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तरक्की की दौड़ में हम कहां हैं?

पिछली शताब्दी सचमुच मानव मुक्ति की शताब्दी थी, जिसने अनेक देशों को गुलामी की जंजीरों से आजाद किया था, मानव के भीतर स्वतंत्रता की चेतना को जगाया था और एक कारगर व्यवस्था के रूप में लोकतंत्र को...

तरक्की की दौड़ में हम कहां हैं?
लाइव हिन्दुस्तान टीमSat, 14 Aug 2010 11:27 PM
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पिछली शताब्दी सचमुच मानव मुक्ति की शताब्दी थी, जिसने अनेक देशों को गुलामी की जंजीरों से आजाद किया था, मानव के भीतर स्वतंत्रता की चेतना को जगाया था और एक कारगर व्यवस्था के रूप में लोकतंत्र को प्रतिष्ठापित किया।

अकेले ब्रिटिश हुकूमत के ही अधीन 50 से अधिक देश थे। फिर फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, जर्मनी, हॉलैंड और बाद में अमेरिका जैसे देशों के अधीन भी कम देश नहीं थे। कुल मिलाकर ऐसे देशों की संख्या 100 से अधिक ही बैठती है। पूरा अफ्रीका महाद्वीप, दक्षिण अमेरिका और पूर्वी एशिया एक समय पराधीन ही थे।

लेकिन जैसे ही भारत में आजादी का बिगुल बजना शुरू हुआ, लगभग सभी देशों में स्वातंत्र्य कामना बलवती हो उठी। साम्राज्यवादी ताकतों को भी लगने लगा कि अब बहुत दिनों तक उपनिवेशवाद जारी नहीं रह सकता। इसलिए भारत की आजादी की लड़ाई के साथ-साथ बर्मा, श्रीलंका जैसे देशों को भी आजादी मिल गई, जबकि उन्होंने उस आंदोलन में कोई खास भूमिका नहीं निभाई थी।

लेकिन असली सवाल यह है कि 1947 के आसपास आजाद हुए देशों के बरक्स आज भारत कहां खड़ा है? चीन, उत्तर और दक्षिण कोरिया, इस्राइल, श्रीलंका, बर्मा, सीरिया, जॉर्डन, लाओस, लीबिया, टय़ूनीशिया, इंडोनेशिया, मलयेशिया भी 1950 के आसपास ही अपने किसी न किसी यूरोपीय आका से आजाद हुए थे।

फिर हमारे सहोदर पाकिस्तान के बारे में क्या कहना। इन सभी देशों में चीन, इस्राइल और दक्षिण कोरिया ही  ऐसे देश हैं, जिन्होंने लगातार तरक्की की है। चीन इसलिए तरक्की कर पाया कि वहां आजादी के तत्काल बाद साम्यवाद आ गया। उसका भूगोल हमसे लगभग तीन गुना है।

लोकतंत्र जैसी व्यवस्था के चलते चीन जैसे विशाल देश को संभालना मुश्किल भी था। फिर इसे चीन की खुशकिस्मती कहिए कि उसे कुछ ऐसा नेतृत्व मिला जिसने देश को बदलते जमाने के अनुरूप मोड़ा। यदि देंग शियाओ पिंग अस्सी के दशक में अपने देश की आर्थिक पुनर्रचना नहीं करते और निजी पूंजी को बढ़ावा नहीं देते तो शायद उसका हाल भी सोवियत संघ जैसा ही हो गया होता।

खैर, आज चीन दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनने की दिशा में अग्रसर है। उसकी अर्थव्यवस्था, उसकी सैन्य ताकत और उसका भूगोल, सभी उसके पक्ष में गवाही देते हैं। जहां तक इस्राइल और दक्षिण कोरिया की तरक्की का सवाल है, उन्हें शुरू से ही अमेरिका का सहयोग मिला। उनका विकास अमेरिकी छत्रछाया में हुआ। जहां भी मुश्किल आई, अमेरिका ने उन्हें उबारा। इन दोनों ही देशों को अपने पड़ोसियों की तरेरी हुई आंखों का सामना करना पड़ा। जब भी ऐसा हुआ, अमेरिका ने उनकी मदद की। इस तरह से अमेरिकी संरक्षणवाद में इन दोनों ही देशों में पूंजीवाद पनपा। और ये देश तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते गए।

