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पाकिस्तान या दहशतस्तान!

एबटाबाद में लादेन की मौत से पाकिस्तान दुनिया के निशाने पर आ गया है। कोई उसे आतंकी राष्ट्र घोषित करने की मांग कर रहा है तो कोई उसे दी जाने वाली मदद बंद करने की मांग कर रहा है। खुद अमेरिका अब उसे दोस्त की बजाए दुश्मन मानने लगा है। आखिर क्यों हो गई पाकिस्तान की यह हालत? क्या होगा पाकिस्तान का? प्रस्तुत है एक विश्लेषण:

कश्मीरी पंडितों से मुस्लिम बने परिवार में पले-बढ़े राष्ट्रकवि अल्लामा इकबाल ने जब 1933 में पाकिस्तान का विचार दिया तब उनके मन में कतई यह न रहा होगा कि एक दिन वह आतंकवादियों की जन्नत बन जाएगा। वे तो मुस्लिमों के लिए एक अलग पाक स्थान की परिकल्पना कर रहे थे। लेकिन आज कोई उसे टैररिस्तान कह रहा है तो कोई आतंकवादियों का अभयारण्य। कोई उसे आतंक का असली शैतान कह रहा है तो कोई यह मांग कर रहा है कि क्यों न उसके खिलाफ भी इराक की तरह कार्रवाई हो। पश्चिम के कुछ अतिवादी तो पाकिस्तान के अस्तित्व को ही मिटा देने की बात कर रहे हैं। 

सोचने की बात यह है कि पाकिस्तान ऐसा क्यों हो गया? क्यों सलमान रश्दी जैसे लेखक को कहना पड़ रहा है कि पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित कीजिए? क्यों इमरान खान जैसे विचारवान क्रिकेटर को अपने देश के नाम पर शर्म महसूस हो रही है? पाकिस्तान के बड़े से बड़े पैरोकार भी आज सिर्फ इसलिए चुप हैं कि वह पूरी तरह से बेनकाब हो चुका है। पाकिस्तानी हुक्मरानों ने पिछले छह दशकों में उसे अपनी-अपनी तरह से लूटा है। इसलिए सिर्फ पाकिस्तानी ही नहीं, पूरा भारतीय उपमहाद्वीप शर्मसार है। दुनिया भर में जहां भी दक्षिण एशियाई हैं, भारतवंशी हैं, वे सब शर्मसार हैं, परायों की नजर में वे शक के घेरे में हैं। इसलिए यह पड़ताल जरूरी है कि पाकिस्तान की इस हालत के लिए कौन जिम्मेदार है? यों तो पाकिस्तान की नींव ही गलत जगह (तथाकथित द्विराष्ट्रवाद) पर रखी गई थी, इसलिए आजादी के तत्काल बाद उसने आतंक का सहारा लेकर कश्मीर को हड़पने की कोशिश की थी। मुफ्त में एक तिहाई कश्मीर गटक जाने के कारण उसे लगने लगा कि तरक्की का यही असली राजमार्ग है। वहां लोकतंत्र तो जम नहीं पाया, लिहाजा फौजी तानाशाहों और कट्टरपंथियों ने मिल कर देश चलाने का नापाक गठजोड़ बना लिया। जिस तरह से उन्होंने पूर्वी बंगाल की लोकतंत्री आवाजों को कुचला और बदले में उसके ही टुकुड़े हो गए, उससे वह और भी बौखला गया। उसने मन ही मन यह ठान लिया कि जैसे भी हो भारत को सबक सिखाना होगा। जुल्फिकार अली भुट्टो कहा करता था कि हम हजार वर्षों तक भारत से लड़ते रहेंगे। जैसे मुहम्मद गजनवी की आत्मा उसके मन में समा चुकी थी। भुट्टो तक तो फिर भी पाकिस्तानी हुक्मरान हवा में तलवारबाजी करते रहे, पाकिस्तान को सुनियोजित तरीके से आतंकवाद के दलदल में धकेलने वाला शासक था जनरल जिया उल हक।

