DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

हरियाणा से सबक लेंगे यूपी, बिहार?

मैं शाम को ऑफिस से निकला हूं। एक नुक्कड़ पर कुछ खरीदने के लिए रुकता हूं। दुकानदार का नाम नहीं जानता। लेकिन अरसे से चौधरी साहब कह रहा हूं। वह अचानक मुझसे पूछते हैं, ‘साहब हरियाणा वालों को कितने गोल्ड मिले?’ मैं थोड़ा सा चौंकता हूं। फिर यों ही कह देता हूं, ‘शायद 12-13 होंगे।’ वह चहकते हुए कहते हैं, ‘यह कॉमनवेल्थ तो साहब हरियाणा का था।’

मैं लौटते हुए सोचने लगता हूं। सचमुच यह कॉमनवेल्थ तो हरियाणा के ही नाम था। आखिर हिंदुस्तान को मिले 38 गोल्ड में से 13 हरियाणा के थे। एक तिहाई से ज्यादा बाजी हरियाणा के हाथ रही। फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सायना नेहवाल का जन्म भी हरियाणा में ही हुआ था। अब वह हैदराबादी हैं, यह अलग बात है।
 
हरियाणा में खेलों की बयार बह रही है। लेकिन उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड भी तो उत्तर के ही राज्य हैं। इन राज्यों में इतनी बड़ी आबादी रहती है। अगर वहां इस तरह की बयार बह जाए, तो हमारे खेलों की तस्वीर ही बदल जाए। लेकिन वहां ऐसी बयार क्यों नहीं बह रही है? क्या इन राज्यों में टैलेंट की कोई कमी है। लेकिन ऐसा लगता तो नहीं। असल में उनके यहां टैलेंट की कमी नहीं है। लेकिन वहां उस टैलेंट को मांजने और चमकाने की कमी है। उनकी सरकारों को अपने खिलाड़ियों की कोई चिंता नहीं है।

सरकार की जरा-जरा सी कोशिशें क्या कर सकती हैं, यह हरियाणा बता रहा है। और इसी कॉमनवेल्थ में उसका असर देखा जा सकता है। ‘भारत के लिए खेलो।’ यह नारा हरियाणा सरकार का है। खेलों में अपनी प्रतिभा तलाशने के लिए यह दिया गया है। और सचमुच वहां का बच्चा-बच्चा उस नारे से मस्त नजर आता है। 

अभी पिछले अप्रैल की ही बात है। अपने टैलेंट हंट के लिए सरकार ने मुहिम चलाई थी। उसी के लिए भिवानी, गुड़गांव, रोहतक, पंचकुला में स्पोर्ट्स एंड फिजिकल एप्टीट्य़ूड टेस्ट के लिए राज्य भर से 85 हजार आवेदन आए थे। उसमें से 73,522 वैध थे। सोच कर देखिए, एक छोटे से राज्य में खिलाड़ी बनने के लिए इतने आवेदन। वहां की सरकार खेलों में बहुत आगे जाना चाहती है।
 
फिर भारत के लिए खेलने और जीतने के लिए वहां की सरकार सबसे ज्यादा पैसा भी तो बांटती है। कॉमनवेल्थ के विजेता को वे 15 लाख रुपए देने वाले हैं। बेहद साधारण घरों से निकले खिलाड़ियों के लिए इस मुकाम पर पहुंचना या उन्हें वहां तक पहुंचाना मामूली बात नहीं है।  इस राज्य में खेलों की बयार भिवानी से शुरू हुई थी। वहां के बॉक्सर ने हरियाणा को खेलों के नक्शे पर ला दिया था। अखिल और विजेंदर ने वहां की फिजा ही बदल दी थी। आज भिवानी का आलम यह है कि वहां के हर तीसरे घर का बच्चा बॉक्सर बनना चाहता है। फिलहाल, वहां सात-आठ अच्छी-खासी एकेडमी चल रही हैं। 

एक दौर था, जब अपना हर बड़ा बॉक्सर भिवानी से ही निकल रहा था। लेकिन मनोज कुमार ने उसे भी तोड़ दिया। वह कैथल के हैं। अब बॉक्सिंग पूरे हरियाणा में फैल रही है। इस कॉमनवेल्थ में तीन सोना जीतने वाले लड़कों में दो हरियाणा के थे, एक भिवानी और एक कैथल का। अब हाल यह है कि लगभग हर बड़ी प्रतियोगिता में एक-दो नए हीरो सामने आ जाते हैं।

मामला एक दो चैंपियन का नहीं है। हालांकि हरियाणा का हर बच्चा बॉक्सिंग ग्लब्स पहनते हुए विजेंदर भाई बनना चाहता है। अखिल कुमार, जयभगवान, जितेंदर एक बड़ी लिस्ट है, कमाल के बॉक्सरों की। फिर इस बार कुश्ती में भी हमारी दो चैंपियन लड़कियां भिवानी की ही थीं, गीता और अनिता। 