बाकी लगभग सभी देश तरक्की की दौड़ में हमसे बहुत पीछे हैं। इनमें से लगभग हर देश किसी न किसी समस्या से जूझ रहा है। कहीं सैन्य शासन है तो कहीं गृहयुद्ध चल रहा है। कोई एक व्यवस्था यदि कहीं टिकी रह पाई तो वह सिर्फ भारत वर्ष है। शायद यही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसके लिए आज स्वाधीनता की 63वीं वर्षगांठ पर हमें अपने संविधान निर्माताओं को नमन करना चाहिए, जिन्होंने हमें अपनी प्रकृति के अनुकूल लोकतांत्रिक व्यवस्था दी और जैसे भी हो, हम उसे खींचते आ रहे हैं।

सबसे बड़ी आबादी चीन की नहीं, भारत की
भारत से तुलना करने के मामले में यह मुद्दा सबसे अहम है। चीन में आबादी का प्रति किलोमीटर घनत्व भारत की तुलना में आधे से भी कम है। हमारे पास विश्व का करीब तीन फीसदी भू-भाग है, जबकि चीन के पास नौ फीसदी। यानी, चीन भारत से करीब तीन गुना बड़ा है। अत: दोनों देशों की आबादी की तुलना कैसे हो सकती है?

चीन की आबादी हमसे तीन गुनी ज्यादा हो, तब तो तुलना हो भी सकती है। तथ्य यही है कि प्रति किलोमीटर घनत्व के हिसाब से भारत दुनिया की सर्वाधिक आबादी वाला देश आज भी है। अत: आबादी का विस्फोट रोकने के उपाय भी हमारे यहां इसी के अनुरूप होने चाहिए।

तरक्की चले चीन-सी चाल
चीन का नाम भी उन देशों की सूची में है, जोभारत की आजादी के आसपास के दिनों में ही आजाद हुए। गृहयुद्ध के बाद 1949 में समाजवादी ताकतों ने यहां सत्ताधिकार पाया। उसके बाद से समूचे विश्व में जनसंख्या की दृष्टि से पहले और क्षेत्रफल के लिहाज से तीसरा स्थान रखने वाले इस देश ने तेजी से उभर रही अर्थव्यवस्था के तौर पर खुद को स्थापित किया है। चीन न सिर्फ आबादी के मामले में हमसे आगे है बल्कि अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में भी सीधे चुनौती देता दिखता है। मोर्चा विदेशी निवेश का हो, निर्यात का, उत्पादन का सवाल हो या श्रम शक्ति उपयोग का, चीन ने भारत को पीछे किया है। 

सामाजिक असमानता : वामपंथ का आधार है कि गरीब और अमीर के बीच सामाजिक असंतुलन न हो। चीन में वामपंथ शासन को वर्षो बीत गए हैं, लेकिन ऐसा सामंजस्य आज तक स्थापित नहीं हो सका है। चीन 2001 में विश्व व्यापार संगठन का हिस्सा बना और इससे उसकी आर्थिक स्थिति में सुधार आया, लेकिन इससे तेजी से शहरी और औद्योगीकरण हुआ। किसान बेरोजगार होते गए। आज भी चीन की चकाचौंध के पीछे गरीब जनता रहती है जिनके पास खाने के लिए अन्न भी नहीं है।

आर्थिक अनिश्चितता : 1978 में चीन ने जब आर्थिक सुधार कार्यक्रम अपनाया तो इस देश ने तेजी से आर्थिक प्रगति की और करीब 9 फीसदी की विकास दर साल दर साल अर्जित की। आर्थिक सुधार कार्यक्रम को ओपन डोर पॉलिसी का नाम दिया गया। व्यापारियों के लिए दरवाजे खोल दिए गए। सर्वाधिक ध्यान इस बात की ओर दिया गया कि विदेशी निवेश अधिकाधिक हो।

परमाणु हथियारों का भंडार : भारत की तुलना में चीन का परमाणु हथियारों का भंडार बहुत बड़ा है। चीन का रक्षा बजट भारत के रक्षा बजट से अधिक है। अमेरिका के बाद चीन विश्व का दूसरा देश है जो हथियारों का सौदागर है। दुनिया में लगभग 53 देश हैं, जिनको चीन लगातार हथियार बेच रहा है।

