थे कि आप हमारे देश में आइए और निवेश कीजिए। लेकिन आज विदेशी निवेशक हमारे दरवाजे पर खड़े हैं और हम उन्हें मना कर रहे हैं। सोचना होगा कि इससे घाटा किसे है? जाहिर तौर पर हम विदेशी निवेश से मुंह मोड़कर देश की अर्थव्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। विश्व मंच पर सबसे ज्यादा विदेशी निवेश चीन में हो रहा है, वह भी काफी तेजी से। जबकि चीन खुद को साम्यवाद का पुजारी कहता है। दरअसल, विदेशी निवेश की वजह से ही चीन आज विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में शुमार है। क्या हम आने वाले वर्षों में चीन से स्पर्धा कर पाएंगे? यकीनन नहीं, अगर हमारा रवैया प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर नकरात्मक रहा तो। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने रिटेल के क्षेत्र में विदेशी निवेश को जो खुला निमंत्रण दिया है, वह बधाई का पात्र है। हमें आर्थिक स्तर पर विदेशी निवेश की ज्यादा जरूरत है। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी बेहतर प्रभाव पड़ेगा। जाहिर तौर पर इस बार हमारे पास खुद को साबित करने का मौका है, इसलिए एफडीआई से परहेज करना उचित नहीं है।
कृष्णमोहन गोयल, बाजार कोट, अमरोहा

भ्रष्टाचार के खिलाफ
वक्त आ गया है कि देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सशक्त माहौल का निर्माण हो। इस मद्देनजर जनता पहले से ही सख्त लोकपाल कानून की मांग कर रही है। लेकिन अब केंद्र सरकार को भी इस दिशा में सार्थक भूमिका निभाते हुए शुरुआत अपने विभागों में जांच-पड़ताल से करनी चाहिए। दरअसल, सभी विभागों को अपने यहां आंतरिक जांच की पुख्ता व्यवस्था करनी होगी, तभी जाकर घोटालेबाजों पर नकेल कसेगी और भ्रष्ट नौकरशाहों को कड़ी से कड़ी सजा मिल पाएगी। वित्त, शिक्षा, रक्षा, स्वास्थ्य आदि मंत्रलयों में सतर्कता की खासतौर पर जरूरत है। इस आंतरिक जांच व्यवस्था का क्या प्रारूप हो, इसके लिए राज्य सरकारों और केंद्र के बीच बैठकें जरूरी हैं।
राज, बोधगया

अन्न की बरबादी
प्लेट में आधा-अधूरा खाकर फेंकना स्टैंडर्ड-सा बन गया है। अक्सर शादी-समारोह से लेकर घरों में यह देखने को मिलता है कि लोग अनाज की बरबादी करते हैं। ऐसे में किस तरह हम पूरी आबादी को भोजन उपलब्ध करा पाएंगे। यह ठीक है कि कुछ संस्थाएं गरीबों को नियमित तौर पर भोजन उपलब्ध कराती हैं। इसके अलावा और भी ऐसे लोग हैं, जो गरीबों की मदद के लिए आगे आते हैं। लेकिन इतने भर से भुखमरी की समस्या का हल नहीं हो पाएगा। जरूरत इस बात की है कि हम अन्न को बरबाद होने से बचाएं।
रामकृष्ण गुप्ता, द्वारका, नई दिल्ली

योजनाओं से खेल
केंद्र सरकार के पास ढेरों कल्याणकारी योजनाएं हैं। राज्य सरकारों की मदद से केंद्र इन्हें अमल में लाती हैं। इन योजनाओं को कैसे लागू किए जाएं, यह राज्यों पर निर्भर है। पर केंद्र की योजनाएं उत्तर प्रदेश में विफल हो जाती हैं। ऐसा क्यों? प्रदेश में योजना के लिए आबंटित धन की अक्सर बंदरबांट हो जाती है। प्रदेश सरकार के चहेतों ने न केवल केंद्रीय योजनाओं में बल्कि प्रांतीय व्यवस्थाओं के नाम पर भी खुली लूट मचाई है। सत्ता से पहले अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे मंत्रियों की इस समय अनेक व्यावसायिक व शैक्षिक प्रतिष्ठानों में घोषित-अघोषित साङोदारी है, जिसकी जांच व उसके बाद कार्रवाई होनी चाहिए। अन्यथा तंत्र की आड़ में प्रदेश में लोकतंत्र को ‘व्यावसायिक प्रतिष्ठान’ बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रहेगी।
डॉ सुधाकर आशावादी, शास्त्री भवन, ब्रह्मपुरी, मेरठ

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