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सुधरेंगे भारत-चीन संबंध

भारत और चीन के आपसी संबंधों में इधर यकायक कई मुद्दे ऐसे उभर आए हैं कि लगता है कि 80 वाले दशक से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधो में सुधार का जो उभार था, वह उतार की ओर मुड़ गया है। 

इन मुद्दों में जम्मू-कश्मीर के निवासियों को स्टेपल वीसा जारी करना, लेफ्टिनेंट जनरल वीएस जसवाल को वीजा देने से इंकार करना, पाक-अधिकृत कश्मीर के गिलगिट बाल्टिस्तान इलाके में चीनी सैनिकों की मौजूदगी, कुछ दिनों पहले लेह-लद्दाख क्षेत्र में चीनी पोस्टरों का किस्सा, आसपास के समुद्री क्षेत्र में चीन की चौकसी बढ़ाने के प्रयास आदि शामिल हैं, जिन पर चीन को लेकर भारतीय सामाजिक और राजनीतिक हल्कों में खास तौर पर मीडिया में आजकल बहस छिड़ी है।

निराधार है टकराव की आशंका 
इधर, भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की दलाई लामा से मुलाकात और दक्षिण कोरिया के साथ भारतीय सहकार के बढ़ने के आसार को लेकर और अमेरिकी और पश्चिम यूरोपीय देशों के साथ भारत की कई मामलों में नजदीकी को लेकर चीन ने विशेष नाराजगी जाहिर की है और उसकी ओर से ऐसी प्रतिक्रियाएं आई है, जिनमें से कुछ का संबंध विश्वव्यापी रणनीति से है।

यह भारत और चीन के बीच के संबंधों में बढ़ रही नकारात्मकता की झलक है, जिसको लेकर अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि चीन विश्वस्तर पर नंबर 2 की ताकत से नंबर 1 पर आना चाहता है। वह एशिया पर विशेष तौर पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है और चूंकि उसके इस अभियान में भारत सबसे बड़ी क्षेत्रीय अड़चन है, इसलिए वह भारत के साथ पुराने विवादों को नया रंग दे रहा है, जो तनाव की हद तक दोनों देशों को आमने-सामने खड़ा कर रहे हैं, लेकिन इन सारी आशंकाओं का कोई आधार नहीं है। दोनों मुल्क आमने सामने के किसी भी टकराव के लिए फिलहाल तैयार नहीं दिखते।

तेजी से बढ़ा है आपसी व्यापार
भारत और चीन के द्विपक्षीय संबंधों का एक दूसरा पहलू यह भी है कि भारत और चीन के बीच पिछली सदी के नब्बे वाले दशक से आपसी व्यापार और आवाजाही में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर विकसित देशों के साम्राज्यवादी रवैये के खिलाफ कई मुद्दों पर आपसी सौजन्य बढ़ा है। इस सहयोग के नतीजे दोनों देशों के विकास, आपसी सौजन्य और आर्थिक समृद्धि के नमूने बने हैं।

अल्प-विकसित देशों और दुनिया के विकासमान देशों के लिए यह एक भरोसेमंद परिदृश्य है, जहां उनकी लूटखसोट को रोकने में भारत और चीन के बीच सहयोग की एक सकारात्मक और आर्थिक साम्राज्यवाद विरोधी भूमिका है, कहना न होगा कि इस भूमिका में छोटे-मोटे अवरोधों के बावजूद बढ़ोत्तरी का क्रम रुका नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि एक तरफ तो भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय तनातनी दिखाई पड़ती है और दूसरी तरफ परस्पर सहयोग का नजारा भी कोई कम रोशन नहीं दिखाई पड़ता।

विवादों के पीछे हैं विकसित देश
बेशक शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया की तस्वीर काफी बदल गई है और शक्ति संतुलन का एक नया पैमाना उभरा है। कल की दूसरी महाशक्ति सोवियत संघ के बिखराव के बाद बहुत संभव है, चीन उस खिन्नता को अपने कद से भरना चाह रहा हो, यह भी संभव है कि पश्चिमी आर्थिक बदहाली के रू-ब-रू अपने ताबड़तोड़ विकास से वह अमेरिका को भी पीछे छोड़ना चाह रहा हो, जापान और कई पश्चिमी यूरोपीय देशों को तो वह पीछे छोड़ भी चुका है। 

