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बिहार बना प्रवासी पक्षियों के लिए आश्रयस्थल

गुलाबी सर्दियों की शुरुआत के साथ प्रवासी पक्षी बिहार आने लगे हैं। माना जाता है कि जब इन पक्षियों के मूल निवास स्थान (प्रजनन स्थल) पर प्रकृति का प्रकोप बढ़ता है, झीलें एवं अन्य जलाशय बर्फ में तब्दील हो जाते हैं और भोजन की कमी हो जाती है तब ये पक्षी अपेक्षाकृत गर्म इलाकों को अपना बसेरा बना लेते हैं।

आंकड़ों के मुताबिक भारत में पक्षियों की 1200 से ज्यादा प्रजातियों तथा उपप्रजातियों के लगभग 2100 प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं। इनमें लगभग 350 प्रजातियां प्रवासी हैं जो शीतकाल में यहां आती हैं। कुछ प्रजातियां जैसे पाइड क्रेस्टेड कक्कु (चातक) भारत में बरसात के समय प्रवास पर आते हैं। पक्षियों की कई प्रजातियां अपने ही देश की सीमा में सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करती हैं, जिन्हें स्थानीय स्तर के प्रवासी पक्षी (लोकल माइग्रेटरी बर्ड्स) कहा जाता है। पक्षी वैज्ञानिकों के अनुसार जो पक्षी यहां प्रजनन करते हैं, वे स्थानीय होते हैं।

भारतीय पक्षी संरक्षण नेटवर्क के राज्य समन्वयक एवं मंदार नेचर क्लब, भागलपुर के संस्थापक सदस्य अरविंद मिश्रा ने आईएएनएस को बताया कि बिहार में हाल के सालों में 300 से ज्यादा पक्षी प्रजातियों की सूची तैयार की गई है जिसमें 35 से 40 प्रतिशत प्रजातियां प्रवासी पक्षियों की हैं।

सितम्बर से ही यहां प्रवासी पक्षियों का आना शुरू हो जाता है। सबसे पहले आने वाले पक्षियों में खंजन (वागटेल्स) और अबाबील (स्वालोज) सहित कई पक्षी शामिल हैं। नवंबर से जल-पक्षियों जैसे बत्तख एवं चहा समूह के पक्षी बड़ी संख्या में बिहार में दिखाई देने लगते हैं जो मार्च आते-आते तक यहां से उड़ जाते हैं।

मिश्रा का दावा है कि बिहार में आने वाले प्रवासी पक्षी बाग-बगीचे और जंगलों में रहने वाले होते हैं। इनमें रेड ब्रेस्टेड लाईकैचर, ब्लैक रेड स्टार्ट पक्षी शामिल हैं। इसके अलावा कई तरह के बाज एवं अन्य शिकारी पक्षी तथा क्रेन एवं स्टोर्क जैसे बड़े-बड़े पक्षी भी हमारे देश में एवं बिहार में प्रवास के लिए आते हैं।

हाल के दिनों में देखा गया है कि शिकारियों की वजह से प्रवासी पक्षियों के लिए गम्भीर खतरा उत्पन्न हो गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पर्यावास में परिवर्तन (हैबिटेट चेंज), वनों की कटाई, शहरीकरण, जीवनशैली में परिवर्तन, जलाशयों की भराई के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन पक्षियों के प्रवसन को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं।

बिहार में जो छह पक्षी अभयारण्य हैं, उनकी स्थिति नाजुक बनी हुई है। राष्ट्रीय राजमार्ग 31 पर बिहपुर के आस-पास, फतुहा, बेगूसराय, कुशेश्वरस्थान, पटना सिटी आदि पक्षियों के व्यापार के बड़े अड्डे हैं, जहां इनका शिकार एवं व्यापार चल रहा है। इसी तरह प्रसिद्ध सोनपुर पशु मेले में चिडिया बाजार लगाया जाता है।

पक्षियों का प्रवास अभी भी वैज्ञानिकों की नजर में रहस्य बना हुआ है। फिर भी इनकी पहचान के लिए इन्हें छल्ले पहनाने की प्रक्रियाओं एवं ट्रांसमीटर की सहायता से इनके प्रवास की गतिविधियों को समझने की कोशिश की जा रही है। इसमें बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी का मुख्य योगदान है।

मिश्रा कहते हैं कि अब तक के अध्ययन से यह साबित होता है कि हमारे देश में प्रवासी पक्षी हिमालय के पार मध्य एवं उत्तरी एशिया एवं पूर्वी व उत्तरी यूरोप से आते हैं। इनमें लद्दाख, चीन, तिब्बत, जापान, रूस, साइबेरिया, अफगानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान, मंगोलिया, कश्मीर एवं भूटान जैसे देश शामिल हैं। इसके अलावा पश्चिमी जर्मनी एवं हंगरी जैसे देशों से भी पक्षियों के हमारे देश में प्रवास के लिए आने के प्रमाण मिलते हैं।

पक्षियों को पर्यावरण के स्वास्थ्य का सूचक माना जाता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण जलाशयों की सूची बनाने के लिए रामसर कंवेन्शन ब्यूरो ने भी पक्षियों को ही मुख्य सूचक माना है। अभी हमारे देश के 25 जलाशय रामसर सूची में शामिल हैं, परंतु बिहार में ऐसा एक भी जलाशय नहीं है। मंदार नेचर क्लब एवं इंडियन बर्ड कन्जर्वेशन नेटवर्क द्वारा प्रयास किया जा रहा है कि बिहार के जलाशयों का अध्ययन कर उन्हें इस सूची में शामिल किया जाए।

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