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देश की दशा और दिशा बताएगी जनगणना

जनगणना का पहला चरण एक अप्रैल से शुरू हो चुका है। दूसरा चरण फरवरी में होगा तथा मार्च के पहले सप्ताह में इसके आरंभिक आंकड़े पता चल जाएंगे। लेकिन जनगणना का मतलब अब सिर्फ लोगों की गिनती भर नहीं है बल्कि यह जनगणना हमें बताएगी कि पिछले दस साल में हमने कितनी प्रगति की और कहां चूक रह गई।

विकास के सरकारी दावों की असलियत को यही जनगणना हमें बताएगी। दूसरे-विकास संबंधी जो आंकड़े सामने आएंगे, उन्हीं के आधार पर अगले दस साल की नीतियां तय होंगी। वैसे भी 2011 में जब जनगणना के आंकड़े आ रहे होंगे तब बारहवीं पंचवर्षीय योजना की तैयारियां चल रही होंगी। आपको याद होगा 2001 में जब जनगणना के नतीजे आए थे तो उसमें एक चौंकाने वाला तथ्य निकाला था कि देश में 24 लाख मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरिजाघर आदि पूजा स्थल हैं। लेकिन स्कूल, कालेज आदि की संख्या 15 लाख और क्लिनिक, डिस्पेंसरी और अस्पतालों की संख्या छह लाख है।

यानी शिक्षा और स्वास्थ्य के कुल केंद्रों की संख्या मिलाकर संख्या 21 लाख बनती है जो पूजास्थलों से तीन लाख कम थी। इन आंकड़ों ने हमारे नीति निर्माताओं, उद्योगपतियों, अर्थशास्त्रियों को झकझोरा जरूर होगा और इस दिशा में कदम भी बढ़ाया होगा। इस जनगणना में उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार ये आंकड़े उलट निकलें। इसी प्रकार यह भी देखने वाली बात होगी कि क्या प्रगति कर रहे हमारे समाज में अभी भी महिलाओं का अनुपात पुरुषों की तुलना में घटता जा रहा है या इसमें वृद्धि के संकेत हैं। संभवत इन्हीं सब पहलुओं को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने इस बार जनगणना की थीम रखी है, ‘हमारी जनगणना हमारा भविष्य।’

दूसरा चरण
जनगणना का पहला दौर पूरा होने और आंकड़ों के प्रोसेसिंग का काम पूरा होने के बाद फरवरी 9-28 के बीच जनगणना का दूसरा और अंतिम दौर चलेगा। इस दौरान लोगों से व्यक्तिगत जानकारियों के संबंध में 18-20 सवाल पूछे जाएंगे।
   
इन सवालों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इनमें आमतौर पर नाम, पता, उम्र, बच्चे, शिक्षा, रोजगार, भाषा, धर्म आदि के बारे में पूछा जाता है। विशेषज्ञों ने दो और सवाल पूछे जाने की जरूरत पर जोर दिया है, लेकिन सरकार उसमें फैसला नहीं ले रही है।
      
एक-इस दौरान लोगों की आय के भी आंकड़े जुटाए जाने चाहिए ताकि पता लगाया जा सके कि देश में वाकई कितने गरीब हैं। इससे गरीबी की रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वालों का सही ब्यौरा एकत्र किया जा सकेगा।
     
दूसरे, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की आबादी का सटीक ब्योरा नहीं है। आजादी से पूर्व हुए गैर कुछ सर्वेक्षण बताते हैं कि ओबीसी आबादी 27 फीसदी थी। इसी के आधार पर उन्हें 27 फीसदी आरक्षण विभिन्न क्षेत्रों में दिया जा रहा है, लेकिन यह आंकड़ा सटीक नहीं है। सरकार से अपेक्षा की जा रही है कि अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों की भांति ही ओबीसी के भी आंकड़े वह एकत्र करे, लेकिन अभी तक इस बारे में अंतिम रूप से कोई फैसला नहीं हुआ है।

जनसंख्या रजिस्टर
यह इस बार की जनगणना से जुड़ी नई कवायद है। इस बार जनगणना की सूचनाएं एकत्र करने के साथ-साथ देश के सभी नागरिकों का निजी डाटा बैंक भी तैयार होगा। इसमें नाम-पते के अलावा फोटो और दसों अंगुलियों के फिंगरप्रिंट भी लिए जाएंगे। इसके बाद 15 साल से बढ़े लोगों को एक विशेष पहचान नंबर दिया जाएगा तथा जो कम उम्र के हैं, उन्हें माँ-बाप या अभिभावकों के साथ लिंक किया जाएगा। बाद में नागरिकों को बायोमैट्रिक पहचान पत्र भी प्रदान किया जाएगा।
   