यहां यह ध्यान रखने की बात है कि इसी दौर में अंतर्राष्ट्रीय पैमानों पर भारत की आर्थिक समृ़द्धि में भी उल्लेखनीय उभार दर्ज किया गया है। यही वजह है कि कई विशेषज्ञ इस शताब्दी को एशिया की शताब्दी कहते हैं। एशिया की इस शताब्दी में भारत और चीन की मिलीजुली हिस्सेदारी है। यह किसी अकेले का काम नहीं है। अत: स्वाभाविक है कि पिछड़ रहे विकसित देश इस आशाजनक सहयोग में सेंध लगा रहे हैं। यही रणनीतिक कारण है कि भारत और चीन के द्विपक्षीय संबंधों में उभरने वाले तनाव पर इन गतिविधियों का असर है।

1962 से सबक लिया है भारत-चीन ने 
सर्वविदित है कि भारत और चीन के बीच सीमा संबंधी विवाद वर्षो से चला आ रहा है। इसकी परिणति 1962 की भारत-चीन मुठभेड़ में सामने आई। तब से भारत और चीन के बीच उठने वाला सामान्य विवाद भी ऐसा तूल पकड़ लेता है कि लगता है कि दोबारा कोई मुठभेड़ होने वाली है, लेकिन यह आशंका वस्तुगत नहीं है।

सीमा को लेकर दावों और प्रतिदावों में कोई नई बात नहीं है। ये विवाद उपनिवेशवादियों ने ही रचा। हमने उसके अस्तित्व को स्वीकार किया है और वह अब एक रणनीतिक राष्ट्र है। इसलिए जब भी द्विपक्षीय विवाद उठते हैं, तो पाकिस्तान के साथ चीन के सहयोग का मामला भारत के लिए खास किरकिरी बन जाता है।

तिब्बत के मसले पर भी यह स्पष्ट है कि भारत उसे स्वायत्त राज्य मानता है, दूसरी तरफ चीन ने सीमा विवाद संबंधी कुछ मुद्दों पर अपने कठोर रवैये को ढीला किया है। 2006 में चीन सरकार ने भारत के साथ संबंध सुधारने की पेशकश करते हुए हिमालयी रेशम मार्ग को खोल दिया, जो 1962 में बंद हो गया था।

पहली जुलाई 1985 में हुए समझौते में चीन ने सिक्किम को भारत का हिस्सा मान लिया। यहां तक कि इन्हीं दिनों चीन के राष्ट्रपति ने इस्लामाबाद जाकर यह स्पष्ट कर दिया था कि कश्मीर मामला भारत और पाकिस्तान का द्विपक्षीय मामला है, उसमें चीन कोई सीधी भूमिका नहीं निभा सकता। अब बीच-बीच में इस मसले को लेकर चीन का रवैया बदलता नजर आता है तो इसका कारण द्विपक्षीय कम रणनीतिक अधिक है।

आखिर अफगानिस्तान में किसी भी बहाने अमेरिका और पश्चिमी देशों की सैनिक मौजूदगी को ओझल नहीं किया जा सकता। एशियाई सार्वभौमिकता के लिए यह एक दीर्घकालीन और रणनीतिक चुनौती है। भारत के लिए यह ऐतिहासिक सबक है कि अफगानिस्तान जो भी पहुंचा, उसने भारत में घुसने का अपना रास्ता खोला। ऐसा लगता है कि क्षेत्रीय सुरक्षा की दृ़ष्टि से चीन इसे एक अहम मसला मानता है। आतंकवाद के चलते उसकी अपनी सीमाओं में भी बवाल उठते रहे हैं।

लड़े तो काफी पिछड़ जाएंगे दोनों मुल्क
रहा, भारत और चीन के बीच उभरने वाले विवादों का बड़ी सैन्य टककर में बदलने का सवाल तो यह एक अप्रौढ़ आशंका है। आखिर 1962 की मुठभेड़ से चीन और भारत की अंदरुनी हालत पर क्या असर पड़ा, इसे दोनों ही देश अच्छी तरह जानते हैं।

