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शब्द महज भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं : प्रसून

किव गोपाल दास नीरज के व्यिक्तत्व और कृितत्व पर संगोष्ठी िनज संवाददाता लखनऊनीरज को श्रृंगार का पुजारी नहीं सामािजक चेतना का किव कहना ज्यादा उिचत है। वह कभी रजतपट के आकर्षण में नहीं फँसे। यह सार है उस संगोष्ठी काजिंसका आयोजन रिववार को िहन्दी-उर्दू सािहत्य अवार्ड कमेटी की ओर से आयोिजत 21वें अंतरराष्ट्रीय सािहत्य सम्मेलन के दूसरे िदन जयशंकर सभागार में किया गया।संगोष्ठी का िवषय ‘गोपालदास नीरज व्यिक्तत्व और कृितत्व’ था। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कन्हैयालाल नंदन ने कहा कि नीरज की किवताएँ अिधक पठनीय हैं इसिलए वह सदा लोकिप्रय रहेंगे। उनके लेखन में आध्याित्मकता की चमक स्वाभािवक रूप से िदखती है। सर्वेश अस्थाना ने कहा कि नीरज की काव्य यात्राा सहज से और सहज होने की है। गीतकार प्रसून जोशी ने कहा कि किवता की लोकिप्रयता के िलए भाषा की हठधिर्मता छोड़नी होगी। वास्तव में शब्द महज भावनाओं की अिभव्यिक्त नहीं बिल्क संस्कृित के वाहक होते हैं। लखनऊ िवश्विवद्यालय की पूर्व िवभागाध्यक्ष डॉ. सरला शुक्ला ने कहा कि नीरज को श्रृंगािरक किव मानना बड़ी भूल होगी। वास्तव में वह जन जागरण के रचनाकार हैं। िफल्मी लेखक डा.शफीक के अनुसार नीरज के िफल्मी गीतों में भी सािहित्यक सुगंध िमलती हैं। गोपाल दास नीरज ने कहा कि शुरुआती िदनों में वह हिरवंश राय बच्चान, गोपाल िसंह नेपाली से प्रभािवत हुए लेकिन बाद में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। इस मौके पर जाने-माने किव िनर्मल दर्शन ने ‘यूँ तो हर जुमला है लफ्जों की नुमाइश िनर्मल, हाँ मगर लहजे से मकसद का पता चलता है’ सुनाकर युवा रचनाकारों को सहज और आसान भाषा में िलखने के िलए प्रेिरत किया। युवा किव अतुल बाजपेई ने ‘िहन्द का प्रताप देख िवश्व का हर एक देश भारत की चौखट पे मस्तक झुकाएगा’ सुनाई। गीतांजिल राय ने माहौल को आिशकाना करते हुए पढ़ा कि ‘मेरी यादों को कभी िदल से जुदा मत करना, िफर भी जो पास है तुम उसको खफा मत करना’। अिभषेक शुक्ला ने सुनाया कि ‘जुल्मते शब की ये दीवार िगरा दो तुम भी, अब उजालों की तरफ पाँव बढ़ा दो तुम भी।’ मस्तो ने पढ़ा कि ‘मुद्दत बाद िमलेगा वो पूछ न बैठे कैसा हूँ, सबके हाथों खर्च हुआ मैं क्या रुपया-पैसा हूँ।’

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