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एनएससी केवीपी घोटाला: पता और न ही नाम फिर भी

वरीय संवाददातापटना। वर्ष 1998 में पटना जंक्शन के रेलवे यार्ड से चोरी गए 80 करोड़ रुपये मूल्य के एनएससी-केवीपी मामले में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। जाने-अनजाने में कई ठेकेदारों ने इसका प्रयोग करोड़ाें-अरबों रुपये के ठेके पाने के लिए तो किया ही तो कुछ ठेकेदार ऐसे भी हैं जिन्होंने प्रतिभूति के रूप में जमा किए गए चोरी के एनएससी पर अपना नाम पता भी दर्ज नहीं किया पर उन्हें करोड़ाे के ठेके मिल गए। इस मामले में संबंधित विभाग और अधिकारियों की संलिप्तता और लापरवाही से इनकार नहीं किया जा सकता। किसी भी विभागीय ठेके में यह प्रावधान है कि जमा की गई प्रतिभूति का सत्यापन संबंधित डाकघर से कराया जाता है। अगर वह प्रतिभूति फर्जी मिलती है तो संबंधित ठेकेदार को दी जाने वाली निविदा रद्द कर उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है। पर कई विभागों में जमानत के रूप में जमा किए गए चोरी के एनएससी का न तो सत्यापन कराया गया और न ही संबंधित ठेकेदारों को इस संदर्भ में कोई विभागीय नोटिस दी गई।एनएसएसी चोरी मामले में पटना रेल थाना में 24 फरवरी 1998 को दर्ज हुई प्राथमिकी (29/98) की जांच में जब 1994 में तेजी आई तब राज्य सरकार के कई विभागों की नींद खुली। अपना दामन पाक साफ करने के लिए निर्माण कार्य से जुड़े कई विभागों ने जांच एजेंसी को कई चौंकाने वाली सूचना भेजी। सबसे सनसनीखेज खुलासा किया पथ प्रमंडल संख्या-2, गया के तत्कालीन कार्यपालक अभियंता ने। उन्होंने अपने पत्रांक 687/04 के द्वारा यह जानकारी दी कि विभाग द्वारा निकाल गए एक टेंडर के एक हेड क्रमांक 183 में 7 लाख 90 हजार और 245 क्रमांक के एक दूसरे हेड में 90 हजार रुपये मूल्य के के फर्जी एनएससी जमानत के रूप में जमा किए गए है परंतु इसमें एनएससी जमा करने वाले संवेदक का नाम और पता नहीं है। गौरतलब है कि इस बहुचर्चित मामले की सीबीआई जांच की अनुशंसा तत्कालीन रेल आईजी आशीष रंजन सिन्हा ने भी की थी। यहां तक कि तब उन्होंने सीबीआई्र के तत्कालीन निदेशक से भी इस मामले की जांच का आग्रह किया था पर राज्य सरकार के आग्रह के बाद भी सीबीआई ने इस केस को अपने हाथ में नहीं लिया था। वर्ष 2006 में जब अजय कुमार वर्मा रेल डीआईजी बने तो उन्होंने इस मामले की फाइल खंगालनी शुरू कर दी। 16 जून 2006 को इस मामले की समीक्षा के बाद उन्होंने अपने पत्रांक 221 सीआर-दिनांक 17 जून 2006 के द्वारा इस मामले की जांच फिर से शुरू करने के आदेश दिए। इसके बाद पूर्व में दर्ज इस मामले के जांचकर्ता रमेश प्रसाद वर्मा के बयान पर रेल थाने में फिर से एक प्राथमिकी (225/06) दर्ज कर एनएससी का प्रयोग करने वाले राज्य के 42 ठेकेदारों, तत्कालीन आरपीएफ इंस्पेक्टर लक्ष्मण दीक्षित सहित 17 आरपीएफ कर्मी आरोपित हुए। पर इसके कुछ ही माह बाद अजय वर्मा अपने पद से हटा दिए गए। फिर इस मामले ने नया मोड़ तब लिया जब इस मामले से संबंधित एक आरोपित की याचिका पर सुनवाई करते हुए पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश नयायमूर्ति श्याम किशोर शर्मा ने 19 अगस्त 2008 को इस मामले की जांच सीबीआई से कराने के आदेश जारी कर दिए। उसके बाद इस मामले का रिव्यू करने के बाद सीबीआई ने शनिवार को इस मामले में पहली छापेमारी की।

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