यों हरियाणा में कई नर्सरियां हैं। मसलन भिवानी, शाहबाद मर्कंडा, झाड़सा वगैरह। लेकिन इस बार कॉमनवेल्थ के गोल्ड मेडलिस्ट को अगर देखें, तो वे किसी एक जगह से नहीं आए हैं। कुश्ती को ही लीजिए। अगर गीता और अनिता भिवानी की हैं, तो अनिल, संजय और योगेश्वर दत्त सोनीपत के हैं। राजिंदर कुमार कुरुक्षेत्र से हैं, तो रविंदर सिंह झज्जर से हैं। बॉक्सिंग में भी अगर परमजीत समोता भिवानी के हैं, तो मनोज कुमार कैथल के हैं। शूटिंग में अन्नू राज और अनीशा सईद फरीदाबाद की हैं तो हरप्रीत सिंह करनाल के हैं। एथलेटिक्स में पहला सोना लेने वाली महिला कृष्णा पूनिया हिसार की हैं।

दरअसल, वहां की माटी में ही जमीन से जुड़े खेलों के लिए कुछ है। ये लोग सामान्य भारतीयों से ज्यादा हट्टे कट्टे हैं। इसीलिए कुश्ती, बॉक्सिंग में वहां से चैंपियन निकलना अजीब नहीं है। लेकिन आजकल वहां से से महज कुश्ती और बॉक्सिंग में ही टैलेंट नहीं आ रहा है। एथलेटिक्स में भी आ रहा है। खासतौर से फील्ड इवेंट में। लेकिन शूटिंग में वहां से चैंपियन निकलना, काफी लोगों को चकित कर सकता है। अन्नू राज और अनीशा ने वह भी कर दिखाया है।
 
खेलों की दुनिया ने राज्य में लड़कियों की हालत को भी सुधारा है। धीरे-धीरे लिंग अनुपात में बदनाम यह राज्य सुधर रहा है। 2001 की जनगणना में हजार लड़कों पर लड़कियां 805 पर थीं। अब वे 861 पर पहुंच गई हैं। खेलों में लड़कियों ने शायद अपना मुकाम ढूंढ़ लिया है। खुद को समाज में इज्जत दिलाने का इससे बेहतर जरिया नहीं हो सकता। मसलन, गीता और बबीता दो बहनें हैं। इनमें गीता ने कुश्ती में सोना जीता, बबीता चांदी ही जीत सकीं। एक वक्त था, जब पूरा गांव उनका मजाक बनाता था। लेकिन अपने पिता की जिद और खुद के जज्बे से वे आज चैंपियन हैं।
 
हरियाणा में पहले से शाहबाद मर्कंडा महिला हॉकी की नर्सरी है। उसी तरह जैसे संसारपुर को पुरुष हॉकी की नर्सरी कहा जाता है। वहां की सुपर सिक्स कही जाने वाली खिलाड़ी हैं रितु रानी, सुमन बाला, सुरिंदर कौर, राजविंदर कौर, जयदीप कौर और जसजीत कौर। दोहा एशियाड में कांस्य जीतने वाली महिला टीम की ये सदस्य थीं।

कोच बलदेव सिंह ने ये सारा बदलाव किया है। उन्होंने इस छोटे से कस्बे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ला खड़ा किया। ये तमाम खिलाड़ी श्रीगुरुनानक प्रीतम सीनियर सेकंडरी स्कूल से निकली हैं। यहां से अब तक 40 अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी निकल चुकी हैं। दूसरी नर्सरी झाड़सा है। वहां से भी प्रीतम रानी जैसी जबर्दस्त खिलाड़ी निकली हैं।

अब सचमुच हरियाणा के माता-पिता अपनी बेटियों पर गर्व कर सकते हैं। उनकी लाडलियों ने उनका ही नहीं देश का नाम भी रोशन कर दिया है। आखिर उनके राज्य के मिले 13 गोल्ड में से 5 उनकी महिलाओं ने ही जीते हैं। लेकिन यूपी, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड क्यों अटके पड़े हैं। वहां की सरकारें हरियाणा जैसा कुछ क्यों नहीं करतीं? आखिर वे हरियाणा से सबक कब लेंगे?

बिहार की झोली में सोना नहीं, सिर्फ चंद्रशेखर की चांदी 
भले ही कॉमनवेल्थ का अगला पड़ाव अब ग्लासगो है, लेकिन दिल्ली में संपन्न इस खेल महाकुंभ की चमक, चांदी के रूप में बिहार में भी चमकती रहेगी। यह चमक पटना-हाजीपुर हाईवे के बीच बसे एक छोटे से गांव के चंद्रशेखर चौधरी की देन है। गौरतलब है कि बिहार से प्रतिभागियों की संख्या अंगुलियों पर गिनकर तीन थी। चंद्रशेखर चौधरी ने समरेश जंग के साथ 25 मी. स्टैंडर्ड पिस्टल पेयर्स वर्ग में रजत पदक जीतकर राष्ट्रमंडल खेलों में बिहार की ओर से पदक जीतने वाले एकमात्र खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया।

