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प्रशासन ने पहुंचाया डीएलफ को फायदा

गृह मंत्रालय की ऑडिट रिपोर्ट में हुआ खामियों का खुलासाअमित राय चंडीगढ़ केंद्रीय गृह मंत्रालय की ऑडिट रिपोर्ट में चंडीगढ़ प्रशासन की डीएलफ को आईटी पार्क में जमीन अलॉट करने की जमकर खिंचाई की है। गृह मंत्रालय का कहना है कि चंडीगढ़ प्रशासन ने पग-पग पर डीएलएफ को गैर कानूनी तरीके से लाभ पहुंचाया। शेयर्स के बॉयबैक से लेकर जमीन के रेट के मूल्यांकन में लापरवाही बरती गई। प्रशासन की लापरवाही से आखिर में पब्लिक प्रॉपर्टी पूरी तरह से एक प्राइवेट हाथों में चली गई। इससे न तो जनता को कोई फायदा हुआ और न ही सरकारी खजाने को अपेक्षित लाभ पहुंचा। डीएलफ ग्रुप के कहने पर प्रशासन ने टेंडर की शर्तो को भी बदल दिया। प्रोजेक्ट में इक्विटी शेयरों के मामले में प्रशासन पर डीएलएफ ग्रुप हावी रहा। प्रशासन अंत तक माइनोरिटी शेयर होल्डर बना रहा। जानबूझकर ज्यादा इक्विटी शेयरों को डीएलफ के नियंत्रण में दिया गया। प्रशासन के शेयर 40 प्रतिशत से नीचे रहे। यही नहीं 22.62 करोड़ के इनसिक्योर्ड डिबेंचर्स को भी जारी करना प्रशासन के लिए घाटे का सौदा रहा। यही नहीं डीएलफ को 9 फीसदी रेट पर इनसिक्योर्ड डिबेंचर्स जारी करके भी डीएलफ को प्रशासन ने फायदा पहुंचाया। अगर वह डीएलफ राशि किसी कमर्शियल बैंक से लेता तो उसे प्राइम लैंडिंग रेट के हिसाब से 13.5 प्रतिशत चुकाने पड़ते। डीएलफ को इस पूरे प्रोजेक्ट में लाभ पहुंचाने के लिए नियमों की अनदेखी हुई। इक्विटी शेयर्स की बॉयबैक में भी डीएलएफ को फायदा पहुंचाया गया। शेयर्स की चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ने गलत कैलकुलेशन की। अकाउंटेंट्स ने जमीन का मूल्यांकन 31 मार्च 2006 की बुक वैल्यू के अनुसार की न की बॉयबैक की तारीख से मार्केट रेट के अनुसार की। डीएलफ को दी जमीन की तुलना मंत्रालय ने उप्पल हाउसिंग को दी जमीन से करके बताया है कि किस तरह से डीएलफ को फायदा पहुंचाया गया। उप्पल को दी जमीन की मार्केट रेट के हिसाब से कीमत साढे बारह करोड़ रुपए प्रति एकड़ थी। वहीं बुक वैल्यू के अनुसार चार्टर्ड अकाउंटेट्स ने बुक वैल्यू के हिसाब से इसकी कीमत 33.82 करोड़ ही बताई। अकाउंटेंट्स की रिपोर्ट पर चंडीगढ़ प्रशासन ने आंख मूंदकर विश्वास किया। अधिकारियों ने इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया कि रिपोर्ट में जमीन पर हुए कार्य, बिल्डिंग और बॉयबैक (जनवरी, 2008) के समय के मार्केट रेट क्या है। अगर नेट असेस्ट वैल्यू जिसमें सारी परिसंपत्तियों का मूल्य, नकदी, निवेश, बिल्डिंग की कीमत आदि के आधार पर ईक्विटी शेयरों का मूल्यांकन होता तो प्रशासन को ज्यादा बॉयबैक के समय ज्यादा फायदा होता। इन सब की अनदेखी करके डीएलफ को फायदा पहुंचाया गया।इस प्रोजेक्ट के पूरा होने तक चंडीगढ़ प्रशासन के शेयर्स खरीद लिए गए थे और एक तरह से डीएलफ ग्रुप इस बेशकीमती व्यावसायिक प्रोपर्टी का मालिक बन बैठा। डीएलफ ने इसके बल पर काफी पैसा लोन के रूप में बैंको और वित्तीय संस्थानों से लिया। इस तरह एक योजनाबद्ध तरीके से यह पब्लिक प्रॉपर्टी प्राइवेट हाथों में चली गई और चंडीगढ़ प्रशासन के अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। सरकार के खजाने में बहुत थोड़ा धन पहुंचा वह भी पांच सालों में। प्रोजेक्ट से आम जनता को भी कोई फायदा नहीं पहुंचा। ं

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