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नरेगा से चौपट हो रही खेती

पटना(हि. ब्यू.)। मजदूरों का पलायन रुकने से सूबे के किसानों ने चैन की सांस ली तो ‘नरेगा’ उनके लिए नई आफत बन गई। इस योजना के चलते खेती के मौसम में मजदूरों का अकाल पड़ने लगा। खास बात यह है कि नरेगा के तहत भी खेती के मौसम में ही काम मिलता है। राज्य सरकार भी किसानों की इस परेशानी से अवगत है। यही कारण है कि सरकार कृषि यांत्रिकरण पर जोर रही है। ट्रैक्टर से लेकर खुरपी व कुदाल तक पर सरकार अनुदान दे रही है। छोटे किसानों के लिए सर्वाधिक उपयोगी पावर टीलर के लिए तो राज्य सरकार ने विशेष छूट के साथ विशेष अभियान भी चलाना शुरू किया है। राज्य के कुल रकबा 93.60 लाख हेक्टेयर में 56 लाख हेक्टेयर भूमि पर खेती की जाती है। 1.15 करोड़ किसान परिवार इस कार्य से जुड़े हुए हैं। खेती के लिए सबसे अधिक मजदूरों की जरूरत अक्टूबर और नवम्बर माह में होती है। इस समय खरीफ फसल की कटनी और रबी फसल की बुआई दोनों काम लगभग साथ चलते हैं। मई माह में धान के बिचड़े गिराये जाते हैं उस समय तो कम मजदूरों की जरूरत होती है लेकिन जब जुलाई में धान की रोपनी का समय आता है तो मजदूर खोजे नहीं मिलते हैं। कारण यह है कि सूबे में 87.72 लाख एकड़ में केवल धान की खेती होती है। नरेगा के तहत मजदूरों को सबसे अधिक काम अप्रैल, मई, जून, अक्टूबर और नवम्बर में ही मिलता है। इस अवधि में राज्य के 123 लाख जॉब कार्ड होल्डरों को नरेगा के काम से फुर्सत नहीं होती है। कुछ ऐसी ही स्थितियों का अंदाजा लगाकर एक संसदीय समिति ने फसल के मौसम में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत काम नहीं देने की सिफारिश की है। ‘स्थिति किसानों के लिए परेशानी पैदा करने वाली जरूर है, लेकिन इससे इतना तो जरूर है बिहार में नरेगा के तहत मजदूरों को काम मिल रहा है। किसानों को भी सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर कृषि का यांत्रिकरण करना होगा। केन्द्र सरकार को नरेगा के मजदूरों के लिए अलग से न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण करना चाहिए - श्रीभगवान सिंह कुशवाहा, मंत्री ग्रामीण विकास विभाग।’

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  • Web Title: नरेगा से चौपट हो रही खेती