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जिनके हौसले ने लिखी तकदीर

बात वर्ष 2000 की है। देश की पहली महिला द्रोणाचार्य एवार्ड से सम्मानित हो चुकी वेटलिफ्टिंग की कोच मणिपुर गई थीं। मकसद था मणिपुर की लड़कियों में वेटलिफ्टिंग की संभावनाएँ तलाशना। वहां जाकर वह दंग रह गईं। मजदूरों व किसानों की छोटी-छोटी बच्चियां वहां के छोटे-छोटे अखाड़ों में जाती थीं। वहां जो कुछ भी लोहा रखा रहता था, उसे उठाने में जुट जाती थीं।

इन बच्चियों का मकसद था कि वे भी कुंजरानी देवी, अनीता चानू व सनामाचा चानू जैसी नामीगिरामी वेटलिफ्टर बन जाएं। इनके घर वाले भी यही सोचते थे कि ये बच्चियां अगर कुछ बन गईं तो इनका बेड़ा पार हो जाएगा, इनकी नौकरी लग जाएगी। कहीं अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीत लिया तो सरकार भी पैसा देगी। इससे गरीबी दूर होगी और भुखमरी भी। वह वहां से पांच लड़कियां अपने साथ ले आईं। लखनऊ में साई (स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) का एक्सीलेंसी सेंटर खुला और उसमें इनका प्रवेश हो गया।

इनमें रेनूबाला तो अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जम गईं। दो बार राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीते। कभी खेतों में काम करने वाला उसका परिवार आज इम्फाल का मालदार परिवार हो गया है। खेतों में काम करने वाले पिता वाई मनी अब बड़े किसान हैं। उनकी बेटी ने उन्हें जमीन खरीद कर दी। भाई के लिए ट्रांसपोर्ट का काम शुरू करवाया। वह खुद अब रेलवे में अधिकारी बन जाएगी। अब जब रेनू अपने घर जाती कई लोग उससे कहते हैं कि वह उनके बच्चों को भी कुछ सिखाए, जिससे वे भी अपनी किस्मत संवार सकें।

यहां बात सिर्फ रेनूबाला की नहीं हो रही है। बल्कि देश के उन सभी खिलाड़ियों की हो रही है, जिन्होंने मुफलिसी में दिन गुजारे, कई-कई दिन भूखे रहे। इन राष्ट्रमंडल खेलों को ही ले लें, कुछ खिलाड़ियों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर खिलाड़ी निम्नवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं।

उत्तर प्रदेश के छोटे जिलों खासकर वाराणसी, इलाहाबाद, देवरिया, कुशीनगर के कई परिवार ऐसे हैं, जो कर्ज लेकर अपने बच्चों को खिलाड़ी बनाना चाहते हैं। बेंगलुरु में इस समय तमाम ऐसे एथलीट हैं, जो किराये का कमरा लेकर रहते हैं, वहां अभ्यास करते हैं। सुरेश पटेल, प्रियंका पटेल तो राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा भी ले रहे हैं।

इन सबका मकसद यही है कि इतना खेल लें कि नौकरी मिल जाए। नौकरी के बाद जो तनख्वाह मिलेगी उससे इतनी खुराक लेंगे कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ कर पाएं। एक बार अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ करके दिखा दिया तो इतने पैसे मिल जाएंगे कि जिंदगी संवर जाएगी।

इलाहाबाद के आशीष कुमार हो ही ले लीजिए। पिता रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे। मामूली तनख्वाह में वह न ही अपने बच्चों को ठीक से खिला पाते और न ही उनको उच्चस्तरीय शिक्षा दिला पाते। उन्होंने आशीष को जिमनास्टिक सीखने के लिए भेजना शुरू कर दिया। इसका नतीजा आज देश के सामने हैं। खेल की वजह से ही उसे रेलवे में नौकरी भी मिली और अब तो वह राष्ट्रमंडल खेलों में रजत व कांस्य पदक जीतकर लखपति भी बन गया।

राष्ट्रमंडल खेलों की पैरा तैराकी में देश के लिए पदक जीतने पर प्रशांत खुद पर गर्व महसूस कर ही रहे थे लेकिन उनके चेहरे पर सुकून और खुशी थी। सुकून इस बात कि उन्होंने बेहद विषम परिस्थितियों में अपने को इस लायक बनाया। अपने अभ्यास के लिए कर्ज लिया। अब पदक जीतने पर उन्हें जो पैसा मिलेगा उससे वह कर्ज चुकता कर देंगे। उन्हें अब नौकरी मिलने की भी उम्मीद है।

वेटलिफ्टिंग में रजत पदक जीतने वाली सोनिया चानू के पिता मणिपुर में मामूली किसान थे। दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से नसीब होती थी। उनके पिता ने सोनिया को लखनऊ के साई सेंटर में सिर्फ इसीलिए दाखिल करा दिया था कि कम से कम दो टाइम खाना तो ठीक से मिलेगा। पर सोनिया के सपने कुछ और ही थे।

