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अधिक डिप्रेशन की वजह से होती है आत्महत्या बिहार में सबसे

अजय कुमार सिंहपटना। आबादी का 15 फीसदी लोग डिप्रेशन से पीडिम्त है। इनमें महिलाओं की संख्या दुगुनी है और यह विश्व की समस्या बन गई है। आत्महत्या करने वाले 70 से 80 फीसदी लोग मानसिक रोग से पीडिम्त रहते हैं। आत्महत्या करने के मामले में केरल सबसे आगे है जबकि बिहार में सबसे कम (1.7 फीसदी) आत्महत्या की घटनाएं होती हैं। डिप्रेशन में रहने पर घर वाले ध्यान नहीं देते कि परिवार का कोई सदस्य अवसादग्रस्त है। अवसाद जब चरम पर पहुंच जाता है तो पीडिम्त व्यक्ति की सोच बदल जाती है और वह कई तरह की बातें सोचने लगता है और उसे जीवन बेकार लगने लगता है। दो सप्ताह से अधिक दिन तक अवसाद में रहने पर न्यूरो ट्रांसमीटर गड़बड़ा जाता है। यदि जल्द उसका इलाज नहीं हुआ तो कुछ भी संभव हो सकता है। पीडिम्त व्यक्ति दो तरह के प्रयास करता है- पहला पारा सुसाइडल एटेम्प्ट और दूसरा कंप्लीट एटेम्प्ट। कंप्लीट एटेम्प्ट में ऐसे कदम उठाए जाते हैं। इसमें बचने की कोई गुंजाइश नहीं रहती- जैसे बहुमंजिली इमारत के छलांग लगा देना या फिर गोली मार लेना या फिर ट्रेन के पटरी पर छलांग लगाना आदि। विशेषज्ञों की राय में पाचं से दस फीसदी लोगों में क्वीक एक्शन भी होता है। ऐसे लोगों को अचानक लगेगा कि वह फेल हो गया। अब जिंदा रहकर क्या फायदा और वह तुरंत कुछ भी कदम उठा लेता हैं। ‘वर्तमान में लोगों में डिप्रेशन काफी तेजी से बढ़ रहा है। आत्महत्या के मामलों में 50 से 60 फीसदी लोग डिप्रेशन के शिकार होते हैं। एंटी डिप्रेशन इलाज भी होता है, लेकिन अधिक दिन तक बगैर इलाज के रहने वह न्यूरो ट्रांसमीटर गड़बड़ा जाता है और पीडिम्त व्यक्ति कोई भी कदम उठा लेता है। शिक्षित राज्यों में यह बीमारी तेजी बढ़ रही है। पिछड़े राज्यों में आत्महत्या के माले सबसे कम हैं’। डा.आर कुमारमनोरोग विशेषज्ञ मानसिक रोग के लक्षणयदि किसी चीज में मन नहीं लग रहा हैअपने को एकाग्रचित्त नहीं कर पा रहे हैंहर बात पर गुस्सा आ रहा हैकहीं मन नहीं लग रहा हैकिसी से बातचीत करने की इच्छा नहीं हो रही हैजीवन खत्म करने की इच्छा हो रही है। क्या करेंतनाव को कम करने की कोशिश करेंहमेशा खुश रहने की चेष्टा करेंइसमें परिवार वालों को भी मदद करनी चाहिए

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