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कानूनी पहलूः देश की एकता के लिए

अयोध्या विवाद पर इलाहबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ का निर्णय ऐतिहासिक है। न्यायालय ने बेहद सुझबुझ के साथ यह फैसला दिया है। यह सही है कि निर्णय में एक हिस्से को रामजन्म भूमि बताना, पूरी तरह लोगों के विश्वास पर आधारित है। पर यह बाबरी मस्जिद है और यहां पर नमाज होती है, यह भी पूरी तरह लोगों के विश्वास पर है।

यह कहना पूरी तरह गलत होगा कि अदालत ने एक राजनीतिक फैसला दिया है। मै इस राय से सहमत नहीं हूं। यह धार्मिक मामला है और धर्म लोगों के विश्वास पर टिका होता है। इसलिए, अदालत को इस पहलू पर विचार करना जरूरी था। मै इस फैसले को बेहद समझदारी भरा फैसला मानता हूं। इस मामले में कोई और निर्णय नहीं हो सकता था।

कुछ लोग यह कह रहे हैं कि न्यायालय के सामने विवाद मालिकाना हक को लेकर था। यह उनकी राय हो सकती है। पर मेरा मानना है कि मिल्कियत से ऊपर विश्वास और धारणा पर निर्णय देना इस मामले में अच्छा है। क्योंकि, इससे देश की एकता व अखंडता और मजबूत होगी। वैसे भी कोई पक्ष नाखुश है, तो उसके पास सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार मौजूद है।

संवैधानिक तौर पर भी इलाहबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ का फैसला पूरी तरह सही है। इस पर किसी को कोई शक की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। कोई भी पक्ष सुप्रीम कोर्ट में जाएगा, तो यह बात खुद ब खुद साबित हो जाएगी। मै पहले कह चुका हूं कि अदालत का यह कहना है कि यह रामजन्म भूमि है, सिर्फ यहीं बात लोगो के विश्वास पर दी गई है। जहां तक सुलह का सवाल है, तो पिछले साठ साल में सुलह की कई बार कोशिश हुई हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिंहराव और अटल बिहारी वाजपेयी ने खुद पहल कर इस मामले को बातचीत से सुलझाने की कोशिश की है। पर कोई रास्ता नहीं निकल पाया। इसलिए, अदालत को फैसला सुनाना पड़ा।
प्रस्तुति : सुहेल हामिद


राजनीति का एक युगांतः फैसले का राजनीतिक प्रभाव
अयोध्या मामले में आया फैसला रथयात्रा की राजनीति का महत्वपूर्ण बिंदु माना जा सकता है। कोर्ट का फैसला वास्तव में दिखाता है कि इसके निर्णय का आधार आस्था है। हिंदुत्व को मानने वालों के लिए यह एक बहुत बड़ी सफलता है। इससे एक तरह से उनके आंदोलन पर न्यायिक मुहर लग गई है। हालांकि यह भी सच है कि फैसला अधूरा है क्योंकि जमीन का बंटवारा करने से लगता है कि न्यायाधीश खुद ही संशय में थे। विडंबना यह भी है कि जमीन के बंटवारे के इस फैसले को तीनों ही पक्ष मानने को तैयार नहीं हैं।

जहां तक राजनीतिक पार्टियों पर इसके प्रभाव की बात है तो यह फिलहाल तुरंत पता नहीं चलेगा। वैसे भी राम मंदिर मुद्दे में 1990 के दशक वाली गर्माहट अब नहीं रही। इतना जरूर है कि भारत के अस्तित्व, देश के कानून और संविधान की साख जैसे सवाल अब सतह पर आ गए है।

इन पर नई बहस शुरू होने की उम्मीद है। हो सकता है कि आने वाले बिहार चुनावों में इसका कुछ प्रभाव दिखे। जहां तक संघ परिवार की राजनीति का सवाल है तो फैसला पक्ष में आने के बाद वह शोर नहीं मचाएगा। हां, अगर न्यायाधीशों का फैसला बाबरी मस्जिद के पक्ष में जाता तो परिवार हंगामा जरूर करता।

भाजपा के लिए सयह संयम का वक्त है। 1990 के दशक वाली औश्र आज की भाजपा में अंतर है। अब दो बार से वह केंद्र की सत्ता से बाहर है और एक वैकल्पिक ताकत भी। ऐसे में उसे सोच समझकर अपनी रणनीति बनानी पड़ेगी ।

कांगेस ने जाहिर है, केंद्र से लेकर यूपी तक अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। 1980 और 1990 के दशक में इस एक मुद्दे की वजह से कांग्रेस को केंद्र और यूपी दोनों जगह नुकसान हुआ था और देश में कट्टरवाद पनपा था। इसलिए उसे सावधान रहना पड़ेगा।

वैसे मोटे तौर पर देखें तो कांग्रेस का सीधे तौर पर इस मुद्दे को लेकर कोई रोल नहीं है। केंद्र में सत्तासीन होने की वजह से उसके लिए देश के अमन चैन को बनाए रखना पहली चीज है। उसकी रणनीति भी फिलहाल शांत रहने की ही होनी चाहिए।

उत्तर प्रदेश के संदर्भ में देखे तो मायावती ने मामले में पूरा संयम दिखाया है। उनका रवैय्या इस विवाद के दौरान यूपी के पहले चार मुख्यमंत्रियों (1987 में वीर बहादुर सिंह, 1989 में नारायण दत्त तिवारी, 1990 में मुलायम सिंह और 1992 में कल्याण सिंह) से कहीं ज्यादा ठोस दिखा। इससे वे एक साथ अल्पसंख्यकों और उदारवादी हिंदुओं की पैरोकार दिख रही हैं।

जहां तक समाजवादी पार्टी का सवाल है तो मुलायम सिंह ने फैसले को न्याय की बजाय आस्था पर आधारित होने की जो प्रतिक्रिया दी है, उसमें पुराना जोश नजर नहीं आता। कुल मिलाकर फैसले को राजनीतिक पार्टिया किस तरह भुनाएंगी, ये जानने के लिए हमें थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा।
प्रस्तुति : दीपक भारती

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