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1950 में दायर हुआ था पहला दावा: अयोध्या मामला

विधि संवाददाता लखनऊ

राम जन्म भूमि/बाबरी मस्जिद के स्वामित्व विवाद को लेकर सबसे पहले जनवरी 1950 में गोपाल सिंह विशारद (अब मृत) ने फैजाबाद की दीवानी अदालत में दावा दायर किया था। फैजाबाद की दीवानी न्यायालय में चार अन्य मुकदमे मार्च 1950 में परमहंस रामचंद्र दास बनाम जहूर अहमद, वर्ष 1959 में निर्मोही अखाड़ा बनाम प्रिय राम रिसीवर, दिसंबर 1961 में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड बनाम गोपाल सिंह विशारद तथा 23 जुलाई 1989 को राम लला विराजमान बनाम राजेंद्र सिंह दाखिल हुए। विवाद की संवेदनशीलता को देखते हुए राज्य सरकार के अनुरोध पर हाईकोर्ट ने वर्ष 1989 में सभी मुकदमों को फैजाबाद की अदालत से परीक्षण के लिए उच्च न्यायालय में मँगा लिया था। साथ ही इसकी सुनवाई के लिए न्यायाधीशों की तीन सदस्यीय विशेष पूर्ण पीठ का गठन किया था। वर्ष 1996 में इन चारों मुकदमों की गवाही की कार्रवाई शुरू हुई। वर्ष 2001 में मामले के एक पक्षकार परमहंस दास ने अपना दावा वापस ले लिया था। सुनवाई के दौरान सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से 33 गवाहों को परीक्षित कराकर कहा गया था कि मुसलमानों ने वर्ष 1528 में बाबर के जमाने में खाली जमीन पर मस्जिद बनवाई थी। तब से वह लगातार मुसलमानों के कब्जे में है और इस पर वे नमाज अता करते चले आ रहे थे। वहीं रामलाल विराजमान व अन्य (हिन्दू पक्ष) की ओर से 54 गवाहों को परीक्षित कराकर कहा गया था कि कथित बाबरी मस्जिद वाली जमीन पर एक लंबे अर्से से राम मंदिर बना हुआ था। वर्ष 1528 में बाबर ने इस्लाम का झण्डा फहराने व मुसलमानों का एकल राज्य घोषित करने की मंशा से मंदिर तोड़कर वहाँ मस्जिद का निर्माण करवा दिया। यह भी कहना था कि मस्जिद के ढाँचे के नीचे का हिस्सा मंदिर का स्वरूप ही था। इस तथ्य की पुष्टि अदालती आदेश के बाद वहाँ की गई खुदाई से भी हुआ है। यह भी तर्क दिया गया था कि इस मस्जिद में कभी भी नमाज नहीं अता की गई। यह हमेशा हिन्दुओं के कब्जे में रही है। वर्ष 2000 के बाद इस मामले में उभयपक्षों की बहस शुरू हुई थी। इस पूरी सुनवाई के दौरान कई न्यायाधीश अवकाश प्राप्त हो चुके हैं।

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