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बदइंतजामी के मकड़जाल में कॉमनवेल्थ खेल

उत्तर भारत में जब त्यौहारों का मौसम, रामलीलाओं की धूम और गुनगुनाती धूप की लोग साल भर से मौज लेने की टकटकी लगाए रहते हैं, उस सीजन में दिल्ली में कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन के लिए सज संवर रही दिल्ली को देशवासी कौतुहल से देख रहे थे।

मेट्रो ने तो दिल्ली का चेहरा भले ही बदल दिया, लेकिन कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी में स्टेडियम से लेकर सड़कों की कायापलट की आशा संजोए आम लोग रोज-रोज बढ़ती महंगाई के बोझ को यह मान कर ढो रहे थे कि चलो दिल्ली की सड़कें चौड़ी हो रही हैं, पुल बन रहे हैं, आवागमन की सुविधाएं आधुनिक हो रही हैं, लेकिन लोगों का यह भ्रम टूटते देर नहीं लगी कि इसकी आड़ में कुछ और ऐसा भी हो रहा है, जो हर किसी को नागवार गुजरेगा।

केन्द्रीय प्रवर्तन निदेशालय, जिस पर कि देश विदेश से आर्थिक अपराधों से जुड़े तारों की जांच करने की जिम्मेदारी होती है, को कैबिनेट सचिवालय की तरफ से खेल आयोजन समिति के दो प्रमुख अधिकारियों टी. एस. दरबारी, संयुक्त महाप्रबंधक व संजय महेन्द्रू (पूर्व उपमहानिदेशक) के खिलाफ जांच करने का फरमान मिला। 

इन पर आरोप है कि इन्होंने पिछले साल 29 अक्टूबर को लंदन में ब्रिटिश कंपनी ए. एम. फिल्म के मालिक आशीष पटेल के साथ ऐसी संदिग्ध डील कर ली, जो अवैध थी और 3.8 करोड़ रुपया ब्रिटेन में कॉमनवेल्थ क्वीन बेटन रिले समारोह के नाम पर हवाला के जरिए ट्रांसफर करवा दिए गए। इन लोगों के खिलाफ फेमा के तहत जांच चल रही है।

लेकिन इससे पहले ही केन्द्रीय सतर्कता आयोग दिल्ली में कॉमनवेल्थ खेलों के लिए करीब 80 हजार करोड़ रुपए के एक हिस्से के बजट में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, सरकारी धन की लूट-खसोट और निर्माण कार्यो के ठेकों में भारी अनियमितताएं और जनता से वसूले गए टैक्स के पैसे में घालमेल का भंडाफोड़ कर चुका था।

सीवीसी ने दिल्ली में 15 ऐसे निर्माण कार्यो का लेखा-जोख तैयार किया, जहां ग्रिड सैपरेटर से लेकर एलेवेटेड रोड बनाने, जमीन का कटान, बिजली का काम, फ्लाई ओवर व अंडरपास बनाने, स्विमिंग पूल, ट्रेनिंग हॉल, फिटनेस सेंटर, एथलीट ट्रैक, स्ट्रीट लाइटें, बैडमिंटन और इंडोर स्टेडियमों के काम, तालकटोरा जैसे स्टेडियम को आधुनिक बनाने व रेलवे क्रॉसिंग पर पुल और सड़कों के विकास व विस्तार जैसे कई तरह के काम होने थे। 

दिल्ली व केन्द्र सरकार की 6 निर्माण एजेंसियों को सीवीसी ने जांच के दायरे में रखा है। इनमें डीडीए के अलावा एनडीएमसी, एमसीडी, राइट्स, पीडब्ल्यूडी व सीपीडब्ल्यूडी जैसी प्रमुख निर्माणकारी विभाग शामिल हैं।

सत्रह गुना बढ़ा बजट
आमतौर पर इन विभागों में घपले-घोटालों का कोई अंत नहीं है। लेकिन कॉमनवेल्थ जैसे अंतर्राष्ट्रीय आयोजन की आड़ में इन विभागों के आला अधिकारी परियोजनाओं की गुणवत्ता के साथ इस तरह का खिलवाड़ करेंगे, आमलोगों को ऐसी उम्मीद कम ही थी।

