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यहां देवी-देवता खेलेंगे भक्तों संग होली

भक्तों की कौन कहे, होली खेलने का आनंद देवी-देवता भी लेना चाहते हैं। इसलिए, होली के दिन मंदिरों के कपाट से निकलकर देवी-देवता समूह बनाकर चल पड़ते हैं भक्तों संग होली खेलने। यह सुनकर कुछ अजीब भले लगे, पर झारखंड के चुटिया क्षेत्र में यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।

भगवान राम सीता, लक्ष्मण और हनुमान संग, तो कृष्ण-राधा अपने ग्वाल-बाल संग निकल पड़ते हैं नगर भ्रमण को। आगे-पीछे भक्तों का काफिला, हवा में उड़ते अबीर-गुलाल के साथ फगुआ की डोल यात्रा निकलती है। नागवंशी राजाओं से समय से चली आ रही यह परंपरा चुटिया क्षेत्र में आज भी कायम है।

प्राचीन है इतिहास
अपर चुटिया स्थित राम मंदिर से फग डोल यात्रा निकाले जाने की परंपरा नागवंशी राजाओं के समय से ही है। ऐतिहासिक साक्ष्यों की मानें तो नागवंशियों की राजधानी पहले सुतियांबे थी। चौथे नागवंशी राजा प्रताप राय अपने शासनकाल में राजधानी चुटिया लेकर आए। इसी वंश के चौथी पीढ़ी के राजा रघुनाथ साह ने 1742 में राम मंदिर का निर्माण कराया। माना जाता है कि उसी समय से देवी-देवताओं के साथ फग डोल यात्रा निकालने की परंपरा शुरू हुई।

देवी-देवता करते हैं नगर भ्रमण
होली के दिन अपर चुटिया स्थित राम मंदिर से राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान पालकी में बिठाकर डोल यात्रा मैदान में लाए जाते हैं। वहां उन्हें अबीर-गुलाल अर्पित किया जाता है। फिर विशाल शोभायात्रा के रूप में भगवान समेत भक्तगण लोअर चुटिया स्थित राधा-कृष्ण मंदिर का रुख करते हैं।

वहां से राधा-कृष्ण, ग्वाल-बाल की अपनी पूरी टीम के साथ पुन: डोल यात्रा मैदान का रुख करते हैं। लगभग दो किमी की इस यात्रा में भगवान हर भक्त के लिए सहज उपलब्ध होते हैं। महिलाएं आरती उतारती हैं। फगुआ गानेवालों की टोली भी साथ-साथ चलती है। वापसी में पुन: सभी देवी-देवता भक्तों को उल्लास और उमंग में डूबा छोड़ कर अपने-अपने मंदिरों में प्रवेश करते हैं।

सबसे पहले मनती है होली
नागवंशियों का इस क्षेत्र पर इतना दबदबा था कि होली सबसे पहले चुटिया में ही मनाई जाती थी। चुटियावाले आज भी इसका पालन करते हैं। इस वर्ष भी यहां होलिका दहन 6 तारीख को मध्यरात्रि में किया जाएगा। 9 तारीख को शाम से चार बजे फग डोल यात्रा निकलेगी। संस्कृति विशेषज्ञ गिरिधारी राम गौंझू कहते हैं कि आज जिस शालीन और सूखी होली की बात हम करते हैं वह तो चुटिया में नागवंशियों के समय से ही चली आ रही है। डोल यात्रा में सिर्फ अबीर-गुलाल का प्रयोग होता है।

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