वह चाहती थी कि इतनी सक्षम बन जाए कि घर का भी भला कर सके। वह अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर चमकीं। तीन साल पहले उन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस में नौकरी भी मिल गई। दारोगा से इंस्पेक्टर बन गईं। अब तो वह डीएसपी बनने वाली हैं। अब सोनिया की माली हालत भी ठीक हो गई है और रुतबा भी बढ़ गया है।

इस राष्ट्रमंडल खेल में नए पिस्टल किंग बनकर उभरे पंजाब के गुरप्रीत सिंह के पिता की हालत भी ऐसी नहीं थी वह सपने में भी सोच पाते कि उनका बेटा निशानेबाजी करेगा। जब उन्होंने देखा कि जसपाल राणा, मानवजीत सिंह, मनशेर पर सरकार ही नहीं और लोग भी  पैसों की बरसात कर रहे हैं तो उन्होंने गुरप्रीत को निशानेबाजी के लिए प्रेरित किया। उनके पिता खराद मशीन चलाते थे।

गुरप्रीत ने सेना के ओलम्पिक मिशन के तहत ट्रायल दिया और उसे चुन भी लिया गया। इस बार राष्ट्रमंडल खेलों में वह इतनी सुर्खियों में आ गए देश-दुनिया उन्हें जान गई। अब गुरप्रीत को भारत सरकार तो पदक जीतने पर नगद पुरस्कार देगी ही, साथ ही पंजाब सरकार ने भी पुरस्कार की घोषणा की है। यही नहीं सेना भी अपने इस हवलदार को पदोन्नत करेगी।

राष्ट्रमंडल खेलों में नए रिकार्ड के साथ स्वर्ण हथियाने वाले के. रवि की बात ही निराली है। उड़ीसा में उनके पिता टैक्सी ड्राइवर थे। घर की स्थिति ठीक नहीं थी। पिता की मौत के बाद जो आमदनी थी, वह भी बंद हो गई। मजबूरी में मां आंगनबाड़ी में शिक्षक बन गईं।

इन्हीं दिक्कतों के बीच रवि ने पहले बॉडी बिल्डिंग शुरू की फिर वेटलिफ्टिंग। खेल के दम पर सेना में भर्ती हुई। उनका भी मकसद यही था कि सेना में भरपेट भोजन मिलेगा और अभ्यास का मौका भी। अब रवि वेटलिफ्टिंग के सितारे हैं। उनकी आर्थिक स्थिति खेलों की वजह से ही सुधरी है। उन्होंने अपना घर भी खरीद लिया है।

महाबली सतपाल की मानें तो अब सरकार अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने पर इतना पैसा देती है कि गरीब परिवार के लोग इस बारे में सोच तक नहीं सकते। इसी राष्ट्रमंडल खेलों को ले लें तो एक स्वर्ण पदक जीतने पर खिलाड़ी कम से कम तीस लाख का मालिक तो हो ही जाएगा। नौकरी में उसका प्रमोशन पक्का है। उसका विभाग जो नगद पुरस्कार देगा, वह अलग से। इसके अलावा उसका रुतबा और सम्मान तो बढ़ेगा ही।

राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय दल के लंबी दूरी के कोच जेएस भाटिया ऐसी-ऐसी जानकारी देते हैं कि सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उनके पास हर दिन किसी न किसी को फोन आता है या लोग मिलने आते हैं। उनका यही कहना होता है कि ‘कोच साहब! मेरे लड़के को खिलाड़ी बना दो। हॉस्टल या किसी सेंटर में रहेगा तो खाना तो ढंग से मिलेगा। कुछ बन गया तो इससे अच्छा और क्या होगा।’

बहरहाल, जिस तरह मुफलिसी में दिन गुजारकर खिलाड़ियों ने अपने को तैयार किया है, जिस तरह उन्होंने अपनी गरीबी को पीछे ढकेल दिया है उससे आने वाली पीढ़ी को आगे की राह दिखाई दे गई है। वह दिन दूर नहीं जब आर्थिक रूप से कमजोर बच्चे समझदार होते ही स्टेडियमों का रुख खुद ही कर लिया करेंगे। 

निशानेबाज गुरप्रीत सिंह
25 मी. रैपिड फायर पेयर में विजय के साथ स्वर्ण पदक
10 मी. एयर पिस्टल में ओमकार के साथ स्वर्ण पदक
25 मी. रैपिड फायर व्यक्तिगत में कांस्य पदक
गुरप्रीत ने गरीबी से जूझने के लिए निशानेबाजी शुरू की थी। उनके पिता खराद मशीन पर काम करते हैं। मौजूदा समय सेना में हवलदार गुरप्रीत बहुत ही गरीब परिवार से हैं लेकिन कॉमनवेल्थ खेलों में शानदार प्रदर्शन कर उन्होंने अपने माता-पिता के सपने को साकार किया है। गुरप्रीत ने तीन साल पहले सेना में रहते हुए ही निशानेबाजी की शुरुआत की थी। यह उनका पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट था।

