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बीएस-4 नए ईंधन से नई शुरुआत

आप कभी ज्यादा धुआं छोड़ने वाले वाहन के करीब से गुजरे होंगे तो आपको आंखो में जलन महसूस हुई होगी। ऐसा वाहन से निकलने वाले धुएं में अधिक प्रदूषण तत्व मौजूद होने की वजह से होता है। वाहनों का धुआं वायु प्रदूषण की एक बड़ी वजह है। केंद्र सरकार की पहल वायु प्रदूषण को कम करने के लिए ऑटो मोबाइल कंपनियों को कम धुआं छोड़ने वाले वाहन तैयार किए, वहीं पेट्रोलियम कंपनियों ने ऐसा ईंधन तैयार किया, जिसमें प्रदूषण तत्वों की मात्र कम से कम हो।

भारत ने धुएं से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए उत्सर्जन की सीमा तय पहल 1989 में शुरू कर दी थी। इसके पास केंद्र सरकार ने यूरोपीय देशों की तरह अक्तूबर 2003 में राष्ट्रीय ऑटो ईंधन नीति का ऐलान किया। इसके तहत ऑटो ईंधन नीति में तय किए गए रोड मैप के मुताबिक पूरे देश में कम प्रदूषण वाला ईंधन की बिक्री तय की गई।

इस वक्त पूरे देश में यूरो-दो ईंधन की बिक्री हो रही है। जबकि 13 शहरों में यूरो-3 ईंधन की बिक्री होती थी। एक अप्रैल से इन 13 शहरों में बीएस-4 ईंधन बिकना शुरू हो गया है और 31 अक्तूबर 2010 तक पूरे देश में यूरो-3 लागू हो जाएगा।

अर्थव्यवस्था पर असर
- यूरो-4 मानक का पेट्रोल और डीजल तैयार करने के लिए सार्वजानिक क्षेत्र की कंपनी इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम को करीब 30 हजार करोड़ रूपए खर्च कर अपनी रिफाइनरी को बेहतर बनाया है।

- यूरो-3 के मुकाबले कम प्रदूषण वाला यूरो-4 ईंधन तैयार करने के लिए कंपनियों को प्रति लीटर 0.41 पैसे पेट्रोल और 0.26 पैसे डीजल पर खर्च आएगा।

- बीएस-4 लागू होने वाले 13 शहरों में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने के बाद अन्य पदार्थ और शहरों से महंगे होंगे।

पेट्रोलियम पदार्थो पर कितनी है सब्सिडी
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत एक बार फिर उछाल की तरफ हैं। कच्चे तेल की कीमत 78 डॉलर प्रति बैरल है। इसकी वजह से पेट्रोलियम कंपनियों को पेट्रोल पर 6 रूपए प्रति लीटर, डीजल पर 4 रुपए और किरोसिन पर 17 रुपए प्रति लीटर का नुकसान उठाना पड़ रहा है। एलपीजी गैस पर यह सब्सिडी 267 रूपए प्रति लीटर है।

- पेट्रोलियम कंपनी इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम को अंतरराष्ट्रीय बाजार से कम कीमत पर पेट्रोलियम पदार्थो को बेचने की वजह से प्रतिदिन 250 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है।

- मौजूदा वित्त वर्ष 2009-2010 में पेट्रोलियम कंपनियों को 47,690 करोड़ रुपए का नुकसान का अनुमान है। केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतों में इजाफा नहीं किया तो यह नुकसान अगले वित्त वर्ष 2010-2011 में 70 हजार करोड़ रुपए पहुंच सकता है।

इंडियन बास्केट
भारत अपनी जरूरत का सत्तर फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। बड़ा बाजार होने की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ‘इंडियन बास्केट’ की कीमत अलग तय की जाती है। 24 मार्च 2010 को कच्चे तेल की कीमत 77.81 डॉलर प्रति बैरल थी। अप्रैल 2009 से अब तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे कम कीमत एक अप्रैल 2009 को 46.95 डॉलर प्रति बैरल थी। वहीं, सबसे ज्यादा कीमत ग्यारह जनवरी 2010 को रही। उस दिन इंडियन बास्केट में कच्चे तेल की कीमत 80.94 डॉलर प्रति बैरल थी।