भारत के दक्षिण एशिया में एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरने का चीन विरोध कर रहा है। पाकिस्तान को फौजी और परमाणु मदद, म्यांमार की जमीन पर चीनी अड्डे तथा म्यांमार को शक्तिशाली हथियार बेचने व दान में देने की नीति, नेपाल में चीनी प्रभाव बढ़ाने के प्रयास इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। भारत-अमेरिका परमाणु सौदे का चीन ने पुरजोर विरोध किया। चीन नहीं चाहता कि भारत-अमेरिका के रिश्तों में गुणात्मक सुधार हो।

पानी की किल्लत : चीन में पानी की भारी किल्लत है। चीन में 617 बड़े शहर हैं और इनमें से आधे शहरों में पानी की पूर्ण उपलब्धता नहीं है। राजधानी बीजिंग में भी पानी की किल्लत है। विश्व बैंक के अनुमान के अनुसार मेनलैंड चीन का पानी का प्रति व्यक्ति हिस्सा 2700 क्यूबिक मीटर वार्षिक है जो विश्व के अनुपात में एक चौथाई ही है। और आगामी वर्षो में पानी को लेकर संघर्ष होने की सम्भावना है।

माना जाता है कि चीन 2025 तक अमेरिका को नंबर -1 के पायदान से हटा देगा। इससे पहले चीन वर्ष 2005 में ब्रिटेन व फ्रांस और 2007 में जर्मनी को पीछे छोड़ दुनिया की तीसरे नंबर की अर्थव्यवस्था बना था। चीन इस समय दुनिया के समृद्घ व उभरते देशों के समूह जी-20 का सदस्य है और विश्व मंच पर उसकी मजूबत हैसियत है।

लेकिन आकार में विश्व की दूसरी अर्थव्यवस्था बन जाने वाले चीन में प्रति व्यक्ति आय 3800 डॉलर सालाना है। इस साल जून तक चीन की अर्थव्यवस्था पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 11.1 फीसदी बढ़ी है। इस समय चीन के पास दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा विदेशी मुद्रा भंडार है। उसके खजाने में अभी 2,45,000 करोड़ डॉलर हैं। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अभी 28,294 करोड़ डॉलर का ही है।

फिर भी चीन के मुकाबले अपने यहाँ के लोगों को ‘राइट टू इन्फॉरमेशन’ जैसे हथियार भी लोगों के पास है, जिससे हमारे लोकतंत्र की मजबूती और जन-अधिकारों की जागरूकता का अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन ऐसे भी कई क्षेत्र हैं, जिनमें चीन ने हमें पछाड़ा है सस्ते उत्पाद बनाना, जीडीपी के स्तर को बनाए रखना, विदेशी निवेशकों को बेहतर सुविधाएं प्रदान करना, बड़ी आबादी को बेहतर शिक्षा देकर विकास में भागीदार बनाने जैसे काम शामिल हैं। इनसे जरूर भारत को सबक शीखना चाहिए।

फौजी तानाशाही तले म्यांमार
भारत से चार माह और कुछ दिन बाद ब्रिटिश शासन से आजाद हुआ म्यांमार प्रगति और विकास के स्तर पर भारत से काफी पीछे है, और साथ ही आंतरिक मतभेदों से भी जूझ रहा है, जो अंतत: उसकी विकास यात्रा को बाधित कर रहे हैं। 1937 तक यह देश ब्रिटिश शासन अधीन भारत के अधिकार क्षेत्र में था। 4 जनवरी, 1948 को बर्मा ब्रिटिश शासन से अलग होकर एक स्वतंत्र देश अवश्य बना पर लोकतांत्रिक भारत के विपरीत यहां सैनिक शासन का प्रभाव ही अधिक रहा।    

भ्रष्टाचार के स्तर पर वर्ष 2007 में बर्मा को अंतर्राष्ट्रीय संस्था ने बर्मा को देश के सबसे अधिक भ्रष्ट देशों में शुमार किया गया। वर्ष 2000 में इसकी गिनती सबसे दरिद्र देश के रूप में की गई। मानव अधिकारों के हनन और सैन्य शासन की स्थितियों के मद्देनजर म्यांमार बर्मा पर अमेरिका और यूरोप देशों की ओर से भी लगातार राजनीतिक दबाव डाला जाता रहा है।

