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हमारा समाज बहुत उदार है, वह इसे सहन कर लेगा

देश के सामाजिक ताने-बाने की नींव मजबूत है। इसलिए बाबरी मस्जिद या नो बाबरी मस्जिद, लोगों के संबंध सामान्य हैं और उनमें कोई आक्रोश नहीं है। वे आपस में मिल-जुलकर रह रहे हैं। हां, 20 वर्ष पहले जरूर आक्रोश पैदा करने की कोशिश की गई थी और उसका एक राजनीतिक उद्देश्य था। वह उद्देश्य क्या था, यह बताने की आज जरूरत नहीं होनी चाहिए।

बहरहाल, इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद देश में स्थितियां सामान्य रहीं और यह लोगों के अनुमान के विरुद्ध है। कई दिनों से फिजा में तमाम तरह की आशंकाएं तैर रही थीं। लेकिन मुल्क में अमन कायम रहा। इसलिए हमें नेताओं के बजाय देश के अवाम में भरोसा रखना चाहिए।

जहां तक कोर्ट के जजमेंट का सवाल है, तो यह बीच का रास्ता निकालने की कोशिश है। इसमें सबको खुश करने की कोशिश दिखाई देती है। लेकिन इससे अदालत में जाने का उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। कोर्ट का दायित्व यह तय करना नहीं था कि कहां भगवान राम पैदा हुए या कहां देवी सीता की रसोई है, उसे तो साक्ष्यों के आधार पर कानून के दायरे में अपना फैसला देना होता है, लेकिन इस फैसले में मिथक को भी साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया गया है।

इससे भविष्य में काफी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। जैसा कि कुछ पक्षों ने कहा भी है, यह मामला अब आगे सुप्रीम कोर्ट में जाएगा, यानी विवाद कायम रहेगा। हालांकि मेरा मानना है कि यह विवाद भी कुछ लोगों के लिए ही रहेगा, इसमें सार्वजनिक हिस्सेदारी नहीं होगी। समय बीतने के साथ ही लोग इसे आहिस्ता-आहिस्ता भूल जाएंगे।

लेकिन मेरा मानना है कि इस फैसले से राज्य के सेक्यूलर ढांचे का यकीन कमजोर हुआ है। हम इस धारणा के साथ जवान हुए कि देश धर्मनिरपेक्ष है। इस देश की न्यायपालिका वस्तुनिष्ठ रूप से इस सेक्यूलर ढांचे के साथ है।

अयोध्या हादसे ने इसके आगे सबसे बड़ा चैलेंज खड़ा किया और मुझे लगता है कि इस फैसले के बाद राज्य के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप में मुसलमानों का विश्वास कमजोर पड़ा है। यकीनन यह देश और समाज, दोनों के लिए बहुत बड़ा नुकसान है।

आखिर हिंदुओं-मुसलमानों को एक या दो साल तक तो साथ-साथ नहीं रहना है, बल्कि उन्हें सदियों तक साथ-साथ रहना है और यदि राज्य अपना धर्मनिरपेक्ष कैरेक्टर ही नहीं बचा पाया, तब तो गंभीर स्थिति पैदा हो जाएगी। इसलिए हमें यह देखना होगा कि आगे कोर्ट की ही तरह देखने की कोशिश की जाती है या हमारी निगाह वस्तुनिष्ठ रहती है। हमारे सामाजिक संबंधों का भविष्य भी इसी तटस्थता पर निर्भर करेगी।

कुछ लोग यह सोचते हैं कि इस फैसले के बाद तो हिंदू कट्टरपंथी ताकतों को बल मिलेगा, और एक बार फिर से 1992 का मंजर हमें देखने को मिलेगा। लेकिन मेरा विचार है कि अब वह अवसर निकल गया है, जब हिंदू कट्टरपंथी ताकतें इसका फायदा उठा पातीं। दरअसल इस हकीकत को वे भी समझती हैं कि मोबेलाइजेशन की क्षमता कमजोर हुई है।

यही कारण है कि अदालत के फैसले के बाद उन्होंने कोई आक्रामक तेवर नहीं इख्तियार किया। यह ठीक है कि आरएसएस ने कल भी कहा है कि मुस्लिम पक्ष अयोध्या की उस जमीन पर अपना दावा छोड़ दें, लेकिन यह आम हिंदू का दृष्टिकोण नहीं है। यह नजरिया दरअसल भारतीय जनता पार्टी के उग्रवादी धार्मिक राजनीति का हिस्सा है।

अलबत्ता, अब वे भी जानते हैं कि वर्ष 1992 के नारों की कोई प्रासंगिकता नहीं है। देश काफी आगे निकल आया है। वे समय-समय पर शोर जरूर मचाएंगे, लेकिन इससे आम हिंदू मानस को उद्वेलित कर पाना अब संभव नहीं है।

आज के समाज में एक तरह की समझदारी विकसित हो चुकी है। और जब मैं समाज की बात कह रहा हूं, तो इसमें हिंदू-मुस्लिम के साथ-साथ तमाम समुदाय और तबके शामिल हैं। इसीलिए कोर्ट के फैसले को लेकर यदि मुसलमानों में निराशा और असंतोष भी है, तब भी उनमें कोई आक्रामक रुख नहीं दिखता। सच यही है कि भाजपा को छोड़ देश में सभी पक्ष शांति और अमन चाहते हैं।

बीएचपी और बजरंग दल जैसे संगठनों की आइडियोलॉजी ही ऐसी है कि वे शोर-शराबा करेंगे, लेकिन मेरा मानना है कि समाज में उदारीकरण रच-बस चुका है। मेरा आशय सॉफ्ट-लिबरल सोसायटी से है। इसी बुनियाद पर एक बार फिर यही कहूंगा कि इस देश के लोगों में विश्वास रखें।                              
प्रस्तुति : चंद्रकांत

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