दिलचस्प बात यह है कि एक टेंडर में तो ऐसी अव्वल दर्जे की हेराफेरी हुई कि कम दाम पर छूटे टेंडर को खोलने के बाद उसमें 3 करोड़ बढ़ा कर दिखा दिए गए। जाहिर है कि यह पैसा संबंधित परियोजना ठेकेदार के पास सीधे तौर पर मिली भगत का नतीजा था।

शायद बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि जब कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारियां शुरू हुईं तब से अब तक कॉमनवेल्थ खेलों का बजट 17 गुना बढ़ चुका है। शुरू में कहा गया था कि इस कसरत पर 665 करोड़ रुपए खर्च होंगे, लेकिन अब यह राशि 11,994 करोड़ रुपए पार कर चुकी है। 2003 में जब भारत ने कॉमनवेल्थ खेल आयोजित करने का बीड़ा उठाया था, यह तब की बात है। कॉमनवेल्थ खेल आयोजन समिति के चेयरमैन सुरेश कलमाडी सफाई देने के लिए जब-जब मुंह खोल रहे हैं, विवाद थमने के बजाए और बढ़ रहा है।

ठेके देने में घोटाला
सबसे पहले तो कांग्रेस में उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी और पूर्व खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर ने यह धमाका करके कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजकों के होश फाख्ता कर दिए जब उन्होंने यह कह डाला कि खेल सफल हो गए तो मुझे बड़ी अप्रसन्नता होगी। कलमाडी ने तब मणिशंकर अय्यर को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि उन्होंने एक राष्ट्रविरोधी बयान दिया है।

अय्यर के बयान के समर्थन और विरोध में खूब चटखारे लेकर चर्चाएं हुई, लेकिन ऐसा लगता है कि कॉमनवेल्थ खेलों में धन की लूट और भ्रष्टाचार की खबरें के बारे में अय्यर को सब कुछ पहले से ही मालूम था और उनका गुस्सा इसीलिए फूटा कि खेलों की ताबड़तोड़ तैयारियों की आड़ में अवैध धन-संपत्ति बटोरने के अभ्यस्त लालची आला खेल अधिकारी किस तरह से देश की प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिला रहे हैं।

सीवीसी ने यह धमाका करके सबको चौंका दिया कि खेल परियोजनाओं से जुड़े ठेकों में जाली ढंग से गुणवत्ता सर्टिफिकेट बांटे गए। सीबीआई निदेशक ने पिछले दिनों मुख्य सतर्कता आयुक्त प्रत्यूष सिन्हा से जब इस पूरे घोटाले पर मशविरा किया तो पाया कि करीब 2477 करोड़ रुपए की निर्माण योजनाओं के ठेके देने और कंप्लीशन रिपोर्ट में भारी घोटाला हुआ है। यह भी संयोग ही था कि संसद का मानसून सत्र चल रहा था।

महंगाई के मुद्दे पर चर्चा कराने को लेकर सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष में पूरे एक हफ्ते तक घमासान मचा था। संसद में येनकेन प्रकारेण जब महंगाई पर बहस शुरू हुई तो कई वक्ताओं ने भ्रष्टाचार को महंगाई बढ़ने का एक प्रमुख कारण बताया। बहरहाल, महंगाई पर चर्चा के झंझट के मकड़जाल से यूपीए सरकार भले ही बाहर निकल गई, लेकिन कॉमनवेल्थ खेलों के घपलों ने उसे चौतरफा घेर दिया है।

लोकसभा में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा। हालांकि कॉमनवेल्थ का कुल बजट कितने हजार करोड़ रुपए का है, इसका सही आंकड़ा सरकार के पास नहीं है, लेकिन सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की मानें तो यह पूरा बजट 1 लाख करोड़ रुपए तक जाएगा।

