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बिजलीघर

भारी पड़ने लगी है लापरवाहीभ् दूसरे पर निर्भरता, संकट में पूरा बिहारभ् जरूरत 3000 मेगावाट की, उपलब्ध 700 पटना (हि.ब्यू.)। बिजली को लेकर भविष्य की योजना के प्रति लापरवाही बिहार पर अब भारी है। पिछले 24 वर्षो में सूबे में एक भी बिजलीघर नहीं लगा और न ही इसके लिए कोई ठोस योजना बनी। इसके कारण बिहार अपनी बिजली मामले में दूसरों पर आश्रित है। अलबत्ता सूबे में एक से तीन मेगावाट की सात छोटी-छोटी पनबिजली परियोजनाएं स्थापित हुईं लेकिन बड़े थर्मल पावर के मामले में बिहार सबसे पिछली पायदान पर ही खड़ा रहा।बिहार में अंतिम बिजलीघर की स्थापना 1986 में मुजफ्फरपुर के कांटी में हुई जहां 110 मेगावाट क्षमता की दूसरी यूनिट स्थापित हुई। हालांकि राज्य के मौजूदा बिजलीघरों में बरौनी बिजलीघर की यूनिट 2 सबसे पुरानी है। 15 मेगावाट क्षमता की इस इकाई की स्थापना 16 जनवरी 1963 में हुई। वर्ष 1986 के बाद बिजलीघरों की स्थापना का सिर्फ कागजी अभियान ही चला। ेहालांकि वर्ष 2006 से राज्य में बिजलीघर स्थापना का प्रयास शुरू हुआ और राज्य में एक दर्जन से अधिक बिजलीघरों की स्थापना की योजना मूर्त रुप ले सकी। इन 24 वर्षो में बिहार की जरूरत 3000 मेगावाट तक पहुंच गई लेकिन उपलब्धता औसतन 700-800 मेगावाट भी नहीं है।बरौनी बिजलीघर: (बीएसईबी)यूनिट क्षमता (मेगावाट) स्थापित स्टेटस 1 15 26.01.1966 16.02.1983 को रिटायर 2 15 16.01.1963 26.11.1985 को रिटायर 3 15 20.10.1963 05.10.1985 को रिटायर 4 50 09.11.1969 24.04.1996 से शट डाउन 5 50 01.12.1971 15.03.1995 से शट डाउन 6 110 01.12.1984 जर्जर पर चालू 7 110 31.03.1985 बंद कांटी बिजलीघर: (बीएसईबी)यूनिट क्षमता (मेगावाट) स्थापित स्टेटस 1 110 31.03.1985 बंद 2 110 17.03.1986 जर्जर पर चालूकोसी हाइडल प्रोजेक्ट: (बीएचपीसी)यूनिट क्षमता (मेगावाट) स्थापित स्टेटस 1 4.8 अप्रैल 1970 ठीक, 2 4.8 मार्च 1971 पर पानी नहीं 3 4.8 अक्टूबर 1973 होने के कारण 4 4.8 अक्टूबर 1978 बंदगत चार वर्षो में बने हाइडल-प्रोजेक्ट1. अगनूर2. ढेलाबाग3. नासरीगंज4. जयनगरा5. त्रिवेणी6. श्रीखिंडा7. सेवारी(सभी बीएचपीसी के हैं)ं

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