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अयोध्या फैसले के सबक

अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के निणर्य का अंतिम फैसला भले ही सुप्रीम कोर्ट में हो, लेकिन व्यावहारिकता के लिहाज से यह फैसला अंतिम है। फैसले में जमीन का बंटवारा जरूर करने को कहा गया है, लेकिन यह कैसे होगा, यह मुकदमे के पक्षों पर ही छोड़ दिया गया है। इससे साफ है कि विभिन्न पक्षों को यह निर्देश मिला है कि वे साथ बैठें और यह तय करें कि विवादित स्थल को कैसे बांटा जाए, जिससे कि कोई भी समुदाय एक दूसरे के हिस्से तक आने-जाने में बाधा न बने और न ही एक दूसरे की पूजा पद्धतियों में कोई व्यवधान आ सके। तीन जजों के फैसले का यही स्वर्णिम पक्ष है।

फैसले की दूसरी खासियत यह है कि इसने राजनैतिक दलों को कोई स्टैंड लेने के काबिल नहीं छोड़ा है। और तो और, तथाकथित सांप्रदायिक तत्व भी फैसले के बाद अपनी रोटी सेंकने में विफल रहे हैं। साथ ही यह कहना कि फैसला आस्था और विश्वास के आधार पर दिया गया है, बिल्कुल गलत है। हालांकि इस बाबत समझौते के प्रयास पहले भी हुए हैं अब फिर यही करने को कहा गया है तो इसमें नया क्या है।

इसमें नया यही है कि उच्च न्यायालय ने सभी पक्षों को आइना दिखाया है। उन्हें वह जमीनी हकीकत दिखाई है, जिस पर वे खड़े हैं। 19 साल चली सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष कुछ ऐसे ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक संदर्भ और तथ्य सामने आएं हैं, जिनसे सदियों के वे मिथक टूटे हैं जो दोनों पक्षों के आमजान में घोर विश्वास का रूप ले चुके थे। यही विश्वास उन्हें अपने स्टैंड पर दृढ़ बनाए हुए था।

फैसले को पढ़ने के बाद पक्षों को अपने स्टैंड को उदार करने में सहायता मिलेगी, इसमें किसी को संदेह नहीं है। नए तथ्यों से विवादित ढांचे (मस्जिद) के बारे में और रामलला विराजमान के बारे में लोगों को तथ्यों का ज्ञान हुआ और मिथकों के आधार पर  बरसों से चले आ रहे विश्वासों (त्रुटिपूर्ण) से पर्दा उठा है।

ढांचे को मस्जिद कहा जाए कि नहीं इस पर भी स्थिति साफ हुई है। फिर ढांचे के केंद्रीय गुंबद में 1949 में मूर्तियों के आने के बाद ढांचे की धार्मिक और कानूनी स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ा, फैसले ने इसे भी स्पष्ट किया है। वहीं इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला है कि विवादित ढांचे के साथ बने निर्माण किसने किए थे।

यह बाबर के आदेश पर हुए थे या उसके किसी कारकुन ने इन्हें बनवाया था, इसका सुबूत मौजूद नहीं है, लेकिन यह जरूर है कि मस्जिद से पहले वहां कोई मंदिर अवश्य था और उसके ध्वंसावशेषों के ऊपर ही मस्जिद बनाई गई। यहां तक कि मस्जिद बनाने के लिए मंदिर के ध्वंसावशेषों का इस्तेमाल भी कि या गया, इसके पुख्ता सुबूत भी मौजूद हैं।

जस्टिस खान और अग्रवाल ने बहुमत के अपने फैसले में यह पाया है कि सन् 1528 में मस्जिद निर्माण के काफी पहले से हिन्दू यह मानते आ रहे थे कि मस्जिद और उसके पास के बड़े क्षेत्र के एक छोटे से हिस्से में भगवान राम का जन्म हुआ था। लेकिन यह विश्वास किसी विशिष्ट छोटे क्षेत्र तथा विशेष रूप से विवादित क्षेत्र के साथ अपना संबंध कायम करने में विफल रहा है।