इस कार्य के लिए यूनिक आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी (यूआईडीए) की स्थापना की जा चुकी है जिसके चैयरमैन मशहूर आईटी विशेषज्ञ नंदन नीलकणी हैं। जनगणना के बाद भी विशेष पहचान नंबर और नागरिकता पहचान पत्र का कार्य देने की प्रक्रिया चलती रहेगी। ज्यों-ज्यों युवक 15 साल की उम्र पूरी करेंगे वे नंबर के लिए आवेदन करेंगे और उन्हें बायोमैट्रिक कार्ड मिलते चले जाएंगे। जो बायोमैट्रिक पहचान पत्र देश के नागरिकों को दिए जाएंगे उससे एक ऐसी नई शुरुआत भी होगी, जिसमें साक्षरता की शर्त भी तमाम लोगों के लिए काफी हद तक महत्वपूर्ण होगी वह भी पूरी पारदर्शिता के साथ।


क्यों जरूरी है जनगणना
देश में पहली जनगणना 1872 में हुई थी। यह 15वीं जनगणना है। शुरुआत में हो सकता है जनगणना सिर्फ लोगों की गिनती के लिए होती हो। लेकिन आजादी के बाद से इसका विकास में योगदान बढ़ता गया। देश में विकास योजनाएं बनाने के लिए जनसंख्या के अलावा आंकड़े एकत्रित करने का कोई जरिया ही नहीं है।

आए जिन सर्वेक्षण रिपोर्टों में हम पढ़ते हैं, वह सिर्फ कुछ हजार या अधिकतम एक-दो लाख लोगों पर सर्वेक्षण करके तैयार की जाती हैं जबकि जनगणना में 102 करोड़ लोगों के आंकड़े व्यक्तिगत स्तर पर जुटाये जाते हैं।
करीब साल भर चलने वाली जनगणना दो चरणों में होती है। 35 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में पहला चरण एक अप्रैल से शुरू हो चुका है। पहले चरण में घर और घर से जुड़ी वस्तुओं की गणना की जाती है।

इसमें कुल 35 किस्म के सवाल पूछे जा रहे हैं। (देखें सूची) चूंकि इस बार राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) भी बन रहा है। इसका कार्य भी पहले चरण में ही किया जा रहा है। जनगणना का पहला चरण 15 मई तक पूरा होगा। दूसरे चरण में लोगों की गणना होगी जिसमें लोगों से करीब 18-20 व्यक्तिगत सूचनाओं से संबंधित सवाल पूछे जाएंगे। यह कार्य 9-28 फरवरी के दौरान देश में एक साथ होगा।

यूआईडीए
अपने देश में भी आज के दौर की जरूरतों के मुताबिक यूनिक आईडेंटीफिकेशन अथॉरिटी का गठन किया जा चुका है जिसके प्रमुख नंदन नीलकेणी हैं। कई बार यह सवाल उठता है कि जनगणना महकमे का क्या काम है और यूआईडीए का क्या काम है क्योंकि दोनों एक जैसी बात कहते हैं कि पॉपुलेशन रजिस्टर बनाया जाएगा, नंबर मिलेगा, कार्ड मिलेगा आदि।

यहां स्पष्ट कर दें कि जनगणना, जनसंख्या रजिस्टर बनाने तथा नंबर देने का कार्य जनगणना महकमा ही करेगा जो गृह मंत्रलय के अधीन है। यूआईडी अथारिटी की भूमिका खासतौर पर इसके तकनीकी पहलू को देखना है। नंबर आवंटन की प्रक्रिया को जनगणना महकमा ही पूरा करेगा और सभी पक्षों के कमेंट लेने के बाद उसे यूआईडीए को सौंपेगा।
    
यूआईडीए नंबर की जांच करेगा। यह सुनिश्चित करेगा कि उसकी कोडिंग ठीक है या नहीं, कहीं डुप्लीकेशन तो नहीं हो रहा है। फिर नंबर के आधार पर बायोमैटिक डाटाबेस में डाले जाएंगे और कार्ड बनेंगे। इस कार्ड की बहुआयामी उपयोगिता के संग सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद बनाने में भी काफी हद तक मदद मिल सकती है।

