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कभी बिहारी की पहचान छिपाने वाले अब गर्व महसूस कर

िहन्दुस्तान प्रितिनिधपटना। कभी बाहर रहने वाले िबहारी लोग अपनी पहचान िछपाते थे। उन्हें यह आशंका रहती थी कि उनके िबहारी होने के बारे में कहीं कोई जान न जाय। वहीं आज देश में ही नहीं िवदेशों में रहने वाले िबहारी भी गर्व महसूस कर रहे हैं। िबहार को िफलहाल पुरस्कार िमलने का िसलिसला शुरू हुआ है। यह कहना है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का। वे रिववार को िबहार यक्ष्मा संघ के चतुर्थ राजस्तरीय सम्मेलन के उद्घाटन सामारोह को संबोिधत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि बीते कुछ िदनों से वे राजगीर,वैशाली आिद जगहों पर घूम रहे है। मकसद है नई पीढ़ी को साथ जोड़ने का क्योंकि नई पीढ़ी को कुछ लोग समाज के संकुिचत दांव-पेंच में फंसाना चाहते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि ठंड या लू से कोई नहीं मरता। पेट में अन्न नहीं होने से लोग मरते हैं। पेट में अन्न रहेगा तो इम्युनटी बढ़ी रहेगी। भूखे पेट रहेंगे तो ठंड और लू भी जल्द लग जाती है। उन्होंने कहा कि अब टीबी (यक्ष्मा) लाइलाज नहीं है। पहले किसी को टीबी हो गई तो मान िलया जाता था कि वह गया। अब इसे ठीक करना संभव हो गया है। जो इसकी दवा खाते है वे कुछ िदनों में ऊर्जा महसूस करने लगते हैं। वैसे बीच में दवा छोड़ना एक बड़ी समस्या है। लोगों को जागरुक करके ही इस बीमारी को दूर किया जा सकता है। इस बीमारी से कितने लोग पीिड़त है, इसके बारे में अभी तक कोई जानकारी नहीं है और कोई आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं है। उन्होंने बताया कि जनता दरबार में कोई खांसता भी है तो पहले मैं उसे जांच के िलए िचकित्सक के पास भेजता हूं और बाद में उसकी पीड़ा सुनता हूं। लोग खांसते रहते हैं लेकिन जांच नहीं कराते। चुटकी लेते हुए श्री कुमार ने कहा कि जैसे हर िहन्दुस्तानी दार्शिनक है वैसे ही हर िहन्दुस्तानी िचकित्सक भी है। अपनी बीमारी की भले वह जांच या इलाज नहीं कराएं लेकिन दूसरे को छींक भी आ गई तो तुरंत उसे दवा बता देगा। मुख्यमंत्री ने टीबी के िशकार लोगों का पता लगाने को कहा। उन्होंने कहा कि यह काम किठन जरुर है लेकिन करना तो पड़ेगा। तीन साल से बीपीएल का पता लगा रहे हैं, लेकिन जब भी फील्ड में जाते हैं तो एक झुंड आकर कहने लगता है कि उनका बीपीएल का कार्ड नहीं बना है। इसी तरह हमलोग किसी बीमारी के उन्मूलन का दावा करते हैं और पांच साल बाद मालूम पड़ता है कि वह बीमारी िफर आ गई है।स्वास्थ्य मंत्री नंद किशोर यादव ने कहा कि टीबी रोिगयों की पहचान का संकट है। 2005 में 28 हजार रोिगयों की पहचान की गई थी, वहीं 2008 में 84 हजार रोिगयों की पहचान की गई। कभी इस बीमारी से मृत्यु दर 28 फीसदी थी जो चार फीसदी पर पहुंच गई है। कल्चर लैब की स्थापना की जा रही है और मशीनें भी आ गई हैं। इस मौके पर स्वास्थ िवभाग के प्रधान सिचव सीके िमश्रा, डा. एसएन आर्या, डा. वीके अरोड़ा, डा. बसंत िसंह, डा. मंजू गीता िमश्रा, डा. अशोक शंकर िसंह, डा. एए हई, डा. जीतेन्द्र कुमार िसंह, डा. गोपाल प्रसाद िसन्हा, यूएन िवद्यार्थी, डा. िदलीप सेन, डा. राजीव रंजन आिद मौजूद थे।

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