भौगोलिक दृष्टि से पश्चिम में भारत और पूर्व में थाइलैंड और चीन के मध्य इसकी स्थिति इसे भारत और चीन दोनों देशों के लिए राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना देती है। यही कारण है कि इस देश के आंतरिक मतभेदों, चीन और म्यांमार के आपसी संबंधों व गतिविधियों पर भारत का सतर्कता बरतना जरूरी हो जाता है। इसके बावजूद यह देश शांति, आधुनिक, विकसित और अनुशासित लोकतांत्रिक देश के रूप में भारत से काफी पीछे है। आंकड़ों के अनुसार बर्मा की जनसंख्या 48,137,741 है, जिसके वर्ष 2050 तक 44 430 144 होने की उम्मीद की जा रही है। एक चौथाई के करीब जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे रहती है।

अर्थव्यवस्था : म्यांमार में प्रति व्यक्ति 70,500 रुपये के सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में भारत में लगभग 138,227 रुपये प्रति व्यक्ति जीडीपी है। यहां महंगाई दर 7.7 प्रतिशत और बेरोजगारी की दर 5 प्रतिशत है। म्यांमार में अन्य क्षेत्रों पर सरकार द्वारा किए जाने वाले खर्च में जीडीपी का लगभग 40 प्रतिशत सैन्य खर्च किया जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार यहां के नीति नियामकों की योजनाएं काफी अस्थिर हैं, जिसके कारण सभी क्षेत्रों का विकास प्रभावित हो रहा है, हालांकि ऊर्जा क्षेत्र में हो रहा विकास इसकी अर्थव्यवस्था को बनाए रखने में विशेष सहायक है।

आधारभूत ढांचा विकसित न होने, महंगाई दर अधिक होने और मुक्त बाजार व्यवस्था का सीमित प्रभाव होने के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था में बर्मा की विशेष भूमिका देखने को नहीं मिलती। बर्मा को दक्षिण एशिया के गरीब देशों में गिना जाता है। आज देश में उचित आधारभूत ढांचे की कमी है। बड़े शहरों को छोड़ दिया जाए तो महामार्गों का निर्माण नहीं हुआ है। राजधानी यंगून तक में कई आधारभूत सुविधाओं का अभाव है।

साक्षरता : भारत की कुल 61 प्रतिशत साक्षरता दर की तुलना में वर्ष 1995 के आंकड़ों के अनुसार बर्मा की कुल साक्षरता दर 83.1 प्रतिशत है। वहीं इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 108900 है। 

स्वास्थ्य : स्वास्थ्य खर्च में बर्मा का स्थान विश्व में काफी नीचे है। डब्ल्यूएचओ इसे बुरी स्वास्थ्य व्यवस्था में शुमार करता है। 
पूनम जैन

संघर्ष का नाम है इजराइल
इजराइल का वजूद उतना ही पुराना है जितनी भारत की आजादी। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाजी जर्मनी का सबसे अधिक त्रास यहूदियों ने ही झेला था। यूरोप और अन्य देशों से किसी तरह बच कर भागे यहूदियों ने युद्ध समाप्ति के बाद पश्चिम एशिया में संयुक्त राष्ट्र नियंत्रित येरुशलम के निकट बेहद विपरीत परिस्थितियों में नए सिरे से जीवन की शुरुआत की।

29 नवंबर 1947 में संयुक्त राष्ट्र में फिलस्तीन के विभाजन के पक्ष में पड़े वोटों के बाद अर्तेज इजराइल अस्तित्व में आया। लेकिन अरबों ने अपनी भूमि पर इस नए मुल्क की तामीर को नामंजूर करते हुए इजराइल को मिटाने के लिए खंजर हाथ में उठा लिया। इसकी परवाह न कर इस इकलौते यहूदी देश ने14 मई 1948 को अपनी आजादी का ऐलान कर दिया।

तब से लेकर आज तक वह अपने वजूद को बचाने के लिए दुनिया के सबसे खूंखार आतंकवाद का सामना करता रहा है, लेकिन इसके बावजूद उसने जीवन के हर क्षेत्र में प्रगति और विकास की जो इबारत लिखी है, उसका कायल भारत भी रहा है और दबे-छिपे ही सही, रक्षा अनुसंधान, तकनीक, बौद्धिक संपदा, जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में हम उसके अनुभवों को बांटते भी आए हैं।

भारत ने लंबे ऊहापोह के बाद 1992 में इजराइल के साथ पूर्णकालिक राजनयिक रिश्ते स्थापित किए थे। यहां  नब्बे फीसदी यहूदी हैं। इजराइल से अलग भारत ने विविध धर्मो और संस्कृतियों को एक सूत्र में बांधने की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर एक प्रगतिशील देश का निर्माण किया है।

