प्रेमचंद की परंपरा के दुर्लभ कथाकार थे मार्कण्डेय - प्रेमचंद की परंपरा के दुर्लभ कथाकार थे मार्कण्डेय DA Image
10 दिसंबर, 2019|4:12|IST

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प्रेमचंद की परंपरा के दुर्लभ कथाकार थे मार्कण्डेय

कार्यालय संवाददातापटना।गुलरा के बाबा और हंसा जाए अकेला जैसी कहानियों के रचयिता मार्कण्डेय के आकस्मिक निधन से बिहार के साहित्यकार मर्माहत हैं। साहित्यकारों का कहना है कि उनके चले जाने से कहानी व उपन्यास जगत को गहरी क्षति हुई है जिसकी भरपाई मुश्किल है। साहित्य अकादमी से पुरस्कृत कवि डा. अरुण कमल : मार्कण्डेय के निधन के साथ ही हिन्दी कथा साहित्य का एक महत्वपूर्ण स्तंभ हमारे बीच से चला गया। उन्होंने प्रेमचंद के बाद के बदले हुए ग्रामीण जीवन और मानव संबंधों का विशद चित्रण किया। एक प्रतिबद्ध मार्क्‍सवादी लेखक के तौर पर उन्होंने अनेक वैचारिक लडाइयां लडीं। जब कभी भी इलाहाबाद जाता था तो उनसे मिलने जरूर जाता। वे लंबे अरसे से बीमार थे। लेकिन आखिरी बार जब उनसे मैं मिलने गया तो वे उतने ही जीवंत, जिंदादिल व बेहद सतर्क थे। उनका निधन संपूर्ण हिन्दी संस्कृति के लिए क्षति है। साहित्यकार कर्मेदु शिशिर: वे प्रेमचंद की परंपरा के दुर्लभ कथाकार थे। फणीश्वरनाथ रेणु, शिव प्रसाद व मार्कण्डेय उस दौर के महत्वपूर्ण कथाकार थे। उनकी कहानियों में ग्राम्य जीवन की झलकी मिलती है। उन्होंने गांवों के जीवन को बहुत ही आत्मीय तरीके से रचने की कोशिश की है। नए शिल्प का इस्तेमाल बखूबी किया। गुलरा के बाबा, हनसा जाए अकेला, माही, भूदान आदि उनकी काफी चर्चित कहानियां हैं।साहित्ययकार संतोष दीक्षित: नई कहानी में उनका बड़ा स्थान है। उन्होंने बहुत कम लिखा पर जो भी लिखा बहुत खूब लिखा। उस दौर में जब शहरी जीवन पर ही अधिसंख्य कहानियां लिखी जा रही थीं जो कि काफी उदास व ऊ र्जाहीन लगती तो उन्होंने ग्राम्य जीवन को कथा व उपन्यास का विषय बनाया। इस तरह उन्होंने कहानी व उपन्यास में एक नई धारा की शुरुआत की। हंसा जाए अकेला का हंसा बाबा चरित्र ग्राम्य जीवन से लिया गया है।ं

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