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दलितों का साथ और कांग्रेस से दो-दो हाथ --मायावती ने साफ

रचना सरनलखनऊ। स्वर्गीय कांशीराम के मूवमेंट की मजबूत धरोहर। दलित समाज की बेटी होने पर नाज़। ‘अपनों’ को संजोए रखने की कोशिश के साथ सियासी दुश्मन भी तय और लक्ष्य भी साफ। चौतरफा हमलों से घिरीं बसपा प्रमुख मायावती ने लखनऊ में एक और बड़ी महारैली कर जहाँ अपने विरोधी दलों को राजनीतिक अखाड़े में उतर कर शक्तिप्रदर्शन करने की चुनौती दे डाली है वहीं खुद उन्होंने अपनी पार्टी का भावी एजेंडा भी पूरी तरह साफ कर दिया। जिस तरह पूरे पौने दो घंटे के उनके भाषण में कांग्रेस निशाने पर रही उससे तय है कि बसपा ने यूपी की सियासत में दिल्ली में सरकार चला रही पार्टी को मुख्य प्रतिद्वंदी मान लिया है। दिल्ली में सरकार बनाने के लक्ष्य का यह ठोस विस्तार है तो यूपी में अगली लड़ाई का संकेत। बसपाइयों के लिए संदेश साफ कि पार्टी की अगली लड़ाई कांग्रेस से होनी है। सो दो-दो हाथ की तैयारी करो। वहीं सर्वजन की सरकार को कामयाबी के साथ चलाने के ढाई साल के बाद भी पार्टी के सियासी लक्ष्य से दलित नहीं हटे हैं इसका भी मायावती ने खुलासा कर दिया। उनके पूरे भाषण की धुरी वस्तुत: दलित सम्मान ही था। चाहे मूर्तियों और स्मारकों का मुद्दा हो या महिला आरक्षण विधेयक का-मायावती ने कांग्रेस पर हमले के लिए दलित आत्मसम्मान को ही आधार बनाया। भारी भीड़ जुटाकर जहाँ वह विरोधियों खासतौर से कांग्रेस को यह बताने में सफल दिखीं कि दलितों में पैठ बनाने की कांग्रेस की कोशिशों के बावजूद बसपा का यह बेस वोटबैंक फिलहाल उनके साथ मजबूती से खड़ा है। वहीं भावनात्मक तौर पर सीधे उनसे जुड़ने की कोशिश करती दिखीं। ..‘दलित की बेटी का राज बर्दाश्त नहीं, अंतिम साँस तक मूवमेंट के लिए लडूँगी।’ ‘शुक्रिया खासतौर से दलित समाज को शुक्रिया जो हर मुश्किल घड़ी में मेरे साथ खड़ा रहा’। ‘बसपा ही अकेली पार्टी है जो कैडर बेस है और जिसका वोट ट्रान्सफर होता है..विरोधियों के हमलों को आक्रामक पलटवार से जवाब देना बसपा मुखिया की चिरपरिचत शैली है। लेकिन अपनों की टीस को सहलाने में भी उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्हें आभास है कि पिछली तीन सरकारों की तरह वह इस बार औचक निरीक्षण पर नहीं निकली है और उनके समर्थक चाहते हैं कि वह उसी तरह निकलें। इसका भी जवाब उन्होंने रैली में दिया कि कांशीराम के न रहने के बाद उनकी संगठन और सरकार चलाने में व्यस्तता इस कदर बढ़ गई है कि चाहने पर भी अब औचक निरीक्षण संभव नहीं। योग वाले बाबा से लेकर कांग्रेस की दलितों को रिझाने की कोशिशों से बसपाइयों को आगाह करते हुए वह पुरानी कैडर कैंप परम्परा का अनुसरण करती दिखीं।

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