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अवधी के विकास के लिए सामूहिक प्रयास पर जोर लविवि में

निज संवाददाता लखनऊ अवधी का विकास हिन्दी से जुड़ा हुआ है। उपबोलियाँ और बोलियाँ ही हिन्दी की शक्ति हैं। लोक भाषा से जब मुख्य भाषा जुड़ेगी तो इसकी सार्वभौमिकता बढ़ेगी। अवधी के विकास के लिए सिर्फ सोचने से कुछ नहीं होगा। इसके लिए हर किसी को प्रयास करना होगा। सबसे पहले विभिन्न हिन्दी संस्थानों का एकीकरण किया जाना चाहिए। अवधी के मानकीकरण की भी जरूरत है। यह बातें लखनऊ विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहीं।अवध भारत समिति और लविवि हिन्दी विभाग की ओर से मालवीय सभागार में रविवार को अवधी महोत्सव 2010 का आयोजन हुआ। इस अवसर पर ‘अवधी की सार्वभौमिकता’ विषय पर आयोजित व्याख्यान में प्रो. दीक्षित ने कहा कि गद्य साहित्य लेखन को समृद्धि बनाता है। लिहाजा जिस अवधी में अधिक गद्य साहित्य लिखा गया हो उसी को मानक मानना होगा। साहित्यकार विद्या बिन्दु सिंह ने कहा कि अवधी लोक धरोहर है। इसकी लोकप्रियता भारत में ही नहीं बल्कि सूरीनाम और मॉरिशस जैसे देशों में भी है। प्रो. हरिशंकर मिश्र ने कहा कि भूमण्डलीय करण के इस दौर में अवधी पर चिंतन लाजिमी है। यदि हम सचमुच अवधी की तरक्की चाहते हैं तो योजनाबद्ध तरीके से काम करना होगा। 25 जनपदों में बोली जाने वाली इस भाषा के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है। महोत्सव में नेपाल का सात सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल भी शामिल हुआ। इस मौके पर समिति के अध्यक्ष ओम प्रकाश जयंत, डॉ. राम बहादुर मिश्र, डॉ. त्रिलोकी नाथ सिंह और जगदीश ने विचार रखे।

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  • Web Title: अवधी के विकास के लिए सामूहिक प्रयास पर जोर लविवि में