-सकल घरेलू उत्पाद में भारत का स्थान दुनिया में चौथा है, जबकि इजराइल का 49वां। हालांकि इजराइल की गिनती विकसित देशों में होती है। वह इस कतार में 17वें स्थान पर है।

-दूसरी ओर प्रति व्यक्ति आय में भारत विश्व में 128वें पायदान पर है इजराइल 29वें।

-इजराइल की अर्थव्यवस्था का विश्व में 41वां स्थान है जबकि भारत 11वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। आज हम दुनिया के दस बड़ी औद्योगिक हस्तियों में शुमार हैं और हमारी अर्थव्यवस्था को चीन और अमेरिका के बाद सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था है।

-इजराइल अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में विश्व का सातवां खिलाड़ी है। लेकिन भारत की उपलब्धियों इस मायने में अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं कि हमने यह सब अपने बूते हासिल किया है, जबकि इजराइल की पीठ पर अमेरिका जैसी महाशक्ति का हाथ रहा है।

-जल संरक्षण और जल-विद्युत के उपयोग के मामले में उसकी गिनती विश्व के चोटी के देशों में होती है। इंटेल और माइक्रोसॉफ्ट ने अपनी पहली विदेशी शोध इकाइयां वहीं स्थापित कीं।        
व्योमेश जुगरान

अस्थिर बना रहा श्रीलंका
श्रीलंका को ब्रिटेन से आजादी 4 फरवरी 1948 को मिली और 22 मई 1972 को गणतंत्र बना। समाजवाद ने 1948 से 1977 के बीच श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को मजबूती से प्रभावित किया। इस दौर में उद्योगों को नेशनालाइज कर कल्याणकारी राज्य की स्थापना की गई। हालांकि इससे देश में लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठा और शिक्षा के स्तर में सुधार हुआ लेकिन इससे देश के विकास की गति धीमी पड़ी।

इसका असर विदेशी निवेश पर पड़ा। 1977 से यूएनपी की सरकार ने देश में निजीकरण को बढ़ावा दिया। फूड प्रोसेसिंग, टेक्सटाइल्स, टेलीकम्युनिकेशंस और फाइनेंस जैसे क्षेत्रों को गति दी। इस साल न्यूयार्क टाइम्स ने दुनिया की 31 घूमने जाने लायक जगहों मे श्रीलंका को पहला स्थान दिया है।

शिक्षा : श्रीलंका में साक्षरता दर 92% है और यहां की 83% आबादी को सेकेंड्री एजुकेशन उपलब्घ है। आंकड़ों से स्पष्ट है कि विकासशील देशों में यह सबसे साक्षर देश है। देश में लगभग 99% बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के लिए स्कूल भेजा जाता है, जहां नौ साल की अनिवार्य शिक्षा दी जाती है।

1945 से ही श्रीलंका में मुफ्त शिक्षा सिस्टम लागू है। प्राथमिक शिक्षा मुफ्त होने के चलते ही देश में शिक्षा का स्तर ऊंचा है क्योंकि आगे के स्तरों पर भी यहां मुफ्त शिक्षा ही दी जाती है। पिछले कुछ दशकों में यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई स्कूल खोले गए हैं। यहां 16 सरकारी यूनिवर्सिटी हैं। इनमें कोलंबो यूनिवर्सिटी, पेराडेनिया, केलानिया और मोराटुवा यूनिवर्सिटी आदि शामिल हैं।

खेल : श्रीलंका का राष्ट्रीय खेल वॉलीबॉल है, हालांकि भारत की ही तरह यहां क्रिकेट भी  लोकप्रिय है। नब्बे के दशक में श्रीलंकाई क्रिकेट टीम ने रिकार्ड कामयाबी पाई और 1996 में आस्ट्रेलिया से विश्व कप जीता। देश में सिंघली स्पोर्ट्स क्लब, प्रेमदासा स्टेडियम और दांबुला अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम हैं, जो देश में पानी वाले खेलों जैसे, बोटिंग, सर्फिग और स्विमिंग के लिए बेहतर तो माहौल दर्शाते है। यहां के बीच टूरिस्टों को काफी आकर्षित करते हैं।                                          
दीपक भारती

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