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कार्यशाला का धन बचाकर बन्दरबाँट की तैयारी! सिफ्सा के कार्यक्रम से

लखनऊ। पहले कार्यशाला के लिए बाहरी संस्था से पैसा माँगा। पैसा बजट के अनुसार दिया गया लेकिन जब कार्यक्रम होने लगा तो बचत कर ली गई। नियमानुसार यह बचत संस्था को लौटाई जानी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं किया गया बल्कि इस बचत की आपस में बन्दरबाँट की तैयारी कर ली गई । इसमें राज्यमंत्री स्तर के अध्यक्ष, तत्कालीन निदेशक, वित्त नियंत्रक, सहायक निदेशक सभी ने अपने-अपने हिस्से तय कर लिए लेकिन अचानक तब खेल उलट गया जब एक अधिकारी बदल गया। मामला संस्कृति विभाग की स्वायत्तशासी संस्था भारतेन्दु नाट्य अकादमी का है। अकादमी से सिफ्सा ने अपने कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण का अनुरोध किया तो अकादमी ने अपनी एक परियोजना भेज दी। नवम्बर-दिसम्बर में अकादमी ने कार्यशाला की। अकादमी दूसरी संस्थाओं के लिए ऐसे आयोजन करती रहती है। इससे अकादमी को प्रेक्षागृहों का कई दिनों का किराया और दूसरे संसाधनों का किराया तो मिलता ही है, प्रशिक्षण देने वाले विशेषज्ञ, अकादमी के कर्मचारियों-अधिकारियों को अतिरिक्त भत्ता भी मिल जाता है लेकिन अकादमी के शीर्ष अधिकारियों ने इसमें एक दूसरा ही खेल रच लिया। उन्होंने इस आयोजन में 63 हजार रुपए की बचत कर ली और फिर उसे आपस में बाँटने की योजना बना ली। अध्यक्ष यशवन्त निकोसे ने इसे स्वीकृति भी प्रदान कर दी। इसमें खुद अध्यक्ष और तत्कालीन निदेशक के लिए 15-15 हजार रुपए, वित्त नियंत्रक के लिए 10 हजार, सहायक निदेशक के लिए आठ हजार और सहायक लेखाकार के लिए पाँच हजार रुपए के भुगतान की व्यवस्था थी। यह भुगतान हो भी जाता अगर 26 दिसम्बर को निदेशक पद पर परिवर्तन न होता। सहायक निदेशक हरिप्रकाश ने ‘हिन्दुस्तान’ से स्वीकार किया कि निदेशक का कार्य देखने वाले संस्कृति सचिव अवनीश कुमार अवस्थी ने यह कहते हुए भुगतान रोक दिया है कि जब इन अधिकारियों के लिए अकादमी की ओर से वेतन एवं मानदेय की व्यवस्था है तो उन्हें अलग से इस प्रकार का मानदेय का औचित्य नहीं बनता। आलोक पराडम्कर

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  • Web Title: कार्यशाला का धन बचाकर बन्दरबाँट की तैयारी! सिफ्सा के कार्यक्रम से