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ये है गोलमाल की ध्वनि

पांच साल की उम्र से विज्ञापनों और मराठी धारावाहिकों में काम कर रहीं मुग्धा चापेकर को स्टार प्लस के सीरियल ‘पृथ्वीराज चौहान’ में राजकुमारी संयोगिता के रूप में खासी पहचान मिली। अब वह सब टीवी के शो ‘गोलमाल है भाई सब गोलमाल है’ में नजर आ रही हैं। पेश हैं उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश

क्या बचपन में ही यह तय कर लिया था कि बड़ी होकर अभिनेत्री ही बनना है?
तय तो बचपन में ही हो गया था, मगर यह फैसला मैंने नहीं, बल्कि ऊपरवाले ने मेरे लिए लिया था। असल में, मैं तो शास्त्रीय संगीत सीख रही थी और विज्ञापनों में काम करती थी। जब एक मराठी धारावाहिक के निर्माता ने मेरे माता-पिता से पूछा कि क्या मैं अभिनय करना चाहूंगी तो बस, वहां से जो सिलसिला शुरू हुआ तो आज तक जारी है।

लेकिन पहचान आपको मिली संयोगिता बन कर?
जी हां, कॉलेज के फौरन बाद मुझे ‘पृथ्वीराज चौहान’ का ऑफर आया था। वह सीरियल इतना ज्यादा पॉपुलर हुआ कि आज भी लोग मुझे राजकुमारी संयोगिता के रूप में देखते हैं। इसके बाद एक-एक करके ‘धर्मवीर’, ‘मेरे घर आई एक नन्ही परी’, ‘सजन रे झूठ मत बोलो’ मिलते रहे और मैं खुद को खुशकिस्मत मानती हूं कि हर सीरियल में मुझे अच्छे रोल ही मिले।

‘गोलमाल है भाई सब गोलमाल है’ के बारे में बताइये?
यह एक फैमिली कॉमेडी सीरियल है, जो आपको हृषिकेश मुखर्जी की फिल्मों की याद दिलाएगा। इसका जो हीरो है सचिन, वह किस तरह से एक बड़े परिवार की लड़की ध्वनि को पाने के लिए उसके पूरे परिवार का दिल जीतता है, ये दोनों मिल कर किस तरह का गोलमाल करते हैं, ये सब इसमें दिखाया गया है।

ध्वनि ढोलकिया के इस किरदार की क्या खासियत है?
खासियत यह है कि यह एक बहुत ही प्यारी लड़की है, जैसी किसी भी गली-मोहल्ले में, आपके पड़ोस में होती है। पहले तो यह डरती है कि इस गोलमाल में पकड़े जाएंगे, पर फिर वह सचिन का साथ देती है और दोनों मिल कर गोलमाल करते हैं। बहुत ही प्यारा और असरदार किरदार है यह।

इस किरदार से आप खुद को कितना रिलेट कर पा रही हैं?
बहुत ज्यादा। यह लड़की बहुत चुलबुली है, प्यारी है और परिवार को, पारिवारिक मूल्यों को बहुत सम्मान देती है। मैं खुद को जब इसकी जगह पर रखती हूं तो मुझे लगता है कि ध्वनि मैं ही हूं।

आपको देखते ही जो पहला ख्याल मन में आता है, वह यह कि यह लड़की छोटे पर्दे पर क्या कर रही है?
(हंस कर) पता नहीं। प्रस्ताव तो मुझे आए हैं फिल्मों के, लेकिन उनमें मुझे कुछ ऐसा नजर नहीं आया कि मैं उन्हें लपक लूं। मुझे यह भी लगता है कि छोटा पर्दा मेरे लिए सहज भी है। शायद इसलिए भी मैं फिल्मों के बारे में नहीं सोचती हूं।

इस कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने में क्या कोई हिचकिचाहट है?
शायद। पता नहीं। अगर कुछ सचमुच दमदार मिले, जिसमें मेरी प्रतिभा निकल कर आए तो मैं सोच भी सकती हूं। मुझे कोई अभिनेत्री नहीं बनना है। मैं एक कलाकार के तौर पर पहचान पाना चाहती हूं।

कुछ और भी कर रही हैं?
अभी तो नहीं। डेली सोप में इतना वक्त ही नहीं मिल पाता है। एक बार यह धाराविहक चलने लगे तो फिर कुछ चटपटा-सा करूंगी।

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