सत्तर के दशक में जब अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप बढ़ने लगा और बागी मुजाहिदीन पाकिस्तान के पश्चिमी इलाकों में शरण लेने लगे तो पाकिस्तानी फौज और शासकों ने उनसे हाथ मिला लिया, क्योंकि वे सोवियत संघ के खिलाफ थे और सोवियत संघ भारत का दोस्त था। उधर अमेरिका ने भी इन मुजाहिदीन की मदद की। तब ओसामा बिन लादेन भी मुजाहिदीन की मदद के लिए इस इलाके में आ गया था। यानी वह भी अमेरिका की तरफ ही था। इस त्रिकोणीय गठबंधन के सरगना बने जनरल जिया उल हक। उन्होंने त्रिआयामी रणनीति बनाई। पहली बार बड़े पैमाने पर फौज में मजहबी आधार पर नियुक्तियां और पदोन्नतियां कीं। दूसरे, अफगानिस्तान से आए शरणार्थियों के बच्चों के लिए बेहिसाब इस्लामी मदरसे खोले। बच्चों को इस्लाम के साथ ही फौजी प्रशिक्षण देना शुरू किया ताकि भविष्य में ये बच्चे तालिबान बन कर पश्चिमी मोर्चे पर डट सकें। पूर्वी मोर्चे यानी भारत की सीमा पर हमेशा अशांति बनी रहे, इसके लिए उसने पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकी प्रशिक्षण शिविर शुरू करवाए ताकि आतंकियों के वेष में हमेशा भारत के साथ एक छाया युद्ध जारी रखा जा सके। यह कहने की जरूरत नहीं कि यह रणनीति नापाक होते हुए भी बेहद शातिराना थी और एक हद तक वे इसमें कामयाब हुए भी। लेकिन कोई भी रणनीति तभी तक दीर्घजीवी और स्थायी रूप से फलदायी होती है, जबकि उसके इरादे पाक हों। एक धर्म निरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र की बजाए मजहबी राष्ट्र बना देने और राष्ट्र जीवन के हर हिस्से में कट्टरपंथियों को घुसा कर पाकिस्तान धीरे-धीरे उग्र इस्लाम की ओर चला गया। दुनिया भर के आतंकवादियों को किसी न किसी रूप में वहां शह मिलने लगी। 1993 के बाद दुनिया में जितने भी बड़े आतंकी हमले हुए, उनके तार कहीं न कहीं पाकिस्तान से जुड़े पाए गए। भारत लगातार दुनिया को इस बात से आगाह करता रहा लेकिन पश्चिमी ताकतों ने हमारी एक न सुनी, क्योंकि तब वे सीधे-सीधे भुक्तभोगी नहीं थे। उलटे वे पाकिस्तान की हर तरह से मदद करते रहे। वह बात अलग है कि मदद में मिली धनराशि पिछले दरवाजे से आतंकियों को पहुंचती रही। सचमुच, यदि वर्ष 2000 में अमेरिकी विदेश विभाग की रिपोर्ट में पाकिस्तान के आतंकी संपर्कों का खुलासा न हुआ होता और 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में आतंकी हमला न हुआ होता तो अमेरिकी शासकों का रवैया न बदलता। उसके बाद ही उन्होंने भारत को गंभीरता से लेना शुरू किया। वे पाकिस्तान को तब भी मदद देते रहे, लेकिन सावधानी के साथ।

लेकिन बिन लादेन की हत्या के बाद अमेरिकियों का पाकिस्तान से पूरी तरह से मोहभंग हो चुका है। क्या फेसबुक क्या ट्विटर और क्या यूटय़ूब, सब तरफ पाकिस्तान के प्रति जहर उगलती पोस्टें हैं। अमेरिका में पाकिस्तान के ही नहीं, अपने हुक्मरानों के खिलाफ भी एक बवंडर उठ रहा है कि आखिर ये सरकारें अमेरिकी टैक्सदाताओं के धन का इस कदर दुरुपयोग क्यों कर रही थीं? इसलिए पाकिस्तान की सलामती के लिए हम दुआएं ही कर सकते हैं।