मस्जिद बनने के बाद हिन्दुओं ने इस स्थान खासकर मस्जिद को भगवान राम की सही जन्मस्थली के रूप में पहचानना शुरू कर दिया था। इसके बाद 1855 से पूर्व राम चबूतरा व सीता रसोई अस्तित्व में आई और तब से हिन्दू उसकी पूजा कर रहे हैं। जस्टिस खान ने फैसले में लिखा है कि यह बहुत ही आश्चर्यजनक, अविश्वसनीय और आद्वितीय घटना है कि मस्जिद के अंदर तथा चहारदीवारी के भीतर हिन्दुओं के धार्मिक स्थान रहे। यहां एक तरफ मुसलमान नमाज पढ़ते रहे तो दूसरी ओर हिन्दू बराबर पूजा करते रहे।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हिन्दू तथा मुसलमान दोनों को ही विवदित स्थल का संयुक्त स्वामित्वाधिकारी घोषित किया जाता है। अगर हम यह भी कहें कि मुसलमान और हिन्दू दोनों का अलग अलग विवादित स्थल पर कब्जा है और दोनों पूजा कर रहे हैं तो भी यह औपचारिक बंटवारा नहीं माना जा सकता। इसे पूरे क्षेत्र का संयुक्त कब्जा ही कहा जाएगा।

वहीं इस मामले में दोनों पार्टियां यह भी बताने में विफल रही हैं कि किसका कब्जा किस समय से शुरू हुआ है। इसलिए क्षेत्र पर संयुक्त कब्जा रहने के आधार पर साक्ष्य अधिनियम की धारा 110 के तहत दोनों को ही विवादित क्षेत्र का टाइटल होल्डर (मालिक) घोषित किया जाता है। जस्टिस सिबगत उल्ला खान (अयोध्या मामले में तीन जजों की विशेष पीठ के अध्यक्ष) के मुताबिक हमें यह समझना चाहिए कि यह दोबारा नहीं होना चाहिए। एक बार फिर यह गिरा तो हम उठ नहीं पाएंगे। उठे भी जल्द नहीं उठ पाएंगे। आज दुनिया 1992 से तेज भाग रही है अब गिरे तो तेज गति में पिस जाएंगे। मैं मशहूर शायर इकबाल के दो शेरों का उल्लेख करना चाहता हूं-

वतन की फिक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है
तेरी बरबादियों के मशवरे हैं आसमानों में,
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालो
तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में।

मामला धार्मिक है, लेकिन मैं इसमें विख्यात वैज्ञानिक तथा चिंतक चार्ल्स डार्विन की इन पक्तियों, ‘वे प्रजातियां अस्तित्वविहीन हो गई जिन्होंने एक दूसरे के साथ सहयोग नहीं किया और खुद को नहीं बदला’ का उल्लेख करना चाहता हूं। भारतीय मुसलमान इस बात पर विचार करें कि पूरा विश्व यह जानना चाहता है कि दूसरे धर्मों के प्रति इस्लाम की क्या शिक्षाएं हैं।

हिंसा-शांति-मित्रता-सहिष्णुता-इस संदेश के साथ दूसरों को प्रभावित करने का जब भी मौका मिले और संभव हो, हमला करो या कुछ और? इस सबंध में भारतीय मुसलमानों की स्थिति अनोखी है। वे यहां शासक रहे, शासित रहे और सत्ता में हिस्सेदार हैं (नि:संदेह यह हिस्सेदारी छोटी है)। वे बहुसंख्यक नहीं हैं, लेकिन नगण्य भी नहीं हैं।

भारतीय मुसलमानों को धार्मिक शिक्षाओं और ज्ञान की बहुत बड़ी विरासत मिली है। इसलिए वे विश्व को इस्लाम की शिक्षाओं के बारे में बताने के लिए ज्यादा उपयुक्त स्थिति में हैं। आओ हम इस विवाद (अयोध्या) को सुलझाकर अपनी भूमिका की शुरुआत करें। (फैसला पेज 278 से 280) जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने अपने फैसले की शुरुआत ऋग्वेद की रिचाओं से की है। ये रिचाएं ब्रह्मांड के विनाश और सृजन से संबधित हैं।

उन्होंने कहा कि विश्व का सृजन कैसे हुआ इसे विद्वान भी नहीं जानते क्योंकि उनका सृजन भी विश्व के सृजन के बाद हुआ है। जब सूर्य और चंद्र नहीं थे तब असीम अंतरिक्ष और अंधकार था। इसका उदगम क्या है इसे भी काई नहीं जानता सिर्फ ब्रह्मा ही इसे अपनी असीम शक्तियों के माध्यम से जानता है। पीठ के तीसरे तथा अत्यधिक धार्मिक जज जस्टिस धरमवीर शर्मा ने फैसले में खास टिप्पणी नहीं की है, लेकिन उन्होंने एक मुद्दे का फैसला देते हुए भगवान श्रीराम की प्रशंसा जरूर की।

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