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रूमानी ख्वाब-ख्यालों में सच की झलक

1) रूमानी ख्वाब-ख्यालों में सच की झलक
कुलदीप सलिल ने लंबे अरसे से ग़ज़ल की ख़िदमत की है। प्रस्तुत संग्रह में उनकी शायरी के नरम-गरम रंगों का व्यापक फलक नजर आता है। यहां उनकी ग़ज़लें अगर इनसान की सीमाओं और उसकी मजबूरियों का ज़िक्र करती हैं तो साथ ही वो उसे उम्मीद का हमकदम होने का हौसला भी देती हैं। बानगी पेश है - पहले ये मलबा हटाया जाएगा/ये नगर फिर से बसाया जाएगा। आज इक होगी क़यामत देखना/आज इक परदा उठाया जाएगा। मजबूरियों के हवाले से : वही दिल है, जिगर वो ही, वही हम/वही मसले अभी सुलझा रहे हैं। शायरी का मौजूदा दौर अपने अंदर उसी बेचैनी को समेटे है जो उसके सुनहरी दौर की देन है, ग़ज़लों से साफ है।
धूप के साये में, शायर: कुलदीप सलिल, प्रकाशक: हिन्द पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, मूल्य : 150 रुपए

2) बचपन के सौम्य रूप के लिए एक सौगात
सब मानेंगे कि बचपन शब्द का अर्थ ही अपने आप में निष्कपटता और भोलेपन का पर्याय है। कहानी संग्रह को इसी लक्ष्य के साथ तैयार भी किया गया है। संग्रह की कहानियां सीधी-सरल भाषा में बचपन के विभिन्न पहलुओं को अक्सर देखे-भाले रूप में पाठक के सामने रखती हैं। कहानियों का कलेवर भारतीय परिवेश के इर्द-गिर्द ही खींचा गया है। बचपन का संघर्ष, डर, खुशियां, हास-परिहास, और सबसे जरूरी वहां से मिलने वाली शिक्षा का असर कितनी गहराई तक किसी भी बच्चों के संपूर्ण विकास को कितना प्रभावित करता है, कहानियों का मूल सार है।
बचपन का सफर, लेखिका: रेनू सैनी, प्रकाशक: अरावली बुक्स इंटरनेशनल (प्र.)लि, नई दिल्ली-20, मूल्य: 255 रुपए

3) आज के समाज का हाल-हवाला
प्रस्तुत उपन्यास की कहानी रहस्य-रोमांच से भरपूर है, इसके बावजूद, वह सच का बेहद कड़वा और भयावह रूप जिस तरीके से सामने रखती है, वह रोमांचक कथा कहने की पुरानी परंपरा का सफल वाहक है। इस परंपरा में समाज को उसकी तमाम खूबी-खामियों के साथ तटस्थ तरीके से पाठक के समक्ष रखा गया है। साथ ही, किसी एक घटना से जुड़े राजनीतिक जमा-जोड़, कानून व्यवस्था की भूमिका और मक्कारियों के रूप भी कहानी में सामने आते हैं। कथा लेखन के क्षेत्र में उपन्यास लेखिका का पहला प्रयास होने के बावजूद परिपक्व कथादृष्टि का अहसास कराता है।
रात गवाह है, लेखिका: किश्वर देसाई, प्रकाशक: हिन्द पॉकेट बुक्स और फुल सर्कल, नई दिल्ली, मूल्य : 150 रुपए


4) गीतों में निजता के बिम्ब
गीत गुनगुनाने की जरूरत हमारे रोजमर्रा के जीवन को आनंद की अनुभूति से भर देती है। संगीत और शब्दों की मिठास के प्रति चाहत एक प्राकृतिक क्रिया है। ‘गीतों के बादल’ के गीत रूमानियत और निजी अंतर्द्वद्वों के मिले-जुले भाव प्रस्तुत करते हैं। इन गीतों का रचनाकाल (1970-2009), स्वयं गीतकार की रचनाप्रक्रिया के बनने-संवरने का प्रमाण देता है। शुरुआत से अंत तक इन गीतों के भाव एक-एक पग बढ़ाते हुए चलते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि संग्रह के गीतों की तैयारी नितांत धैर्य से की गई है। वैसे भी इतनी लंबी रचनाप्रक्रिया एक बेहद धैर्यवान रचनाकार ही वहन कर सकता है। कहना न होगा कि गीतकार की निजी पीड़ाएं पूरी तरह से गीतों में उतरी हैं।
गीतों के बादल, गीतकार : तुषार, प्रकाशक : अयन प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली, मूल्य : 350 रुपए 

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