कैसे कैसे खेल
यह सवाल भी उठा कि इतने बड़े पैमाने पर ठेकों के आवंटन पर पारदर्शिता क्यों नहीं बरती गई। विपक्ष के सांसदों का यह भी आरोप है कि कॉमनवेल्थ गेम भारत में इसलिए आयोजित कराए गए ताकि इस आड़ में मोटी दौलत कमाई जाए।

सांसदों ने यह मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया कि जिस देश में एक बड़ी आबादी को भरपेट भोजन नहीं मिलता, लोगों की आमदनी इतनी नहीं कि वे अपने ऊपर 20 रुपए प्रतिरोज खाने पर खर्च कर सकें, उस देश में इस तरह की लूट-पाट बंद नहीं हुई और इसमें शामिल लोगों को सजा नहीं दिलाई गई तो लोकतंत्र मजाक बन कर रह जाएगा।

ज़ाहिर है राष्ट्रमंडल खेल तो होंगे ही, लेकिन 6 माह से भी कम समय में खेल आयोजनों में भ्रष्टाचार और खेल कंपनियों की आड़ में बैठे बिठाए मोटा पैसा बनाने की कुछ चुनिंदा लोगों की करतूतों में देश की आम जनता और खासतौर पर भारत के विशाल मध्यवर्ग में यही संदेश गया है कि सत्ता पक्ष का मजबूत संरक्षण पाने वाले कुछ लोग रातोंरात अमीर बनने के लिए किस-किस तरह का खेल खेल रहे हैं।

फटाफट क्रिकेट के नये कल्चर में आइपीएल खेलों की फ्रेंचाइजीज की बंदरबांट में किस तरह कई सौ करोड़ के वारे-न्यारे हो गए, यह तमाशा सारी दुनिया ने देखा, लेकिन अफसोस यह है कि जलजले की तरह भारत में इस तरह के उबाल आते हैं और फिर कोई उसकी चर्चा भी नहीं करता।

जनता दल यू के अध्यक्ष शरद यादव ने लोकसभा में कहा ‘कॉमनवेल्थ खेल आयोजन कोई यह केवल भ्रष्टाचार का ही मामला नहीं है, रूलिंग क्लास के लोगों ने कैसे चतुराई से भारत में इस खेल आयोजन को करवाने में भूमिका निभाई वह एक कपटपूर्ण काम है।’ शरद यादव की नजर में यह गुलामों के देशों का खेल है, इसकी कोई जरूरत नहीं थी।

बड़ी निर्माण एजेंसियां कठघरे में
विशेषज्ञ मानते हैं कि खेल निर्माण स्थलों में भ्रष्टाचार और बदइंतजामी का सबसे बड़ा कारण यह है कि खेल आयोजन के लिए पूरे सात वर्ष का काम हाथ में होने के बावजूद 2008 के मध्य में स्टेडियमों और खेल स्थलों पर काम होना आरंभ हुआ। निर्माण कार्यों की प्रमुख जिम्मेदारी सीपीडब्ल्यूडी को सौंपी गई थी।

तब दावा किया गया था कि नवंबर 2009 तक सारे खेल स्थल तैयार हो जायेंगे, लेकिन नवंबर 2009 भी चला गया तब कहा गया कि जून 2010 तक सब कुछ पूरा हो जायेगा, लेकिन अगस्त भी जाने वाला है। अफरातफरी और जल्दबाजी में जो काम करवाए जा रहे हैं उस पर सीवीसी पहले ही निर्माण कार्यो में जुटी 6 बड़ी निर्माण ए जेंसियों को कटघरे में खड़ा कर चुका है।

यह हालत तब है जब खेलों के लिए तमाम तैयारियों के दावों के बावजूद कोई नया स्टेडियम नहीं बनाया गया। कुल 18 में से 16 खेल स्थल बनकर तैयार होने का दावा किया गया, लेकिन पहली अगस्त को जो तीन बड़े स्टेडियम खेल मंत्रालय की ओर से आयोजन समिति के सुपुर्द किए गए हैं उनमें बरसात का पानी छतों से लीक हो रहा है, उनमें दरारें पाई गयीं क्योंकि जिन निर्माण एजेंसियों को मरम्मत और कंप्लीशन का काम सौंपा गया था, उन्होंने कई जगह सिर्फ बाहरी लीपापोती करके बला टाल दी।

