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गणतंत्र के लिए प्रासंगिक हैं बुद्ध के सिद्धांत

सात अपरिहणीय सूत्रों में पिरोई गई है गणतंत्र की रूपरेखानिज संवाददाता लखनऊसबको न्याय मिले। सभी कलाओं का विकास हो। जहाँ युद्ध के बजाए शान्ति को सवरेपरि रखा जाए। ऐसे गणतंत्र की रूपरेखा गौतम बुद्ध ने अपने सात अपरिहणीय सूत्र में तैयार की थी। उस सिद्धांत पर अमल कर वैशाली राज्य ने अपना चहुमुखी विकास किया था। आज भी वैसी ही सशक्त व्यवस्था की आवश्यकता है। यह संदेश है नाटक ‘शान्ति रस बरसे’ का। इसका प्रभावी मंचन चित्रा मोहन के निर्देशन में शनिवार को हिन्दी संस्थान में किया गया।अजित पुष्कर के नाटक ‘जन विजय’ को आधार बना कर इस नाटक की परिकल्पना चित्रा मोहन ने की है। आईकैड संस्था की ओर से इस नाटक का मंचन संत रविदास की पावन स्मृति में यशपाल सभागार में किया गया। नाटक में दर्शाया गया कि मगध नरेश, सजिश कर बुद्ध के सात अपरिहणीय सूत्र को मानने वाले वैशाली राज्य को तोड़ना चाहते हैं। योजनानुसार वैशाली में छल, पशु भाव, वैचारिक स्वच्छंदता पर प्रतिबंध, असमान कृषि लाभ की शिक्षा दी जाती है। इससे सामाजिक व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है लेकिन नाटय़ांत में बुद्ध के सिद्धांत ही वैशाली राज्य की रक्षा करते हैं। चूँकि नाटक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का था इसलिए वेशभूषा, संवाद अदायगी और दृश्यबंधों में ऐतिहासिक तत्वों का समावेश किया गया। सराहनीय बात यह रही कि वर्तमान समय में सात अपरिहणीय सूत्र की आवश्यकता को भी कुशलतापूर्वक रेखांकित किया गया। सुखेश मिश्र की प्रकाश परिकल्पना और आलोक श्रीवास्तव, अखिलेश दीक्षित और मीता पंत की संगीत परिकल्पना ने नाटय़ रम्यता को बढ़ाया। दर्शकों से भरे प्रेक्षागृह ने कई बार करतल ध्वनि कर नाटय़ प्रसंगों की प्रशंसा की। मंच पर सैफ ने बुद्ध, सुनील चतुर्वेदी ने अजातशत्रु, देवाशीष मिश्र ने वर्षकार, मनोज शर्मा ने राजा, मीता पंत ने जयंती, चार्वी ने सूत्रिका की भूमिका प्रभावी ढंग से अदा की। इस अवसर पर मंचन से पहले दया चतुर्वेदी के निर्देशन में सरोज खुल्बे, सुषमा अग्रवाल और गीता सिंह ने भजन सुनाए। संस्थान के निदेशक सुधाकर अदीब ने कहा कि बुद्ध के सिद्धांत हर युग में प्रासंगिक हैं। कार्यक्रम का संचालन अमितादुबे ने किया।

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