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सुलझाने पे उतरें, तो मुद्दे हैं बहुत सारे !

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की छह नवंबर से शुरू होने वाली पहली भारत यात्रा के दौरान कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर चर्चा होगी। इस यात्रा पर पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर है क्योंकि दो महान लोकतंत्रों के प्रमुखों -प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति ओबामा की बातचीत से निकलने वाले नतीजे दक्षिण एशिया ही नहीं बल्कि पूरे एशिया महाद्वीप के राजनीतिक-सामरिक परिदृश्य को प्रभावित करेंगे।

चीन के बढ़ते नकारात्मक दबदबे, अफगानिस्तान में तालिबान की समस्या, पाकिस्तान से फैल रहे आतंकवाद और पाकिस्तान के आंतरिक हालात, चीन-तिब्बत समस्या, भारत के साथ सामरिक और आर्थिक संबंध व दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका आदि ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर इस दौरे में व्यापक चर्चा होनी है।

सामरिक : भारत अपनी सेना के आधुनिकीकरण के लिए नए हथियार और रक्षा प्रणालियां खरीद रहा है। अमेरिका हाल तक भारत को हथियार देने से कतरा रहा था लेकिन 9/11 को अमेरिका पर हुए आतंकी हमले के बाद अमेरिका को भारत का महत्व समझ आया और उसके रवैये में बदलाव आया। 

फिर भी वह हथियारों के साथ कई शर्तें भी लगा रहा है। इनमें सिसमोआ के तहत सूचनाओं और संचार में भागीदारी, बेका के तहत भारत की जमीन से उपग्रहों तक संचार और एलएसए के तहत भारत में अपने जंगी पोतों और विमानों के लिए लॉजिस्टिक यानी सामग्री, रख-रखाव तथा पुर्जों को बदलने की तमाम सुविधाएं चाहता है।

बेशक वह ये समझौते द्विपक्षीय आधार पर करना चाहता है लेकिन भारत को ऐसी सुविधाओं की जरूरत नहीं है क्योंकि भारतीय सेना की मौजूदगी न प्रशांत सागर में है और न ही अटलांटिक सागर क्षेत्र में। भारत हिंद महासागर और दक्षिण एशिया में ही अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। लेकिन अमेरिका इन तीन समझौतों पर जोर दे रहा है। सेना ने सरकार से साफ कह दिया है कि उन्हें इन समझौतों से कोई फायदा नहीं होगा।

वीजा फीस और ओहायो बैन :
अमेरिका ने भारतीयों के लिए वीजा फीस काफी बढ़ा दी है। इससे अमेरिका जाने वाले प्रोफेशनल भारतीयों को काफी परेशानी हो रही है। अमेरिका के ओहायो प्रांत ने अमेरिकी कंपनियों को आउटसोर्सिग के लिए हतोत्साहित किया है। स्वंय ओबामा ने भी इस कदम का समर्थन किया है। इससे भारत की आईटी कंपनियों को भारी नुकसान हो रहा है। भारत अमेरिका के इन संरक्षणकारी कदमों से नाराज है। विदेश मंत्री एस.एम.कृष्णा कह चुके हैं कि ये मुद्दे ओबामा के समक्ष उठाए जाएंगे।

आतंकवाद : आतंकवाद सिर्फ भारत और अमेरिका ही नहीं, पूरे विश्व की समस्या है। सबको पता है कि आतंकवाद की जड़ें भारत के पड़ोस पाकिस्तान में हैं और सबसे ज्यादा कष्ट भारत को है। खुद ओबामा भी कह चुके हैं कि आतंकवाद का कैंसर पाकिस्तान में है। दोनों राष्ट्रप्रमुखों की बातचीत में पाकिस्तान से आतंकवाद खत्म करने की रणनीति पर विचार होगा।

