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शिवसेना की कुर्बानी देने को तैयार है संघ

इंट्रो---यूपी और बिहार के चुनावों को ध्यान में रखकर भाजपा को मजबूत करने की रणनीतिविशेष संवाददाता नई दिल्लीमहाराष्ट्र में मराठी मानुस विवाद में संघ परिवार ने सीधे कूद कर भाजपा के देश में बिखरे जनाधार को मजबूत करने का दाँव फेंका है। भाषा के आधार पर यदि हिन्दू समाज बँटता है तो संघ और भाजपा दोनों के लिए यह आत्मघाती होगा। अयोघ्या आंदोलन के बाद बिखर गए हिन्दुओं को वह इस तरह जोड़ने की मुहिम में जुटा है। मुम्बई में शिवसेना के आतंक के आगे उत्तर भारतीय ही नहीं दक्षिण भारतीय भी लंबे समय से पिस रहे हैं। संघ की सोच है कि महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों की आड़ में शुरू की गई उसकी इस मुहिम को दक्षिणी राज्यों में भी खासा समर्थन मिलेगा, जो अंतत: भाजपा के विस्तार में काम आएगा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि संघ प्रमुख बनने के बाद मोहन भागवत का संघ और भाजपा को फिर से स्थापित करने का यह सबसे बड़ा कदम है।संघ सूत्रों के अनुसार राष्ट्रवाद के सवाल पर यदि शिवसेना के साथ भाजपा को अपने संबंधों की कुर्बानी देनी पड़ती है, तो उससे देश में अच्छा संदेश ही जाएगा। संघ और भाजपा एक महाराष्ट्र के लिए पूरे देश को दाँव पर नहीं लगा सकते। वैसे भी विधानसभा में गठबंधन की छीछालेदर होने के बाद संघ की रणनीति है कि भाजपा को अब महाराष्ट्र में अकेले खड़ा होना चाहिए। संघ का यह भी मानना है कि शिवसेना में बँटवारे के बाद अब उसके लिए मैदान खाली है। वैसे भी जिस तरह संघ ने आडवाणी कैंप को दरकिनार कर अपनी जिद पर नितिन गडकरी को भाजपा की कमान थमवाई है, उससे भी संघ के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह उनको स्थापित करने के लिए हर चाल चले। साल के अंत में बिहार और उसके बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। मराठी अध्यक्ष इन चुनावों में किस मुँह से जाता, संघ ने इस विवाद में कूद कर उसका इंतजाम कर दिया है। इसी के साथ उत्तर भारतीयों को भी उसने संदेश दिया है कि संघ और भाजपा उसके साथ है।

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