DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

एशियाड की सफलता याद आती है इस कोहराम में : जसदेव सिंह

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सब कुछ होते हुए भी हमारे देश में कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन व तैयारियों की ऐसी पोल खुली। 1982 में संसाधन आज की तरह नहीं थे, लेकिन उस वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद आयोजन में सीधे तौर पर दिलचस्पी ले रही थीं। उनके प्रतिनिधि के तौर पर युवा सांसद राजीव गांधी खेल तैयारियों की हर बैठक में मौजूद रहते थे।

बूटा सिंह खेल मंत्री थे, एऩ क़े पी़ साल्वे की राजनीतिक और संगठन क्षमता का एशियाड आयोजन को लाभ मिला। लेकिन जिस तरह की बदइंतजामी अब देखने को मिल रही है, उससे एक बात बहुत साफ हो गयी है कि देश का नेतृत्व चला रहे लोगों ने सब कुछ एक व्यक्ति सुरेश कलमाडी के ऊपर छोड़ दिया, यह पता लगाने की जहमत नहीं उठाई गयी कि कलमाडी के आसपास जिस तरह के लोग इकट्ठा हैं, उनकी क्षमताएं क्या हैं।

खेल मंत्री डॉ़ एम़ एस़ गिल ने ठीक ही कहा कि भगवान के भरोसे इतना बड़ा गेम होगा। सात वर्ष से तैयारियां चल रही हैं, हम स्टेडियम तक ठीक से नहीं बना पाए। दूरदर्शन और आकाशवाणी को इतना क्षमतावान नहीं बना पाए कि वे अपने पैरों पर खड़े होकर देश और विदेशों के कोने-कोने से देश के लोगों को इन खेलों की हैसियत के बाबत रू-ब-रू कराते। दूरदर्शन का इतना बड़ा नेटवर्क होने के बावजूद खेल प्रसारण की आउट सोर्सिंग करना हमारे जैसे बड़े लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है।

एशियाड के मौके पर मैं ऑल इंडिया रेडियो में स्पोर्ट्स डायरेक्टर था। मुझे आज भी याद है कि किस तरह हमारे इंजीनियरों ने 16-16 घंटे समर्पित होकर एशियाड के प्रसारण की तैयारी की थी। हालांकि तब कलर टीवी भी आ चुके थे, लेकिन रेडियो के मुकाबले टेलीविजन की पहुंच और तकनीक बहुत कमजोर स्तर पर थी।

खेल आयोजन किसी देश के लिए सिर्फ दिखावा नहीं होता। दुनिया के मुल्कों को अपनी संस्कृति, वेशभूषा, रहन-सहन और धरती से भी हम परिचित कराते हैं। ओलंपिक चार्टर में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि खेल आयोजन समारोहों में आयोजक देश की संस्कृति और सभ्यताओं की झांकी को प्रमुखता दी जानी चाहिए। 

मुझे याद है कि एशियाड में दक्षिण भारत के मंदिरों से उद्घाटन समारोह के लिए 56 हाथी विशेष तौर पर लाए गए थे। कथक व भरतनाट्यम के जरिए हमारी सांस्कृतिक छटा का प्रचार-प्रसार हुआ था, लेकिन अब तो संस्कृति के नाम पर फिल्म स्टारों को मंच पर प्रमुखता से बिठाया जा रहा है।

इस बार कॉमनवेल्थ में हमारी संस्कृति और परंपराओं को प्रदर्शित करने की क्या व्यवस्था है, कोई नहीं जानता। चीजें छिपाई जा रही हैं। पारदर्शिता से परहेज रखा जा रहा है। इसलिए देश की जनता के मन में कई तरह की शंकाएं पैदा हो रहीं हैं कि इतना बड़ा खेल आयोजन क्या सफल भी हो पाएगा या नहीं! मेरी दिली ख्वाहिश है कि ये खेल सफल हों क्योंकि देश की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है, लेकिन खेल आयोजन के पहले अच्छा होता कि भ्रष्टाचार और बदइंतजामी इस कदर बेपर्दा न होती।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:एशियाड की सफलता याद आती है इस कोहराम में : जसदेव