भविष्य की योजना
- केंद्र सरकार ने 31 अक्तूबर 2010 तक पूरे देश में यूरो-3 पेट्रोल और डीजल बेचने का फैसला किया है। पेट्रोलियम मंत्रालय चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में यूरो-3 की बिक्री सुनिश्चित करेगा। अभी तक पूरे देश में यूरो-2 की बिक्री हो रही है।

यूरो बनाम भारत मानक (बीएस)
-यूरो और बीएस में कोई फर्क नहीं है। दोनों मानकों में प्रदूषण तत्वों की मात्र एक होती है। वर्ष 2003 में जब राष्ट्रीय ऑटो ईंधन नीति तैयार की गई तो इसे भारत स्टैंडर्ड (मानक) कहकर संबोधित किया गया।

पूरे देश को अभी करना होगा इंतजार
पहली अप्रैल से लागू हुए बीएस फोर के लिए भले ही 13 शहर पूरी तरह से तैयार न दिखाई दिए हों पर बाकी के शहर जो बीएस-2 से 3 में प्रवेश कर रहे हैं, अभी तेल कंपनियां उनको किसी भी कीमत पर इसके अनुकूल तेल देने को तैयार नज़र नहीं आ रही। यूरो 3 वाला तेल देने के लिए तेल कंपनियों ने पेट्रोलियम मंत्रलय को प्रस्ताव दिया कि वे सिर्फ गोवा में यूरो 3 तेल देंगे और इसके बाद वे चरणबद्ध तरीके से साल के अंत तक पूरे देश को यूरो तीन तेल देना शुरू कर पाएंगे। यानी अभी दिल्ली दूर ही है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ
विशेषज्ञ मानते हैं कि अप्रैल से लागू हो चुके यूरो मानक अभी यूएस और यूरोपियन मानकों से 4 से 6 साल पीछे हैं। यूरोपियन कार निर्माता जब कार में ऐसा कोई ट्रीटमेंट उपकरण लगाते हैं तो वे वह शुल्क अपने ग्राहकों से वसूल करते हैं जबकि भारत में इसका उल्टा है। हम मानकों का पालन करना चाहते हैं पर यह बर्दाश्त नहीं करते कि गाड़ी की कीमत बढ़े। शायद यही वजह है कि हम अभी भी यूरोपियन मानकों से काफी दूर हैं।

- भारत में पहली बार प्रदूषण नियंत्रण कानून 1989 से प्रभावी हुए।
- इन कानूनों ने 1991 और 1992 में क्रमश : पेट्रोल और डीजल वाहनों द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण को नियंत्रित करने हेतु कानून में बदलाव ला दिया।
- वर्ष 2000 में भारत ने चौपहिया हल्के वाहनों में यूरोपियन यूनियन के कानूनों को आत्मसाध करना शुरू कर दिया।
- भारत के अपने नियम दुपहिया और तिपहिया वाहनों पर लागू होते हैं।
- वर्तमान में ट्रांसपोर्ट के लिए प्रयोग किए जाने वाले वाहनों के फिटनेस सर्टिफिकेट का नवीनीकरण किया जाता है।

यूरो के मानक और बदलाव
यूरोपियन यूनियन ने वायु प्रदूषण को काबू करने के लिए कुछ मानक तय किए हैं। इन मानकों को ही यूरो एमिशन स्टेंडर्ड के नाम से जाना जाता है। प्रत्येक वाहन श्रेणी के लिए ये मानक अलग-अलग होते हैं। नाइट्रोजन ऑक्साइड, टोटल हाइड्रोकार्बन, नॉन-मीथेन हाइड्रोकार्बन, कार्बन मोनो ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर के आधार पर इसे तय किया जाता है। इसके अनुसार वाहनों के डिजाइन में बदलाव किया जाता है।

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