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एमडीआर के लिए चिकित्सक भी जिम्मेवार देश में टीबी मरीजों की

िहन्दुस्तान प्रितिनिधपटना। टीबी मरीजों में मल्टीपल ड्रग रेिजस्टेंट (एमडीआर) के िलए मरीज के साथ-साथ िचकित्सक भीजिंम्मेवार हैं। एमडीआर िस्थित में पहुंचने पर मरीजों पर जल्द कोई दवा असर नहीं करती और मरीज को ठीक करना जिटल काम हो जाता है क्योंकि ये डॉट (डाइरेक्टली आब्जर्व िटट्रमेंट शार्ट कोर्स) को फॉलो नहीं करते। इसके तहत मरीज को पूरा कोर्स िनयिमत खाना पड़ता है। लेकिन देखा जा रहा है कि कोई दवा कड़वी या ठीक नहीं लगी तो उसे बीच में ही मरीज छोड़ देता है। कोर्स पूरा नहीं करने पर बैक्टेिरया मरने के बजाय और रेिजस्टेंट हो जाते हैं। वैसे टीबी के िलए अिधक दवाएं नहीं हैं। महज चार दवाएं ही हैं। िचकित्सक भी मरीज को सही दवा और सही डोज नहीं िलखते। डोज कम होने से भी परेशानी बढ़ जाती है और बीमारी ठीक नहीं होती। डॉट के तहत दवा खाने वाले मरीजों को आब्जर्वर के सामने दवा दी जाती है। यह आब्जर्वर की भीजिंम्मेवरी बनती है कि मरीज दवा खा रहा है या नहीं देखें। लेकिन ऐसा नहीं किया जाता। ‘िहन्दुस्तान’ से बातचीत में यह जानकारी टीबी एसोिसएशन ऑफ इिंडया, िदल्ली के उपाध्यक्ष डा. िवजय कुमार अरोड़ा ने दी। डा. अरोड़ा िबहार यक्ष्मा संघ के चतुर्थ राजस्तरीय सम्मेलन में िहस्सा लेने आए थे। उन्होंने कहा कि जागरूकता की जरूरत है। इसके िलए कारपोरेट सेक्टर, गैर सरकारी संस्थाओं, मीिडया और समाज समेत सभी को आगे आना होगा। देश में टीबी मरीजों की संख्या सात मीिलयन है। सभी राज्यों के पांच हजार एमडीआर मरीजों की पहचान की गई है और इनमें से एक हजार एमडीआर मरीजों का इलाज चल रहा है।

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