पाक के आतंकी और उग्रवादी संगठन

पाकिस्तान में सक्रिय
- लश्कर-ए-उमर (एलईओ)
- तहरीक-ए-नफज-ए-शरीयत-ए-मोहम्मदी
- लश्कर-ए-जांघवी (एलईजे)
- सिपह-ए-मुहम्मद पाकिस्तान (एसएमपी)
- जमात-उल-फुकरा
- नदीम कमांडो
- मुस्लिम यूनाइटेड आर्मी
- हरकत-उल-मुजाहीदीन अल-आलमी (हुमा)

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय
- हिज्बुल मुजाहीदीन (एचएम)- इसका मुख्यालय पाक अधिकृत कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद में है।
- हरकत-उल-अंसार (एचयूए, वर्तमान में हरकत-उल-मुजाहीदीन के नाम कुख्यात)
- लश्कर-ए-तय्यबा (एलईटी)-दक्षिण एशिया के सबसे बड़े और कुख्यात इस्लामिक आतंकवादी संगठनों में से एक। पीओके में इसके कई ट्र्रेनिंग कैंप हैं और इसने भारत में कई बड़ी आतंकवादी वारदातों को अंजाम दिया है।
- जैश-ए-मोहम्मद मुजाहीदीन-ए-तंजीम- इसका उद्देश्य कश्मीर को भारत से अलग करना है। इसने कश्मीर में कई बड़ी आतंकवादी वारदातों को अंजाम दिया है।
- अल बदर- इसकी स्थापना 1998 में की गई थी।
- जमायत-उल-मुजाहीदीन (जेयूएम)
- हरकत-उल-जेहाद-अल-इस्लामी (हूजी)
- मुत्ताहिदा जेहाद काउंसिल (एमजेसी)
- अल जेहाद
- जम्मू एंड कश्मीर नेशनल लिबरेशन फ्रंट आर्मी
- अल जेहाद फोर्स
- अल उमर मुजाहीदीन
- जम्मू एंड कश्मीर स्टूडेंट्स लिबरेशन फ्रंट
- इस्लामिक स्टूडेंट्स लीग
- तहरीक-ए-हुर्रियत-ए-कश्मीर
- मुस्लिम मुजाहीदीन
- अल मुजाहिद फोर्स

पाक का टेरर तंत्र

- पाकिस्तान में आतंकी शिविरों की संख्या- 37
- पीओके में आतंकी शिविरों की संख्या- 49
- अफगानिस्तान में पाकिस्तान द्वारा संचालित आतंकी शिविरों की संख्या- 22
- जम्मू एवं कश्मीर में सक्रिय हार्डकोर आतंकवादियों की संख्या- 2300
- जम्मू एवं कश्मीर में सक्रिय भाड़े के विदेशी आतंकवादियों की संख्या- 900
- भारतीय बलों द्वारा मारे गए पाक आतंकवादियों की संख्या- 291
- पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा मारे गए भारतीय नागरिकों की संख्या- 29,000
- पाकिस्तान में प्रशिक्षित आतंकवादियों से बरामद किए गए आग्नेयास्त्रों की संख्या- 47,000
- पाकिस्तान में प्रशिक्षित आतंकवादियों से बरामद किए गए विस्फोटकों की मात्र- 60 टन
- जम्मू एवं कश्मीर में पाकिस्तान, पाक अधिकृत कश्मीर, अफगानिस्तान, मिस्र, सूडान, यमन, बहरीन, बांग्लादेश, ईरान और इराकी मूल के विदेशी आतंकवादी सक्रिय हैं।

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