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अलविदा, क्रिकेट के आखिरी नवाब

गए अगस्त महीने की 23वीं तारीख, टेलीविजन के परदे पर नवाब पटौदी थे। इंग्लैंड से बुरी तरह लुटे-पिटे भारत के हाल और हालात पर चर्चा करते हुए। पता नहीं क्यों उन्हें देखकर हर बार ऐसा लगता था, जैसे कलफ में गोता लगाए एक निहायत साफ-सुथरी शख्सियत सामने खड़ी है, बिना किसी सिकुड़न के। उस दिन भी उनका ड्रेस सेंस, खड़े होने का तरीका और अदायगी का अंदाज सलीके से सराबोर था। लग रहा था कि ‘टाइगर’ कुछ ढला जरूर है, पर चुका नहीं। क्या पता था कि उनकी जिंदगी का आखिरी महीना शुरू हो चुका है!

अपने आखिरी टीवी इंटरव्यू में उन्होंने भारत की हार की समीक्षा करते हुए खिलाड़ियों के ‘अति खेलने’ पर चिंता जताई थी। उस विश्लेषण में नफासत जरूर थी, पर वह ‘स्पिन’ नहीं जिसके लिए वह जाने जाते थे। उनके बारे में मशहूर है कि वह कम बोलते थे, पर जब मुंह खोलते तो शब्द सार्थक हो जाते। ओवल के जिस मैदान पर उन्होंने आखिरी इंटरव्यू दिया, उस पर कभी वह खेले नहीं, लेकिन क्रिकेट के संसार का ऐसा कौन-सा कोना है, जिस पर उनकी छाप न हो? वह क्रिकेट के अकेले ऐसे ‘अवतार’ हैं, जिन्हें क्रीज छोड़े हुए साढ़े तीन दशक से ज्यादा हो गए, पर ‘फील्ड’ उन्हें कभी भुला नहीं पाई। उनकी खींची हुई लकीर आज भी कायम है। मंसूर अली खां पटौदी ने मैदान पर जो करतब दिखाए, उससे कहीं ज्यादा हिन्दुस्तानी क्रिकेट की जड़ें जमाने के लिए नेपथ्य में खून-पसीना एक किया।

आंकड़ों के भ्रमजाल से भरी मौजूदा दुनिया में यदि टाइगर को देखते हैं, तो तमाम उपलब्धियां उतनी विराट नहीं लगतीं। अपने लगभग डेढ़ दशक लंबे क्रिकेट कैरियर में उन्होंने 46 टेस्ट खेले और 2,793 रन ठोंके। कुल जमा छह सैकड़े पटौदी के हिस्से में आते हैं और अधिकतम स्कोर 203 रन रहा। उनकी कप्तानी में 40 टेस्ट खेले गए, जिनमें से नौ में भारत जीता, 19 गंवाने पड़े और 12 ड्रॉ रहे। बाद में अनेक कप्तानों ने इस रिकॉर्ड को तोड़ा और नए कीर्तिमान रचे। पर भूलना नहीं चाहिए। वह फटाफट क्रिकेट का टाइम नहीं था। क्रिकेट अपनी तमाम शास्त्रीयता के साथ संसार के अनेक महाद्वीपों पर हुकूमत करता था और करोड़ों लोग काम छोड़कर पूरे पांच दिन रेडियो से चिपके रहते थे। भारत में टीवी आ चुका था। परंतु कस्बों और गांवों में फैलने में अभी समूचे दो दशक बाकी थे। ‘लाइव’ प्रसारण तो सपनों की पहुंच से परे था। इसलिए हमारी पीढ़ी के लोग उनके खेल के बारे में सिर्फ सुन या पढ़ सके। हालांकि इससे पटौदी का महत्व कम नहीं होता। क्यों?

नवाब मंसूर अली खां पटौदी भारतीय क्रिकेट के पितामह जामनगर के महाराजा रणजीत सिंह की परंपरा से आते थे। रणजी जब वह खेलते थे, तब विशुद्ध रूप से यह खेल राजाओं-महाराजाओं का हुआ करता था। गरीब-गुरबा उसे दूर से देखा करते थे। अंगरेजी राज के वैभव और हमारी गुलामी का एक प्रतीक यह भी था। पटौदी ने सिर्फ 21 साल 77 दिन की उम्र में जब हिन्दुस्तानी टीम की बागडोर हाथ में ली, तो भारतीय क्रिकेट के दिन अच्छे नहीं चल रहे थे। वह भारतीय हॉकी का स्वर्ण युग था और क्रिकेट डगमग-डगमग आगे बढ़ रहा था। अक्सर टाइगर की नफासत और सनक की चर्चा होती है। पर यह सच है कि वह किसी ‘इनोवेटर’ से कम नहीं थे।