खेल निर्माण स्थलों में घपलों और भ्रष्टाचार के लिए सरकार जिम्मेदार है। जो धन इस तरह स्वाहा हो रहा है। वह इस देश के आम आदमी का पैसा है, साफ है कि सरकार ने शुरू से कोई निगरानी तंत्र विकसित नहीं किया। सरकार को संसद व देश को हिसाब देना होगा। यह सरकार जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। 
गुरुदास दासगुप्ता, भाकपा

खेलों में बहुत सा ऐसा खर्च हो रहा है जो बताया नहीं जा रहा। पूरा बजट एक लाख करोड़ से कम नहीं बैठेगा। जिस देश में आज भी करोड़ों लोग भूखे हैं। दाल-रोटी के लिए गरीब आदमी तरस रहा है, वहां यह दावा करना कि इस खेल के आयोजन से देश का सम्मान बढ़ेगा, यह देश के साथ खिलवाड़ है।
मुलायम सिंह यादव, समाजवादी पार्टी

प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। भ्रष्टाचार हुआ है तो इसकी जांच भी जरूर होगी। दोषी लोगों को बख्शा नहीं जाएगा। अखबारों में सिर्फ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे हैं। इससे देश की इज्जत मिट्टी में मिल रही है। आरोप साबित होने के पहले ही किसी को फांसी पर नहीं लटकाया जा सकता।
संजय निरुपम, सांसद, कांग्रेस

खेल आयोजन में भ्रष्टाचार का मुद्दा ही अहम नहीं है, सवाल यह है कि इन खेलों को यहां लाने की जरूरत क्या थी। सत्ता पक्ष के लोग सोची समझी साजिश के तहत वे खेलों को यहां लाए हैं, स्टेडियमों की मरम्मत में जो करोड़ों रुपया बहाया गया, वे स्टेडियम बरसात में लीक कर रहे हैं। पूरी दिल्ली खोद दी गई। सारा पैसा सिर्फ दिल्ली की सीमा के भीतर बहा दिया गया। 
शरद यादव, जनता दल (यू)

एशियाड में ओपनिंग व क्लोजिंग समारोह की तैयारी पर खेल आयोजन की देखरेख की मुख्य जिम्मेदारी निभा रहे युवा सांसद राजीव गांधी को मुझ पर इतना भरोसा था कि उन्होंने हमारी परेड रिहर्सल देखना जरूरी नहीं समझा। मेरा मानना है कि इस तरह के बड़े खेल समारोह तब तक सही ढंग से संपन्न नहीं हो सकते जब तक निचले स्तर तक शुरू से ही फोकस न हो। अब तो इतना कम समय बचा है कि बाहर से कोई जाकर चीजें दुरुस्त नहीं कर सकता।
ले. जनरल नरेंद्र सिंह (रिटायर्ड), एशियाड खेल उद्घाटन व समापन समारोह के कमांडिंग इन चीफ

यह भ्रम फैलाना गलत है कि हमारे स्टेडियम तैयार नहीं। ज्यादातर खेल स्थल तैयार हैं, कुछ जगहों पर फिनिशिंग टच हो रहा है। मैं खुद वहां गया हूं, वे पूरी तरह दुरुस्त हैं। वक्त का तकाजा है कि हम आयोजन की सफलता में जुटें। ये खेल हमारे लिए शादी के समान हैं, बारात दरवाजे पर हैं, हम बाहर निकलें और उसका स्वागत करें।     
एमएस गिल, खेल मंत्री

अब जबकि यह साफ हो चुका है कि यह भ्रष्टाचार का खेल है, तब इसका कोई औचित्य नहीं है कि भ्रष्टाचार और जनता के पैसे का गबन करने वालों को दो माह और लूट की छूट दी जाए। इस घोटाले में जो लोग भी शामिल हैं, उन पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
बृंदा करात, राज्य सभा सांसद, माकपा

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