कानूनी पहलू
जनगणना का काम सनसेस एक्ट 1948 के प्रावधानों के तहत किया जाता है। जबकि जनसंख्या रजिस्टर बनाने का सिटीजनशिप एक्ट के तहत होता है। यह भी एक रोचक तथ्य है कि यह योजना एनडीए शासन में बनी थी कि हर नागरिक को पहचान पत्र मिले। मकसद देश में अवैध घुसपैठ को रोकना था। लेकिन योजना के और भी इस्तेमाल निकल सकते हैं।

इसमें सहयोग करना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। एकत्र की जाने वाली सूचनाएं को गोपनीय रखने का प्रावधान है। यहां तक कि कोर्ट के आदेश पर भी ये सूचनाएं किसी को नहीं दी जा सकती हैं। कुल खर्च-जनगणना के कार्य को पूरा करने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 3539 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं।

यूआईडीए का आवंटन अलग है। वैसे जनगणना कार्यालय का अनुमान है कि 2209 करोड़ में यह कार्य पूरा कर लिया जाएगा। इस कार्य में कुल 25 लाख कार्मिकों की मदद ली जाती है। ये लोग मूलत राज्य सरकारों के कर्मचारी टीचर वगैरह होते हैं जिन्हें पहले ट्रेनिंग दी जाती है तथा फिर इस कार्य में मदद ली जाती है। ये लोग 640 जिलों, 5767 तहसीलों, 7742 टाउनों, छह लाख गांवों और 24 करोड़ घरों में जाकर आंकड़े एकत्र करते हैं।

एनपीआर के फायदे ?
यह सवाल जब-तब उठे हैं कि हजारों करोड़ रुपये खर्च करके जनसंख्या रजिस्टर और फिर नागरिकता पहचान पत्र देने के क्या फायदे हैं? जबकि पहले से ही राशन कार्ड, पैन कार्ड, वोटर कार्ड, पासपोर्ट आदि दिए जा रहे हैं। इसका कोई ठोस जवाब अभी किसी के पास नहीं है।

अमेरिका जैसे कई देशों में इस तरह के नंबर देने का प्रावधान है जो नागरिकता की पहचान के साथ-साथ सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में मददगार साबित होते हैं। ऐसा भी नहीं है कि इस नंबर या कार्ड से भविष्य में राशन कार्ड, पैन कार्ड या वोटर कार्ड की जरूरत नहीं रहेगी।
  
इसलिए फिलहाल इसे हमारे चंद्र अभियान की तरह संभावित किसी भावी फायदे के लिए निवेश के रूप में देखा जा रहा है। अलबत्ता जनसंख्या से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि पहचान नंबर और पहचान पत्र का यदि फायदा होगा तो सिर्फ पुलिस महकमे को हो सकता है, वर्ना नहीं। हालांकि आने वाले समय में यदि सरकार ने अपक्षित ध्यान दिया तो यही सभी तरह कार्डो का इकलौता विकल्प हो सकता है और इससे आम जन को तरह-तरह के आई कार्ड रखने की जरूरते से मुक्ति दी जा सकती है।

पहला चरण
कभी भी जनगणना करने वाले 35 सवालों की सूची लेकर आपके पास आ सकते हैं। इसके लिए राज्यवार कार्यक्रम तैयार किया जा चुका है। इनका सही जवाब देना हर नागरिक का कर्तव्य है क्योंकि इन सवालों के जवाब से ही भावी विकास योजनाएं बननी हैं। सवालों में घर के कमरों से लेकर उसके निर्माण की सामग्री, इस्तेमाल, बिजली, पानी, टॉयलेट, बाथरूम आदि के बारे में पूछा जाएगा। साथ ही आपके घर में वाहन है या नहीं है, कैसे जाते हैं आदि सवाल हैं।

इस बार कुछ नए सवाल मोबाइल फोन, कंप्यूटर एवं लेपटाप को लेकर जोड़े गए हैं। एक पहले से पूछे जा रहे एक अटपटे सवाल को हटा दिया गया है जिसमें पूछा जाता था कि क्या घर में विवाहित जोड़े के सोने के लिए अलग कमरा है। पूछे जाने वाले एक सवाल से दर्जनों किस्म के आंकड़े एकत्र हो सकते हैं। मसलन, एक सवाल है घर में कितने कमरे हैं। इसका जवाब एक से दस तक हो सकता है।

जब 102 करोड़ की जनता के जवाब आएंगे तो इसके आधार पर आंकड़ों की टेबलें बनेंगी कि कितने लोग एक कमरे के घर में रहते हैं, कितने दो, कितने तीन, कितने चार आदि, कितने झोपड़ी में कितने बिना छत के। यह आंकड़ा राज्यवार, जिला, तहसील और शहर, कस्बे और गांव के हिसाब से बनेगा।

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