राजघराने में पैदा होने और ऑक्सफोर्ड में शिक्षा पाने के बावजूद नवाब पटौदी का साबका आज की तरह चटपट अंग्रेजी बोलने वाले क्रिकेटरों से नहीं पड़ा था। उनकी टीम में तमाम सदस्य ऐसे होते थे, जो हिंदी या अंग्रेजी नहीं जानते थे। आप कल्पना कर सकते हैं, आपस में संवाद कितना कठिन रहा होगा। इंग्लैंड उन दिनों खेल के शिखर पर था और उनके सामने एक चुनौती भारतीय टीम पर चस्पां औपनिवेशिकता की मोहर हटाने की भी थी। वह बर्तानिया में पले-बढ़े थे। उन्हें अंगरेजों की सोच और तौर-तरीकों का अंदाज था। ‘टाइगर’ ने भारतीय खूबियों को समझा और परदेसियों की खामियों पर घात लगाकर वार किया। वह जानते थे कि हिन्दुस्तानी क्रिकेट की सबसे बड़ी कमी तेज गेंदबाजी है। इसका रोना रोने की बजाय स्पिन गेंदबाजी और गेंदबाजों को उन्होंने तवज्जो दी। भारतीय स्पिन के स्वर्णयुग के वास्तुकार निस्संदेह नवाब पटौदी थे।

आज क्रिकेट बहुत बदल गया है, पर बिशन सिंह बेदी की लेफ्ट आर्म स्पिन, इरापल्ली प्रसन्ना की ऑफ स्पिन, भगवत सुब्रमण्य चंद्रशेखर की गुगली और वेंकटराघवन की ऑफ ब्रेक की करामात को आज तक कोई नहीं छू सका है। इनमें से कोई एक अकेला भी टीम को जिताने का दमखम रखता था। उसकी पीठ पर हमेशा पटौदी का हाथ जो होता था।

फील्डिंग भारतीयों की सनातन कमजोरी है। हम आज भी रन कमाने की बजाय गंवाने से हारते हैं। उन दिनों तो हालात और खराब थे। टाइगर ने इस कमजोरी से जमकर लोहा लिया। एकनाथ सोलकर जैसे फील्डर और फारुख इंजीनियर जैसे विकेटकीपर उन्हीं के वक्त में जनमे और जमे। वह खुद भी एक अभेद चट्टान की तरह खड़े मिलते थे। कहा जाता था कि कवर पर अगर टाइगर खड़े हैं, तो अपने ड्राइव पर कंट्रोल रखिए। जरा-सी चूक आपको पैवेलियन भेज सकती है। उनका बेखौफ अंदाज और जिस्मानी फिटनेस आज भी मिसाल है। गेंद को हर हाल में हथेली पर चस्पां करने के लिए जैसा ‘डाइव’ वह लगाते थे, वैसा किसी समकालीन खिलाड़ी की सोच से परे था।

दुर्घटनाएं सबके जीवन में होती हैं। पर हर कोई इस अभिशाप को वरदान नहीं बना पाता। पटौदी इसकी मिसाल थे। ऑक्सफोर्ड में अध्ययन के दौरान हादसे में उन्हें अपनी एक आंख गंवानी पड़ी। उस समय उनको भी लगा कि अब क्रिकेट के शौक को अलविदा कहना पड़ेगा। पर कुछ ही दिनों बाद वह ‘नेट’ पर लौटे और अगले ही बरस वह इंग्लैंड के खिलाफ दिल्ली में अपना शुरुआती टेस्ट खेल रहे थे। सिर्फ एक महीने बाद चेन्नई में हिन्दुस्तानी क्रिकेट के इस रहनुमा ने अपना पहला टेस्ट सैकड़ा जड़ा। काव्यात्मक भाषा में कहें, तो एक आंख गंवाने के बाद वह अर्जुन की तरह हो गए थे। अर्जुन एक आंख बंद कर अपने लक्ष्य पर निशाना साधते थे। पटौदी को तो इसके लिए आंख भी नहीं बंद करनी पड़ती थी। भूलिए मत। जिंदगी कविता नहीं यथार्थ है। उन्होंने जिंदगी को असलियत की आग में तपाकर सफलता हासिल की थी।

वह भले ही मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए हों, पर जीवन के सुख-दुख में स्थिर रहने की शक्ति उन्हें और भी विशिष्ट बना देती है। मौजूदा भारतीय क्रिकेटरों को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए कि एक नवाब ने  ड्रेसिंग रूम के दरवाजे आम हिन्दुस्तानियों के लिए खोले और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। आज जब छोटे शहरों और कस्बों के सामान्य घरों में जनमे बच्चे क्रिकेट के आकाश पर जगमगाते हैं, तो ‘टाइगर’ के लिए श्रद्धा और बढ़ जाती है। इस खेल को अंग्रेजी मानसिकता से मुक्त कराने में उनकी भूमिका लगभग उतनी ही बड़ी है, जितनी इंग्लैंड में पढ़कर आए अन्य सियासी या समाज सुधारकों की।

यही वजह है कि धूमकेतु की तरह उगते और अस्त होते क्रिकेटरों की इस दुनिया में टाइगर एक ध्रुव तारे की तरह अलग दिखते हैं। क्रिकेट की आकाशगंगा में बहुत से नक्षत्र आएंगे-जाएंगे, पर पटौदी अपनी जगह कायम रहेंगे।

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