बवीना (झांसी) में 21 मैकेनाइज इंफेंट्री में कार्यरत 36 वर्षीय इस जवान ने वर्ष 1992 से शूटिंग में भाग्य अजमाना शुरू किया। अपने खाते में राष्ट्रमंडल पदक जोड़ने वाले चंद्रशेखर चौधरी ने वर्ल्ड मिलीटरी शूटिंग चैंपियनशिप में सेना के लिए दो अंतरराष्ट्रीय मेडल जीते, वहीं सात अंतरराष्ट्रीय और 48 नेशनल मेडल जीते हैं। इनका अगला लक्ष्य नवबंर में चीन में होने वाले एशियन गेम्स और दिसंबर में ब्राजील में आयोजित वर्ल्ड मिलेटरी शूटिंग चैंपियनशिप में सर्वश्रेष्ठ देना है।      
विकास पांडेय

पिछड़ने के बावजूद अब तक का बेहतरीन प्रदर्शन किया यूपी ने
राष्ट्रमंडल खेलों में उत्तर प्रदेश के खिलाड़ियों ने पांच स्वर्ण, तीन रजत और एक कांस्य पदक जीते। इनमें स्वर्ण जीतने वाले बरेली के निशानेबाज इमरान हसन खान व पहलवान मेरठ की अलका तोमर तथा रजत जीतने वाली वेटलिफ्टर सोनिया चानू और वाराणसी के ऋतुल कुमार, एक रजत व एक कांस्य जीतने वाले इलाहाबाद के जिमनास्ट आशीष कुमार तो राज्य में ही रहते हैं।

स्वर्ण पदक जीतनेवाली निशानेबाज अनुराज सिंह, पहलवान नरसिंह यादव व ओमकार सिंह हैं तो उत्तर प्रदेश के लिए पर अभ्यास अन्य राज्यों में करते हैं। राज्य के खिलाड़ियों ने कभी किसी अन्तरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में इतना उम्दा प्रदर्शन नहीं  किया। इनमें जिमनास्टिक में ऐतिहासिक प्रदर्शन करने आशीष कुमार देश के पहले ऐसे जिमनास्ट हैं, जिसने राष्ट्रमंडल खेलों में कोई पदक पदक जीता।

सोनिया चानू यूं तो मणिपुर की हैं लेकिन उत्तर प्रदेश नौकरी करने के कारण उनकी उपलब्धियां उत्तर प्रदेश के खाते में ही आई हैं। उन्होंने वेटलिफ्टिंग में रजत पदक जीता।  इसके अलावा रायबरेली की सुधा सिंह भले ही कोई पदक नहीं जीत पाईं लेकिन उन्होंने 3000 मीटर स्टीपलचेज की ऐसी दौड़ लगाई कि सभी वाहवाह कर उठे। वह दस मिनट के भीतर यह दौड़ लगाने वाली देश की पहली महिला एथलीट बन गईं। उनके अलावा जैवलिन थ्रोअर लखनऊ की सुमन देवी उम्दा प्रदर्शन करते हुए 52 मीटर के ऊपर जैवलिन फेंककर नवें स्थान पर रहीं।     
अनंत मिश्र

नई नीतियां बनाकर प्रतिभाओं को उभारेंगे उत्तराखंड में
खजान दास, खेलमंत्री, उत्तराखंड
कॉमनवेत्थ में मेडल जीतने वाले राज्य जहां अपनी उपलब्धियों पर इतरा रहे हैं, वहीं उत्तराखंड जैसे राज्य बेहद मायूस हैं, जहां का एक भी खिलाड़ी इन खेलों में कोई मेडल नहीं ला सका। वैसे राज्य के खेलमंत्री खजान दास स्वीकार करते हैं कि राज्य में कोई खेलनीति न होने के कारण प्रदेश में खेलों के लिए कोई उत्साहजनक वातावरण अभी तक नहीं बन पाया था।

लेकिन वे दावा करते हैं कि हमारे राज्य के पहाड़ी गांवों के बच्चों में भी असाधारण और अद्भुत खेल प्रतिभाएं छिपी पड़ी हैं। अफसोस की बात यही है कि जब तक उनको पर्याप्त खेल सुविधाएं प्रदान नहीं जाएंगी वे कोई बड़ा परिणाम भला कैसे दे सकते हैं।

इन खेलों से जो माहौल बना है उसके बाद उत्तराखंड भी पीछे रहने वाला नहीं होगा। हम एक साल के अन्दर एक ऐसी खेल नीति बनाएंगे, जिससे राज्य के किसी भी कोने में छिपी खेल प्रतिभा को उपेक्षित नहीं रहने दिया जाएगा। इसके लिए राज्य में खेल स्कूलों की स्थापना की जाएगी तथा इनमें गांव से निकलने वाले प्रतिभावान खिलाड़ियों को संवारा जाएगा।       
प्रस्तुति : विजेन्द्र रावत

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:हरियाणा से सबक लेंगे यूपी, बिहार?