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95 फीसदी स्कूलों में आरटीई ढांचा नहीं

शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) बने दो साल बीत चुके हैं लेकिन देश के 95 फीसदी स्कूलों में आरटीई मानकों के अनुरूप संरचना नहीं है। यह जानकारी एक अध्ययन में सामने आई।

करीब 10 हजार गैर सरकारी संगठनों के एक समूह ‘राइट टू एजुकेशन फोरम’ ने अपने अध्ययन में कानून के कार्यान्वयन की जांच की और पाया कि कानून को लागू करने की दिशा में कुछ प्रगति हुई है, लेकिन वह काफी नहीं है।

संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक 95.2 फीसदी स्कूलों में आरटीई के मुताबिक ढांचागत संरचना नहीं हैं और 2009-10 में सिर्फ 4.8 फीसदी सरकारी स्कूलों में ही आरटीई कानून के मुताबिक सभी ढांचागत संरचनाएं मौजूद थीं।

आरटीई कानून के मुताबिक हर स्कूल में प्रत्येक शिक्षक के लिए कम से कम एक कक्षा होनी चाहिए और प्रधानाध्यापक के लिए एक कार्यालय होना चाहिए। साथ ही स्कूल का भवन सभी मौसम के लिए उपयुक्त होना चाहिए।

कानून के मुताबिक स्कूल में छात्र और छात्राओं के लिए अलग शौचालय, एक खेल का मैदान, समुचित पाठ्य सामग्री से युक्त एक पुस्तकालय, बिजली की सुविधा और कम्प्यूटर की सुविधा होनी चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक हर 10 में से एक स्कूल में पेयजल की सुविधा का अभाव है। 40 फीसदी स्कूलों में शौचालय काम नहीं कर रहा है। अन्य 40 फीसदी स्कूलों में बालिकाओं के लिए अलग शौचालय नहीं है।

साठ फीसदी स्कूलों में बिजली नहीं है, जबकि 20 फीसदी स्कूलों में ही कम्प्यूटर हैं। 40 फीसदी प्राथमिक स्कूलों में कक्षा और छात्रों का अनुपात 1:30 से अधिक है। आरटीई फोरम के राष्ट्रीय समन्वयक अम्बरीश राय ने कहा, ‘मौजूदा स्थिति बच्चों के लिए गम्भीर स्थिति प्रस्तुत करती है। 95 फीसदी से अधिक स्कूल सरकार द्वारा तय किए गए मानकों के अनुरूप नहीं हैं और हमारे पास आरटीई कानून में निर्धारित मानकों पर खरा उतरने के लिए सिर्फ एक साल है।’

आरटीई कानून में ढांचागत संरचना के मानक हासिल करने के लिए 2013 की समय सीमा तय की गई है।

 

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