DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

एवं इन्द्रजीत का इतिहास बाकी रहेगा

इस तेरह मई की शाम साढ़े सात बजे बादल सरकार नहीं रहे। कोलकाता की बिडेन स्ट्रीट के मानिकतला स्थित अपने घर में उन्होंने अंतिम सांस ली जहाँ वे अकेले पिछले तीस साल से रह रहे थे। शम्भु मित्र और उत्पल दत्त के समकालीन एवं देश के लीजेंड रंगकर्मी और नाटय़लेखक सुधीन्द्र सरकार यानी बादल बाबू ने पूरी जिंदगी थियेटर को दी। नाटक ‘एवं इन्द्रजीत’ से वे 1967 में हिन्दी रंगसमाज में चर्चित हुए। एवं इंद्रजीत, जुलूस, पगला घोड़ा आदि नाटकों से वे पूरे रंगजगत में प्रतिष्ठित होते गए। गौतम चटर्जी ने लगभग दो माह पूर्व उनसे मुलाकात की थी। प्रस्तुत है उसी साक्षात्कार के मुख्य अंश-

‘अरे विहंग’ में मृत्युचेतना ही नाटक का आलाप है। अभी 85 साल की उम्र में आपने अचानक उसी नाटक को दोबारा लिखा। क्या मृत्यु के लिए तैयार हो रहे..

सारा जीवन ही मृत्यु से संवाद है, मृत्यु को सहज कर लेने का तरीका है। मैं मृत्यु को लेकर बिल्कुल चिंतित नहीं। लेकिन सारा दिन, सारी रात मृत्यु का एक आलोक आसपास है, यही जीवन है, बाकी इतिहास है। ओरे विहोंगो मुझे बहुत प्रिय है। बंगालियों की चेतना का संस्कार रवीन्द्रनाथ से बनता है, बना है। बीसवीं शती की बांग्ला चेतना रवीन्द्रचेतना है। 

पूरा देश जब रवीन्द्रनाथ की डेढ़सौवीं जयंती मना रहा है तो मेरा मन हुआ कि ओरे विहोंगो को फिर से पढ़ें और लिखें और हो सके तो खेलें भीं। आपने मेरे इस कमरे में आकर जो देखा उससे लगता है कि मैं मृत्यु के लिए तैयार हूँ? (पिछले साल वे थाईलैण्ड गये। हवाईजहाज में उन्हें जो पत्रिकाएँ मिली थीं उनमें प्रकाशित चटख रंगों की तस्वीरों को कैंची से खास ढ़ंग से काटकर उन्होंने अपनी किताबों की आलमारी पर कोलाज बना कर चिपकायी थी।)

बल्कि आप और अधिक जीवंत और रचनाशील लग रहे हैं। आप तो फिर से जीवन के लिए तैयार हो चुके हैं। आप की सारी रचनाएँ, नाटक, कविताएँ और कहानियाँ तो जीवन से ही प्रेरित हैं..

नहीं सब नहीं। कुछ विदेशी कहानियों से प्रेरित हैं। बाकी इतिहास, पगला घोड़ा और कवि ओ काहिनी विदेशी रचनाओं से प्रेरित हैं। उनमें आप यह इन्फ्लुएन्स पा सकते हैं। अरे विहंग रवीन्द्रनाथ से प्रेरित है। मैं यहाँ वहाँ से कुछ भी नहीं लिख सकता। मैं कल्पना कर मनगढ़ंत भी नहीं लिख सकता। कभी नहीं लिखा। जो लिखा जीवन से लिखा। अपने सीधे अनुभव से लिखा। मैंने कभी किसी नाटक से जीवनविरोधी संदेश नहीं दिया।

आपके नाटक ‘सारी रात’ में युवा दम्पति संयोगवश सारी रात एक वृद्घ के साथ गुजारते हैं। सारी रात उस अनुभवी व्यक्ति से बात कर महिला को लगता है कि वही उसका साथी हो सकता है। फिर सुबह दम्पति अपने गन्तव्य की ओर निकल पड़ते हैं। पाठकों के मन में आ सकता है कि अब उनका दाम्पत्य जीवन सुखद नहीं भी नहीं रह सकता। 

नहीं। इस पर मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि उस महिला का, उस चरित्र का उत्तरण हुआ। उस रात के अनुभव से उसका उत्तरण ही अभिष्ट है। मेरे सारे नाटकों में चरित्रों के साथ ऐसा होता है। चरित्रों के साथ पाठकों और दर्शकों का भी यदि ऐसा उत्तरण होता हो तो सुखद है। उत्तरण आवश्यक है। नाटक देखने के बाद दर्शक यदि वह न रह जाए जो वह है और उसमें विकास का संस्कार बने, चेतना उत्कर्ष की ओर बढ़े तो यह लेखक की गरिमा है।

और प्रेम ?
मेरे अधिकतर नाटक प्रेम कहानियाँ हैं। पगला घोड़ा में चार चरित्र मेरे अपने जीवन अनुभव से हैं। एक चरित्र की मैंने कल्पना की है उसे मैंने कभी नहीं देखा। मेरे आलोचक कहते रहे हैं कि मैं महिलाओं को लेकर लिखता हूँ। अक्सर वे ही मेरे केन्द्र में होती हैं। मैं महिलाओं का लेखक हूँ। मेरा जवाब है कि हाँ, मैं हूँ। मैं महसूस करता हूँ कि स्त्रियाँ ही प्रेम करती हैं। पुरुष गणित में लगे रहते हैं। स्त्रियाँ पूरे प्राण से, एकनिष्ठ ढ़ंग से जीवनपर्यन्त अंतिम सांस तक प्रेम करती हैं। वे प्रेम कर सकती हैं। पुरुष हिसाब करते हैं। मेरे दो नाटक आत्मकथात्मक हैं। उनमें आप यह सब आद्यन्त पा सकते हैं। ये हैं-सर्कस और शेष नहीं।

अभी आप अपने कमरे में जो आपके मन का आत्मकक्ष है, में सवार्धिक सक्रिय हैं, लिख रहे, पढ़ रहे, कोलाज बना रहे..
और भी बहुत कुछ कर रहा। कई प्रमुख विदेशी नाटककारों की रचनाओं का बांग्ला में अनुवाद कर रहा। सोफोक्लीज, यूजीन ओ नील, सात्र्, ब्रेष्ट, इब्सन आदि कई नाटककारों के एक-एक नाटक को बांग्ला में लिखा। एक दर्जन हो जाने पर एक किताब हो जाएगी जो आज के युवाओं के लिए एक एन्थोलॉजी होगी।

यात्रा भी कर रहे। थकते नहीं 85 वर्ष की अवस्था में ?
नहीं। फिर जा रहा हूं मई में थाईलैंड। पिछले प्रवास पर तो मैंने लिखा ही ‘प्रोबासेर हिजीबिजी’। अपनी आत्मकथा पूरी कर ली ‘पुरोनो काशुन्दी’। अब थाईदेश। यह देश मुझे हमेशा पुकारता है। वहाँ बल्कि वहीं मैंने पाया कि बुजुर्गो का इतना सम्मान होता है। यदि आपके पास कुछ नहीं है, न पैसा न सामान फिर भी आप निश्चिंत होकर जा सकते हैं। मैं वहां कुछ नहीं ले जाउंगा। सब कुछ यहीं रहेगा।

बादल सरकार
(15 जुलाई 1925-13 मई 2011)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:एवं इन्द्रजीत का इतिहास बाकी रहेगा