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व्यवसाय की ऊंचाइयों को छूना चाहती है टाटा की स्पृहा

जमशेदपुर विद्यासागरो। जाने-माने उद्योगपति रतन टाटा से प्रतिभा सम्मान पा चुकी स्पृहा ने आइसीएसइ की परीक्षा में टाटानगर का नाम रोशन किया है। मंगलवार को परीक्षा परिणाम की घोषणा होने के बाद राजेंद्र विद्यालय प्रबंधन भी स्पृहा के नाम पर फूले नहीं समा रहा। स्पृहा ने 98.8 प्रतिशत अंक पाकर राज्य में ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की मेधाविता सूची में अपना नाम शुमार कर लिया है।

परिवार भी रहा हैः टॉपर मेधावी स्पृहा का परिवार भी टॉपर रहा है। मां सविता विश्वास मुरादाबाद के हिंदू कालेज की राष्ट्रीय स्तर की मेधावी छात्रा रहीं तो दीदी स्नेहा विश्वास 2002 दसवीं और 2004 दस जमा दो की टॉपर रहीं। आइआइटी खड़गपुर से एप्लायड जियोलॉजी की पढ़ाई पूरी कर उसकी दीदी स्नेहा स्लमबर्ग कंपनी में 27.5 लाख रुपये के पैकेज पर अमेरिका में नौकरी कर रही हैं।

राजेंद्र विद्यालय में नर्सरी में दाखिल होने वाली स्पृहा का रिकार्ड हमेशा टॉपर का रहा है। पिता सेवाव्रत विश्वास मैकेनिकल में डिप्लोमा करने के बाद टाटा स्टील में सुपरवाइजर की नौकरी करते हैं। तबला की शौकीन स्नेहा ने दर्जनों पुरस्कार प्राप्त किए हैं तो स्पृहा ने पेंटिंग और डिबेट में उससे भी अधिक पुरस्कार बटोरे हैं।

टाटा इनवेस्टा टाटा वर्ल्ड यंग एक्सप्रेशन चिल्ड्रेन कंटेस्ट ग्लोबल लेवल, टाटा बिल्डिंग इंडिया स्कूल लेवल,राष्ट्रपति भवन, उपराष्ट्रपति भवन सहित रतन टाटा जैसी हस्ती से भी स्पृहा अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी है। आइआइटी कर उद्यमी बनना चाहती है स्पृहा। स्पृहा कहती है कि कठिन परिश्रम का कोई विकल्प नहीं होता।

उसकी एक ही ख्वाहिश है कंप्यूटर संकाय में आइआइटी की पढ़ाई पूरी कर व्यवसाय करने की। वह कहती है कि परीक्षा परिणाम से संतुष्ट है, फिर भी बेहतर करने की हमेशा गुंजाइश बनी रहती है। साकची के स्वर्णरेखा फ्लैट में रहने वाली स्पृहा बेहतर परीक्षा परिणाम के लिए माता-पिता और अपने स्कूल शिक्षकों को श्रेय देती है।

वह कहती है कि जब भी मुझे गाइडलाइन की आवश्यकता पड़ी तो शिक्षक हमेशा उपलब्ध मिले। स्पृहा को जब दिल करता है, वह पढ़ने बैठ जाती है। वह कहती है- पढ़ने की कोई समय सीमा नहीं होती। जब जी चाहे पढ़ो, लेकिन दिल से। उसे जब जी करता है, पढ़ती रहती है। वह नोबल पढ़ने की भी शौकीन है। उसे एलकेमिज का नोबल बेहद पसंद है।

करप्शन से है घृणाः स्पृहा कहती है कि वह ऐसा कुछ भी नहीं बनना चाहती, जिससे करप्शन का वास्ता हो। ऐसा काम करना चाहती हूं, जिसे माता-पिता और समाज का नाम ऊंचा हो।

देश में हिन्दुस्तान जैसा अखबार बहुत कमः स्पृहा कहती है कि हिन्दुस्तान में जितना सकरात्मक बदलाव दिखता है, उतना किसी दूसरे अखबार में नहीं। गत 14 नवंबर को गेस्ट एडिटर के रूप में मैने जो भी सुझाव दिए थे, वे सभी सुने गए, बल्कि उन्हें लागू भी किया गया। मैं हमेशा हिन्दुस्तान पढ़ती हूं। पूरे देश में बहुत कम हिन्दुस्तान जैसे अखबार हैं।

हमारी गेस्ट एडिटर ने कहा : आत्महत्या कतई जायज नहीं है। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने के बजाय अभिभावक की बात समझनी चाहिए। वे अपने लंबे अनुभव से कोई बात कहते हैं। हर परिस्थिति में जिंदगी से लड़ना सीखना चाहिए। अधिक से अधिक पढ़ें ताकि दिमाग के रास्ते खुले और दायरा बढ़े।

गुस्सा को कागज पर लिखना चाहिए ताकि इमोशन निकल जाए। प्रेरणादायक रहेंगी मासी मांमेरे घर में काम करने वाली मासी मां हमेशा प्रेरणादायक बनी रहेंगी। जब भी मुझे तनाव हुआ, वे हमेशा सांत्वना देती रहीं। रिजल्ट निकलने के दो-चार दिन पहले मुझे कुछ तनाव जैसा होने लगा था तो मासी मां ने मुझे बहुत सपोर्ट किया। वे मेरे परिवार की सदस्य जैसी हैं। उन्होंने हमेशा बेहतर बनने को प्रेरित किया।

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