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जहरीले सांपो से खेलना ही है इन मासूमों का रोजगार

जिन विषधरों को देख बड़े-बडे लोग कांप उठते हैं, उन्हीं जहरीले सांपों से राज, मंगलपति और शनि जैसे कई मासूमों की दोस्ती है। ये मासूम इन नागों के साथ बेखौफ होकर खेलते हैं और उन्हें अपने इशारों पर नचा अपने परिवार का भरण-पोषण भी करते हैं। मुफलिसी की जिंदगी गुजार रहे सपेरा समुदाय के इन बच्चों के लिए ये सांप खेल भी हैं और रोजगार भी।
 
इलाहाबाद जिले के शंकरगढ़ इलाके के गांव कपारी, बिमरा, लोहगरा, जज्जीपुर, कंचनपुर व भैंरवघाट में करीब 3,000 सपेरों के कुनबे बरसाती और लकड़ी के सहारे बनाई गई झुग्गी-झोंपडिम्यों में बसर कर रहे हैं। मुफलिसी की जिंदगी गुजार रही अनुसूचित जाति में गिने जाने वाले 'नाथ सम्प्रदाय' की इस कौम को राज्य व केंद्र सरकार की किसी भी योजना का अब तक कोई लाभ नसीब नहीं हुआ है।

जहरीले सांप पकड़ना और उन्हें नचाना इस सम्प्रदाय का मुख्य पेशा है। सांपों का प्रदर्शन ही सपेरों के खाने-कमाने का एकमात्र जरिया है। इनके बच्चों के लिए स्कूल का मुंह देखना तो दूर की बात है, उन्हें खेलने के लिए खिलौने तक नसीब नहीं होते है। ये बच्चों कोबरा नाग, विशखापर जैसे जहरीले जीव-जंतुओं से बेखौफ  होकर खेलते हैं। इस कुनबे में राज (5), मंगलपति (4) और शनि (4) जैसे दर्जनों बदकिस्मत मासूम बच्चों हैं, जो विरासत में मिले जहरीले सांप पकड़ने के गुर सीखने को मजबूर हैं।

कपारी गांव में एक कुनबा रमेशनाथ (45) का है। रमेश किसी अज्ञात बीमारी का शिकार है। उसके पांच बेटे-बेटियां हैं। अपनी बीमारी की वजह से वह सांप पकड़ने व नचाने में अक्षम है और कुनबे को जिंदा रखने का भार उसके बड़े बेटे चंद्रनाथ (नौ) के कंधों पर आ गया है।

रमेश कहते हैं कि उनके पुरखे भी इसी बरसाती और लकड़ी की झुग्गी में जीवन गुजार कर चल बसे थे, अब उसकी बारी है। उन्होंने बताया कि सरकारी सुविधा के नाम पर मेरे पास सिर्फ राशन कार्ड व मतदाता पहचान पत्र ही हैं। वह अपने बड़े बेटे चंद्रनाथ को बचपन से ही बस्ता और किताबों की बजाए 'बीन और पिटारी' थमा कर 'ककहरा' की जगह सांप पकड़ने व बीन बजाने की कला सिखा चुके हैं।

अब चंद्रनाथ दूर-दूर तक अपने इस हुनर का प्रदर्शन कर दो वक्त की रोटी का इंतजाम करता है। चंद्रनाथ बताता है कि सांप और विशखापर जैसे जहरीले जीव-जंतुओं से अब मुझे डर नहीं लगता। यह हुनर खतरनाक तो है पर इसके अलावा कोई दूसरा चारा भी तो नहीं है। में पढ़ना चाहता था, लेकिन पिता की बीमारी ने उसे इस पेशे के लिए मजबूर कर दिया।

इस पूरे गांव के सपेरा समाज में राजेशनाथ एक ऐसा पढ़ा-लिखा युवक मिला जो गांव के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षामित्र की नौकरी कर रहा है लेकिन उसे भी सरकारी उपेक्षा का मलाल है। राजेशनाथ कहते हैं कि आस-पास के सात गांवों के सपेरा समाज के लोगों को जागृत करने का प्रयास किया जा रहा है, सांप पालना या पकड़ना जोखिम भरा पेशा है। अब तक सांप के काटने से कई लोगों की मौतें हो चुकी हैं। कोई भी सरकारी योजना सपेरा समाज के पास पहुंचने से पहले दम तोड़ देती है। हमें राशन कार्ड के अलावा कुछ भी नहीं मिला है। यहां तक की आशियाना बनाने के लिए एक गज जमीन भी मुहैया नहीं कराई गई है।

कपारी गांव के ग्राम प्रधान मूलचंद्र यादव बताते हैं कि गांव में ग्राम समाज के पास ऐसी अतिरिक्त भूमि नहीं है, जो सपेरा समाज को आवंटित की जा सके। आवासीय योजना का एक प्रस्ताव मुख्य विकास अधिकारी को पिछले साल भेजा गया था, लेकिन उस पर अब तक कोई फैसला नहीं हुआ है।

 

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