पाकिस्तान को अमेरिकी मदद : एक ओर अमेरिका पाकिस्तान से फैल रहे आतंकवाद से चिंतित है तो दूसरी ओर अफगानिस्तान में पाकिस्तान समर्थित तालिबान के खिलाफ आतंक के खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान की ही मदद लेने को मजबूर है। इस मदद की एवज में वह पाकिस्तान को न केवल साढ़े सात अरब  डालर की आर्थिक और सैन्य मदद दे रहा है बल्कि उसे सबसे बड़ा सहयोगी भी मान रहा है। इस विरोधाभास से भारत काफी परेशान है। जानकारों का कहना है कि बातचीत में इस मुद्दे पर भारत अमेरिकी रवैये में बदलाव लाने को कहेगा।

अफगानिस्तान : अगले साल जुलाई से अमेरिका अफगानिस्तान से अपनी फौज हटाना चाहता है। अमेरिका के जाने के बाद फिर पाकिस्तान अफगानिस्तान में हावी होगा। इससे क्षेत्रीय अशांति फैलेगी और अल कायदा, लश्करे तैयबा तथा तालिबान के हौसले बढ़ेंगे। भारत चाहता है कि अफगानिस्तान में भारत के हितों की अनदेखी न हो।         

परमाणु दायित्व कानून : हाल ही में भारतीय संसद ने परमाणु दायित्व विधेयक पारित किया था। इससे शांति कार्यों के लिए परमाणु सहयोग के समझौते के तहत काम करने वाली अमेरिकी कंपनियों को दुर्घटना की सूरत में मुआवजे की भारी रकम देनी होगी। इससे अमेरिकी कंपनियां बिदक रही हैं। उनके सरोकार को ध्यान में रखते हुए ओबामा भारत से इसमें बदलाव का आग्रह कर सकते हैं लेकिन जानकारों के मुताबिक अब सरकार के समक्ष ढील देने का कोई विकल्प नहीं है। जानकारों का कहना है कि यदि अमेरिकी कंपनियां नखरे करती हैं तो घाटा उन्हीं को होगा क्योंकि भारत के साथ समझौते के लिए फ्रांस, रूस, कनाडा की कंपनियां तैयार बैठी हैं।

वारन एंडरसन का मुद्दा : ओबामा भोपाल गैस कांड के दोषी वारन एंडरसन की गिरफ्तारी के भारतीय अदालत के फैसले पर पुनर्विचार के लिए कह सकते हैं। यदि एंडरसन को गिरफ्तार कर भारत लाया जाता है तो अमेरिकी कंपनियों को बड़ा झटका लग सकता है। पहले ही आर्थिक मंदी से जूझ रहा अमेरिका अपनी कंपनियों को नाराज नहीं कर सकता।

कश्मीर का मुद्दा : पिछले साल राष्ट्रपति बनने से पहले और बाद में भी ओबामा कश्मीर मुद्दे पर कई बार बोल कर भारत को नाराज कर चुके हैं। अपनी भारत यात्रा के दौरान 8 नवंबर को वह संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करेंगे। आशंका है कि वह अपने भाषण में कश्मीर राग छेड़कर भारत की नब्ज टटोलना चाहें। हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने इस मुद्दे पर किसी भी तरह की मध्यस्थता से इंकार किया है। यदि ओबामा कश्मीर पर कुछ भी बोलते हैं तो उनकी यात्रा की सफलता पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है।

चीन का मुद्दा : चीन की बढ़ती ताकत से भारत ही नहीं अमेरिका भी काफी परेशान है। ओबामा और सिंह की बातचीत में चीन पर विस्तार से चर्चा होगी। अमेरिका भी चाहता है कि भारत हिन्द महासागर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहे और इस क्षेत्र में शांति बनाए रखे। लेकिन कुछ अर्से से चीन की बढ़ती मौजूदगी ने हिन्द महासागर क्षेत्र में हलचल पैदा कर दी है।

तिब्बत : भारत अपनी ओर से तिब्बत पर चर्चा नहीं करेगा लेकिन भारत में रहने वाले तिब्बती शरणार्थियों को उम्मीद है कि ओबामा तिब्बत की समस्या पर जरूर कुछ कहेंगे। वे अमेरिकी राष्ट्रपति का ध्यान इस ओर दिलाने के प्रयास में जुटे हुए हैं।

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