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जिंदगी की दांव पर नहीं चाहिए बीटी की बैशाखी

कार्यालय संवाददाता चंडीगढ़जरूरत के मुताबिक आने वाले दिनों में हमारे खाद्यान्न उत्पादन में बढ़ाेतरी अति आवश्यक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम अपनी जिंदगी की सुरक्षा को दांव पर लगाकर बीटी की बैशाखी के सहारे यह लक्ष्य पूरा करें। रविवार को पंजाब यूनिवर्सिटी में आयोजित एक परिचर्चा के दौरान यह लब्बोलुबाब निकलकर आया।तीन दिवसीय सेमिनार के समापन अवसर पर ‘ट्रांसजेनिक ऑर्गेनिज्म: बून और बैन इन इंडियन सिनॉरियो’ विषय पर खुली बहस हुई। बहस की शुरुआत डॉ. राकेश तुली ने की। डॉ. तुली ने बीटी और जीएम क्राप्स के बारे में कहा कि दुनिया के कई देश इस दिशा में निकल पड़े हैं। बीटी या फिर जीएम से होने वाले खतरे के बारे में उन्होंने कहा कि खतरा तो हर जगह है, हर तकनीकी के इस्तेमाल में खतरें की घंटी बजती है। उन्होंने अत्यधिक उत्पादन की दिशा पर बल देते हुए कहा कि आज सच्चाई यह है कि हमारे देश में हर चौथा जन्म लेने वाला बच्चाा कुपोषण का शिकार होता है। माता-पिता में कुपोषणता की वजह से ही, उन्हें ठीक ढंग से खाना नहीं मिल पाने की दशा में यह स्थिति उत्पन्न होती है। आज का आंकड़ा है कि विश्व में लगभग एक अरब लोग कुपोषण के शिकार हैं। ऐसे में खाद्यान्न सामग्रियों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। पिछले दिनों मंदी के दौरान जहां विश्व बाजार में खाद्यान्न की कीमतों में गिरावट आई, वहीं हमारे देश में इसमें बढ़ाेतरी जारी रही।इसके बाद कमान संभाली प्रो. पीएस चौहान ने। प्रो. चौहान ने कहा कि मानव जीवन के लिए सबसे अहम हवा और पानी के साथ खाद्य की जरूरत होती है। ऐसे में अगर खाद्य सामानों पर भी प्रयोग होने लगे तो फिर मुश्किल होगी। उन्होंने कहा हम विकास की राह में तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन यह तेजी खाने-पीने के सामनों में नहीं दिखानी चाहिए। यह बेहद संवेदनशील मामला है, पूरी जांच-परख के साथ ही इस दिशा में फूंक-फूंककर कदम उठाना होगा।पंजाब यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. आरसी सोबती ने जिनोटाइप और फिनोटाइप की थ्योरी को उठाया। उन्होंने देश में उपस्थिति लैबों पर ही सवाल खड़ा किया और कहा कि लैब्स को सभी जांच पूरी करके ही ऐसे सामनों को आगे बढ़ाना चाहिए। जनता कंफ्यूज हो चुकी है। सभी तथ्य सार्वजननिक किया जाए। उन्होंने कहा कि जिन पूल के साथ खिलवाड़ आने वाले दिनों में महंगा साबित हो सकता है। इस परिचर्चा में अन्य लोगों ने भी शिकरत की।बॉक्स आंकड़ाें का हवाला2020 की बात करें तो मौजूदा स्थिति की तुलना में खाद्यान्नों का उत्पादन चार-पांच गुणा तक बढ़ाना होगा। जागरूकता की ही देन है कि सब्जियों और फलों के उत्पादन में हमारी भागेदारी अच्छी है और भावी मांग को पूरा करने का भी माद्दा रखते हैं।12 साल में 10 लाख एकड़ से शुरू हुई जीएम फसलों की खेती अब विश्व भर में 12.5 करोड़ एकड़ तक फैल चुकी है। सोयाबिन का 54 फीसदी, कॉटन का 13 फीसदी और कॉर्न का 30 फीसदी हिस्सा आज जिनेटिक मॉडिफाइड है। जबकि हमारे देश में 90 हजार करोड़ रुपए मूल्य के खाद्यान्न हर साल बर्बाद होता है। इसे रोकने के लिए तकनीकी का इस्तेमाल आवश्यक है।फोटो: सेव की जा रही है।

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