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दुलहिनिया कहेला हो राम, सइयां घरवा

चैता के बोल से गांव और राजधानी में भी मची हुई है धूमआलोक कुमारपटनाबाबा घरे रहती त बबुनी कहईती, दुल्हीनियां कहे ला हो राम सईया घरवा..। हे रामा पिया परदेसिया देवर घरवा लडिम्का हे रामा, केकरा से..केकरा से कहीं हम दिलवा के बतिया ये रामा, केकरा से..। जी हां! गांव-गिरांव की माटी में रची बसी संगीत व समृद्ध विरासत की प्रतीक चैता की ही बात हो रही है। चैता के मधुर बोल इन दिनों राजधानी के आसपास के इलाकों में भी खूब सुनाई पड़ रहे हैं। गांवों के हर नुक्कड़, खेत-खलिहान, पंगडंडियों की तो बात ही मत पूछिए। जिसे देखिए वहीं इन दिनों चैता के गीत ही गुनगुनाए जा रहा है। शहरी इलाके में भी चैता गायन समारोहों की धूम मची है। रैप,पॉप और फिल्मी गीतों के बीच चैता का जादू पटनावासियों के भी सिर चढ़कर बोल रहा है। सदियों से भारतीय समाज के लोग नए साल के स्वागत और रबी फसल के पकने की खुशी का इजहार चैता के माध्यम से करते आ रहे हैं। फिलहाल राजधानी की फिजा ही निराली है। आलम यह है कि चैता के बोल सुनते ही अपनी माटी से बेइंतहा प्यार करने वाले शहर के बाश्िंादे अपने को नहीं रोक पा रहे। मंदिरों में भी भजन-कीर्तन की जगह भक्ति धुन पर चैता गाते और झूमतीं महिलाओं की टोलियां आकर्षण का केन्द्र बनी हैं। इसके अलावा हर दिन राजधानी में चैता के दर्जनों आयोजन यह बताने के लिए काफी है कि उनके जेहन में आज भी गांवों की याद ताजा है। चता समारोह हो और नाच की बात न हो यह संभव नहीं। बिना नाच के चैता गायन देखने और सुनने का मजा अधूरा है। चैत के गीतों के माध्यम से पति-पत्नी ,देवर- भौजाई, प्रेमी-प्रेमिका की विरह वेदना और प्यार के इजहार-मनुहार, रूठने-मनाने की भावना का बड़ा ही मार्मिक प्रदर्शन होता है। हालांकि चता गाने वाले कलाकारों को प्रोत्साहित करने की दिशा मे सरकार कोई पहल नहीं कर रही। यह दुखद है।

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