DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

ठीक नहीं रहे चीन के साथ छोटे देशों के रिश्ते

यह महज संयोग ही था कि 90 के दशक में सोवियत संघ टूटने के बाद भारत जब नए मित्रों की तलाश कर रहा था तब तत्कालीन सरकार ने मुझे दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देशों में राजनीतिक दूत बनाकर भेजा था। उस समय के राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने मुझे लाओस और कंबोडिया जाने के पहले इन देशों से भारत के हजारों साल पुराने रिश्तों का हवाला दिया था। उनके मुताबिक, ‘बौद्ध भिक्षु पैदल चलकर और मैकांग नदी में नाव के कठिन सफर से लाओस, कंबोडिया और वियतनाम गए थे। यह दुर्भाग्य है कि हमने इन देशों को भुला दिया। अब जबकि सोवियत संघ टूट गया है, तो इन देशों को भी भारत के साथ मित्रता करने की ललक है। इसीलिए विशेष रूप से इन देशों में आपको भेजा जा रहा है।’ 
राजदूत के तौर पर लाओस जाने पर मुझे आश्चर्य हुआ कि वहां के लोग देखने में बेहद खूबसूरत हैं। अधिकतर के फीचर्स आर्यन हैं। उन्हें घोर शिकायत थी कि उनका भारत से बहुत पुराना रिश्ता है, लेकिन भारत ने उन लोगों की अवहेलना की। लाओस, कम्बोडिया और वियतनाम का जीवन स्त्रोत वहां की विराट नदी मेकांग है। कहते हैं कि सैकड़ों वर्ष पहले बौद्ध भिक्षु जब बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए थाईलैंड में (जिसका नाम उन दिनों ‘श्याम’ था) मेकांग नदी के तट पर पहुंचे तो उन्हें लगा कि यह विशाल नदी संभवत: एक दूसरी गंगा नदी है और उनके मुंह से अनायास ही निकल गया-‘मां गंग’। जब फ्रांस ने हिन्द चीन के इन तीनों देशों को अपनी कालोनी बना लिया तो उसने इस विराट नदी का नाम ‘मेकांग’ रख दिया।
चीन अपने पड़ोसी देशों को किस तरह से तंग करता है उसका एक निजी अनुभव बताना चाहता हूं। जब मैं लाओस में राजदूत था तो मुझे आवश्यक परामर्श के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने दिल्ली बुलाया था। तब उन्होंने मुझे कहा था कि चीन ने लाओस के साथ अपना पुराना सीमा विवाद सुलझा लिया है। मैं लाओस जाऊं तो वहां के प्रधानमंत्री से बात कर उस समझौते का विवरण उन्हें भेज दूं। लाओस लौटकर जब मैंने वहां के प्रधानमंत्री से बात की तो उन्होंने टालमटोल की। आखिर एक दिन उन्होंने कहा कि मैं लाओस के विदेशमंत्री से मिल लूं।
लाओस के तत्कालीन विदेशमंत्री दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र रहे थे। टूटी-फूटी हिंदी भी बोल लेते थे। अचानक एक सर्द सुबह में वे मेरे बंगले पर आए और मुझसे कहा कि मैं सीमा विवाद पर चीन के साथ समझौते का विवरण न मांगू। वे बोले चीन एक अजगर है, जो पलक झपकते ही पड़ोस के छोटे देशों को निगल सकता है। चीन ने जबरन वहां की नदी को अपने क्षेत्र में दिखाया। उस नदी के दक्षिणी तट से प्राय: 100 किलोमीटर दक्षिण में उसने सीमा रेखा खींच दी है। हम छोटे देश चीन का कोई विरोध नहीं कर सके। जो चीन ने कहा, वही हमने मान लिया। मैंने तत्कालीन प्रधानमंत्री को यह सूचना दे दी। वे समझ गये कि यह तूफान और दीये के बीच का समझौता है और दीया कितने दिनों तक तूफान के आगे जलता रह सकता है। आज जब लाओस की खबरें पश्चिम के समाचार पत्रों में पढ़ता हूं तो अक्सर मन में यह बात आती है कि चीन ने मेकांग नदी के जल को ढाल बनाकर लाओस को इस तरह पंगु बनाया है कि भविष्य में उसके आर्थिक रूप से स्वावलम्बी होने की आशा बहुत क्षीण है।
मैं कम्बोडिया में भी राजदूत रहा हूं। वहां भारतीय सभ्यता की अमिट छाप है।  ‘अंकोरवाट’ नाम का जग प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है, जो मीलों तक फैला है। सैकड़ों वर्ष पहले भारत के कारीगरों ने कम्बोडिया जाकर यह विशाल मंदिर बनाया था। दक्षिण भारत की तर्ज पर बना यह मंदिर पत्थरों पर अंकित रामायण और महाभारत के चित्रों से भरा पड़ा है। वैसे वहां बौद्ध धर्म है, जो राजकीय धर्म भी है। बौद्ध धर्म भी भारत से प्रभावित है। इन दोनों देशों से संबंध बढ़ाकर भारत ने चीन की एशिया में बढ़ती हुई ताकत को रोकने का प्रयास किया। सरकार का यह कदम प्रशंसनीय है कि उसने वियतनाम, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाने का प्रयास किया है।

 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:ठीक नहीं रहे चीन के साथ छोटे देशों के रिश्ते