इसी सबक का असर है कि भारत और चीन के बीच 1976 के आसपास से परस्पर संबंधों का सामान्य विकास और और राष्ट्रों के स्तर पर आर्थिक और तकनीकी तरक्की का जोरदार परिदृश्य उभरा है। तब से लेकर अब तक द्विपक्षीय संबंधों में विकास और सुधार हुआ है, दोनों देशों के लिए उसके अत्यंत सकारात्मक परिणाम निकले हैं। 

क्या विशेषज्ञ यह कहना चाह रहे हैं कि इस समृद्धि को ओझल कर दोनों देश विनाश के रास्ते पर चल पड़ेंगे और विकास की दौड़ में अपने को सौ साल पीछे ले जाना चाहेंगे। मुझे तो यह कतई संभव नहीं लगता। परस्पर संबंधों के विकास का सिलसिला आज की तारीख में सर्वोपरि है। उसे सैन्य मुठभेड़ में बदलते देखना तो एक दु:स्वपन जैसा ही है, जो अंधराष्ट्रीय उन्माद से ही संभव हो सकता है, यह दूर की कौड़ी है।

वास्तव में भारत और चीन के बीच उभरने वाले विवादों की पृष्ठभूमि विश्वव्यापी स्तर पर रणनीतिक अधिक है, द्विपक्षीय बहुत कम। उसे दोनों देश आपस में बातचीत के जरिए ही सुलझा सकते हैं। कहना न होगा  कि वार्ता के अनेक दौर चल चुकने के बाद भी अगर यह मसला सुलझ नहीं पाया है तो इसके कारण भी रणनीतिक है। 

विश्व स्तर की खेमाबंदी, एक दूसरे के प्रति सैनिक अभियान का उन्माद पैदा करती है। जरूरत इस बात की है कि दोनों देश एक दूसरे के प्रति शक सुबहे के इन कारणों को कम करें, लेकिन यह एक लंबा सिलसिला है और एक रात में खत्म नहीं हो सकता। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को हल करना जरूरी है लेकिन इसकी असली कुंजी यही है कि रणनीतिक कारणों को खत्म कर द्विपक्षीय  विश्वास को पुख्ता किया जाए।

पुराने हैं दोनों देशों के रिश्ते
भारत और चीन प्राचीन सभ्यता और संस्कृति वाले देश हैं, उनके बीच परस्पर शंतिपूर्ण आर्थिक और  सांस्कृति सहयोग का लंबा इतिहास रहा है। प्राचीन रेशम मार्ग इसकी एक अद्वितीय मिसाल है। भारत और चीन का अतीत लगभग एक सा रहा है। भारत पर साम्राज्यी निगाह पड़ी तो चीन भी इससे बचा नहीं।

यह तो दोनों देशों के विवेक पर निर्भर करता है कि वे सहकार की उन यादों के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं या सरकार की आधुनिक यादों के साथ। चीन के प्राचीन दार्शनिक लाओ -त्ज और उनके सैन्य रणनीति के जनक सुन -त्ज को याद करें तो उन्होंने कहा था, ‘हथियार विनाश के जनक है।

हथियारों के बल पर प्राप्त की गई विजय, विजय है ही नहीं, असली जीत तो वह है, जो बिना लड़े ही प्राप्त कर ली जाए।’ और ऐसी विजय तो वार्ता की मेज पर ही हासिल की जा सकती है। रही आधुनिक हथियारों के बल पर विजय की बात, तो भारत और चीन एक दूसरे से 19-20 हैं। 1962 के बाद गंगा और छांग च्यांग (यांग्त्सी) में बहुत पानी बह चुका है।

लड़ने की सोचना, विनाश की घड़ी को पास ही बुलाना है। भारत और चीन के बीच सुधार की प्रक्रिया यही है कि 1980 के दशक से चल रही प्रक्रिया को और मजबूत किया जाए और द्विपक्षीय संबंधों को केंद्र में रखकर अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक तत्वों से मुक्ति पाई जाए।

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