पैरा तैराक प्रशांत करमाकर
50 मी. बटरफ्लाई में कांस्य पदक
प्रशांत जब छोटे थे, तब दादी के साथ बस में सफर कर रहे थे। खिड़की की साइड वाली सीट पर हाथ बाहर निकाल कर बैठे थे। एक ट्रक तेजी से टक्कर मारते हुए गया और प्रशांत की जिंदगी अपाहिज हो गई। उनका एक हाथ कलाई से काटना पड़ा था। दादी आज भी जब उनके हाथ को देखती हैं तो उनकी आंखें भर आती हैं। प्रशांत ने अपनी इसी कमजोरी को हथियार बनाया और देश के नम्बर-वन पैरा तैराक बन गए। पैसा न होने के कारण प्रशांत ने अपने खेल को जारी रखने के लिए कर्ज भी लिया। वह फिलहाल बेरोजगार हैं। उन्हें उम्मीद है इस पदक के बाद उन्हें नौकरी भी मिल जाएगी।

वेटलिफ्टर के. रवि कुमार
69 किग्रा भार वर्ग में नए राष्ट्रमंडल खेल रिकार्ड के साथ स्वर्ण पदक
उड़ीसा के रवि कुमार के पिता टैक्सी ड्राइवर थे। पिता की मौत के बाद उनकी मां को आंगनबाड़ी में टीचर की नौकरी करनी पड़ी हैं। रवि आम लड़कों की तरह नहीं थे, उनका सपना कुछ और था। उन दिनों काफी मुफलिसी में जिंदगी जी रहे थे भारोत्तोलक के. रवि कुमार। परिवार की उम्मीदों का भार उठाते हुए रवि ने एक अलग ही इतिहास लिख दिया।

रवि कहते हैं कि अब उनकी स्थिति सुधर गई है। सेना में नौकरी है। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने से पैसा भी मिलता है। राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने के बाद जो पैसा उन्हें मिलेगा, उससे वह लंदन में होने वाले ओलम्पिक की तैयारी करेंगे। वह इस समय जिस तरह से प्रदर्शन कर रहे हैं उससे उनका ओलंपिक पदक का सपना भी जरूर पूरा होगा, हम यही  आशा करते हैं।


वेटलिफ्टर सोनिया चानू
48 किग्रा भार वर्ग में रजत पदक
सोनिया चानू भी मणिपुर के एक गांव की हैं। उनके पिता भी मामूली किसान हैं। उनके घर वालों के पास इतना पैसा नहीं था कि वह किसी अन्य क्षेत्र में सोनिया का कॅरिअर बनाते। 

घर की हालत देखते हुए सोनिया ने वेटलिफ्टिंग शुरू की। लखनऊ में रहकर जमकर अभ्यास किया। नतीजा यह रहा कि पहले वह जूनियर, फिर सीनियर स्तर पर राष्ट्रीय चैम्पियन बनी। फिर जूनियर एशियन चैम्पियनशिप में पदक जीतकर लाई।

राष्ट्रमंडल चैम्पियनशिप में रजत पदक जीता। दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों में वह जरा सी चूक के कारण स्वर्ण पदक नहीं जीत पाई। खेलों के जरिए ही वह उत्तर प्रदेश पुलिस में इंस्पेक्टर बनी। अब वह डीएसपी बन जाएगी।

जिमनास्ट आशीष कुमार
वॉल्ट स्पर्धा में रजत और फ्लोर एक्सारसाइज में कांस्य
बेहद गरीबी में दिन गुजारने वाले आशीष इस समय भारतीय जिमनास्टिक के सितारे हैं। उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में कमाल का प्रदर्शन किया। वह भारत के पहले ऐसे जिमनास्ट है, जिसने राष्ट्रमंडल खेलों की जिमनास्टिक प्रतियोगिता में पदक जीते हैं।

रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के बेटे आशीष ने भी कुछ कर गुजरने की तमन्ना के साथ जिमनास्टिक शुरू की थी। उन्हें जिमनास्टिक के दम  पर ही रेलवे में क्लर्क की नौकरी मिल गई है। दो पदक जीतने के बाद अब उनके खाते में भारत और उत्तर प्रदेश सरकार से जो रकम मिलेगी, वह करीब 31 लाख रुपए होगी। वह कहते हैं कि इस पैसे के कुछ हिस्से से वह माता-पिता के लिए नया घर बनवाएंगे और बाकी अभ्यास के लिए रखेंगे।

वेटलिफ्टर रेनूबाला चानू
58 किग्रा भार वर्ग में स्वर्ण पदक
मणिपुर के किसान की लड़की रेनूबाला जब लखनऊ आई थी तो ठीक से हिन्दी नहीं बोल पाती थी। उसने  एक पुरानी टी-शर्ट और एक लोअर पहन रखा था। जब वह अभ्यास करती थी तो उसके सामने घर की गरीबी नजर आती थी। साथ ही आंखों में सपना था कि वह कुछ बन गई तो घर की स्थिति बदल जाएगी। उसका यह सपना पूरा हो चुका है। यह दूसरा मौका है, जब उसने राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता है।
प्रस्तुति : संजीव गर्ग

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