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बुंदेलखण्डः वनवासियों की भूख मिटाने का आधार 'वन करैला'

महंगाई की मार और गरीबी की असली तस्वीर देखना हो तो बुंदेलखण्ड के जंगल में बसे उन गांवों में जाइए, जहां वनवासी जंगल में उगने वाली सब्जी 'वन करैला' व 'पंडोरा' को भूख मिटाने का आधार बनाए हुए हैं। अब तो यहां के वनवासी जंगल में दिनभर इसी की टोह में भटकते हैं। इन जंगली सब्जियों से ही दो वक्त की रोटी का जुगाड़ होता है।

वैसे तो वन विभाग तेंदू, आचार, खैर, आंवला, शहद, मकोय, जैसी तमाम वनसंपदाओं पर रोक लगाए हुए है, फिर भी बांदा जनपद के फतेहगंज इलाके के वनवासी जंगल से ही अपनी दो वक्त की रोटी का इंतजाम करते हैं।

बघोलन, मवासी डेरा, बिलरिया मठ, गोबरी, गोड़रामपुर व गोंड़ी बाबा का पुरवा के लगभग अस्सी वनवासी परिवार जंगली वनसंपदा के भरोसे पीढ़ियों से आबाद हैं। कभी सूखी लकड़ी चुन कर तो कभी महुए का 'लाटा' खाकर बसर करने के आदी यहां के वनवासी अब इस मौसम में जंगली सब्जी बेचकर अपने परिवार को जिंदा रखे हुए हैं।

मडफा के जंगल में 'वन करैला' व 'पंडोरा' नामक जंगली सब्जी की भरमार है। सुबह होते ही वनवासी महिला-पुरुष घरों में ताला बंद कर इस सब्जी की तलाश में जंगल कूच कर जाते हैं। वनवासी गुलाब ने बताया कि 'दिन भर में एक व्यक्ति लगभग चार किलो जंगली सब्जी ढूंढ़ लेता है। फतेहगंज व बदौसा कस्बे में वन करैली 20 रुपए किलो व पंडोरा 30 रुपए किलो थोक बेचकर आटा-चावल के जुगाड़ से बच्चे पालते हैं।'

वनवासी महिला रमिनिया बताती है, 'कुछ वनकर्मी जंगली सब्जी का भी 'टैक्स' ले लेते हैं, विरोध करने पर जंगल में नहीं घुसने देते।' बुजुर्ग अधरवा का कहना है कि 'वनसंपदा पर रोक लोगों के लिए आफत है। पहले खैरगर कौम के लोग खैर की लकड़ी से कत्था बनाने का धंधा किया करते थे, अब बिल्कुल बंद है। सूखी लकड़ी भी बीनने में सामत है।'

रामभरोसे का कहना है कि 'दिन भर लोग सब्जी की तलाश में जंगल में भटकते हैं, पर पुलिस 'बदमाशों को खाना देने गए हो' कहकर उत्पीड़न करती है।' यहां की ग्राम प्रधान शांति देवी बताती हैं कि 'बाजार में अन्य सब्जी बहुत मंहगी है, इसलिए ज्यादातर लोग जंगली सब्जी का भर्ता (चोखा) और रोटी खाते हैं।'

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  • Web Title:बुंदेलखण्डः वनवासियों की भूख मिटाने का आधार 'वन करैला'